सेवक से बाइबल क्या कहती - अध्याय 6 - भाग 2
आप के संदेश आप के प्रचार और शिक्षण को - क्या होना चाहिए
ब) आप और आपका प्रचार और शिक्षण
1. आपको यह सुनिश्चित करना हैं कि आपका जीवन आपके प्रचार और शिक्षा के अनुरूप हैं।
"सो क्या तू जो औरों को सिखाता हैं, अपने आपको नहीं सिखाता? क्या तू जो चोरी न करने का उपदेश देता हैं, आप ही चोरी करता हैं? तू जो कहता है, व्यभिचार न करना, क्या आप ही व्यभिचार करता है? तू जो मूरतों से घृणा करता हैं, क्या आप ही मंदिरों को लूटता हैं? तू जो व्यवस्था के विषय में घमण्ड करता हैं, क्या व्यवस्था न मानकर, परमेश्वर का अनादर करता हैं? क्योंकि तुम्हारे कारण अन्यजातियों में परमेश्वर के नाम की निन्दा की जाती हैं, जैसा लिखा भी है" (रोमि. 2:21-24)।
"जो मुझ से हे प्रभु, हे प्रभु कहता हैं, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता हैं। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए ? तब मैं खुलकर उन से कह दूंगा कि मैं ने तुमको कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करनेवालों, मेरे पास से चले जाओं" (मत्ती 7:21-23)।
"वे कहते हैं, कि हम परमेश्वर को जानते हैंः पर अपने कामों से उसका इंकार करते हैं, क्योंकि वे घृणित और आज्ञा न माननेवाले हैं; और किसी अच्छे काम के योग्य नहीं" (तीतु 1:16)।
विचार
एक सेवक के रूप में, आप को वैसे ही जीना हैं जैसे आप प्रचार करने और शिक्षा देते हैं। पवित्रशास्त्र इस विषय में प्रत्यक्ष और नुकीला हैं। उपरोक्त (रोमि 2:21-24) पवित्रशास्त्र पर ध्यान दें, एक सेवक के रूप में आप से पूछे गए पांच स्पष्ट और सीधे प्रश्न हैं:
अ) "तू जो औरों को सिखाता हैं, अपने आप को नहीं सिखाता?" प्रश्न आप के और अन्य सब सेवकों और वचन के शिक्षकों के लिए हैं। आप दावा करते हैं कुछ सत्यों को जानने का जो नैतिकता के विषय में और लोगों को किस प्रकार जीना और आचरण करना चाहिए इस विषय में हैं। आप बहुधा इन सत्यों को आपकी कलीसिया और विश्वासियों, बच्चों, मित्रों और दूसरों के साथ बाटते हैं। जब आप बांटते और शिक्षा देते हैं, तब क्या आप सत्य को नहीं सुनते ? क्या आप स्वयं को नहीं सिखाते? दूसरों को यह बताने का कि कैसे जीना हैं आपके पास क्या अधिकार हैं यदि आप वैसे नहीं जीते? यह कपटीपन का पाप हैं, एक पाप जो अत्याधिक सेवकों व्दारा किया जाता हैं।
"इसीरीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, पर भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो" (मत्ती 23:28)।
"जब तुम मेरा कहना नहीं मानते, तो मुझे क्यों हे प्रभु, हे प्रभु, कहते हो?" (लूका 6:46)।
"हे बालकों, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के व्दारा भी प्रेम करें" (1 यूह 3:18)।
ब) "क्या तू जो चोरी न करने का उपदेश देता है, आप ही चोरी करता हैं?" क्या आप दूसरों से लेते हैं; क्या आप...
* पैसे चुराते हैं ?
* अपने बिलों का भुगतान न करने के व्दारा चुराते हैं?
* पुस्तकें और अन्य वस्तुओं का आईर करके उनका भुगतान न करने के व्दारा चुराते हैं?
* खरीदी करते समय चुराते हैं?
* आप की कलीसिया और सेवकाई से समय या अन्य वस्तुएं चुराते हैं?
* अपने पड़ोसी या साथी सेवकों से चुराते हैं?
* अपने परिवार से चुराते हैं?
यदि आप चुराते हैं, तो आप के पास क्या अधिकार हैं यह कहने का कि दूसरों को चोरी नहीं करना चाहिए कि किसी को भी यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वे जो चाहें, वे किसी से भी ले लें? यदि पर्याप्त लोग वह लेने लगें जो वे चाहें जब वे चाहें, तब जगत में अत्यन्त गड़बड़ी हो जाएगी। यदि आप कहते हो कि मनुष्यों को चोरी नहीं करना चाहिए, तब आप क्यों चुराते हो? कुछ सेवकों का यह पाप हैं।
चोरी एक पाप हैं जो अत्यन्त गड़बड़ी करता हैं। उसके विनाशकारी प्रभाव के कारण, यह दस आज्ञाओं में से एक हैं, और ध्यान देंः यह एक इतनी महत्वपूर्ण आज्ञा हैं कि इसे बार-बार दोहराया गया हैं।
"तू चोरी न करना" (निर्ग 20:15; लैव्य 19:11; व्यव. 5:19; मत्ती 19:18; रोमि 13:9)।
"चोरी करनेवाला फिर चोरी न करे; वरन भले काम करने में अपने हाथों से परिश्रम करे; इसलिए कि जिसे प्रयोजन हो, उसे देने को उसके पास कुछ हो" (इफि. 4:28)।
स) "तू जो कहता हैं कि व्यभिचार न करना, क्या आप ही व्यभिचार करता है? "आप उपदेश देते और सिखाते हो कि लोगों को पवित्र दुल्हनें और दुल्हे, पवित्र पति और पत्नियों होना चाहिए, और आप एक पवित्र पुत्र और पुत्री चाहते हैं" परन्तु क्या आप पवित्रता से जीवन बिताते हैं? आप क्या देख, पढ़ और सुन रहे हैं? क्या आप...
* दूसरी बार देखते हैं?
* अश्लील पुस्तकें, पत्रिकाएं, और साहित्य पढ़ते हैं?
* कामुक विचार रखते हैं?
* कामुकता के विचारों को शरण देते हैं?
* एक अनैतिक संबंध में हैं?
* अपने शरीर को दिखानेवाले वस्त्र पहिनते हैं?
* ऐसे दूरदर्शन और फिल्मों को देखते और उनका समर्थन करते हैं जिन में अनैतिकता के दृश्य या अनैतिकता के सुझाव हैं?
मनुष्य के इंकार के बावजूद, हम वही करते हैं जो हम सोचते हैं; और हमारे विचार उत्पन्न होते हैं उस से जो हम देखते, पढ़ते और सुनते हैं। इसलिए यदि आप कामुकता के सुझावों को देखते, पढ़ते और सुनते हैं, तो आपके विचार शारीरिक अभिलाषाओं पर केंद्रित रहते हैं। समाज में नैतिकता के पतन का यही कारण हैं। यदि आप कहते हैं कि एक मनुष्य को व्यभिचार नहीं करना चाहिए, तो क्या आप व्यभिचार करते हैं? क्या आप मन में इसे करते हैं? कुछ सेवकों का यह बड़ा पाप हैं। मसीह इसे जानता था; इसलिए उस ने कहा...
"तुम सुन चुके हो कि कहा गया था कि व्यभिचार न करनाः परन्तु मैं तुम से कहता हूं, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन में उस से व्यभिचार कर चुका" (मत्ती 5:27-28)।
ड) "तू जो मूर्तियों से घृणा करता हैं, क्या आप ही मंदिर को लूटता है? "मंदिर को लूटना" (हीरोसुलेओ) का अर्थ हैं परमेश्वर से अपनी प्रतिबध्दता को भंग करना और परमेश्वर से चुराना। इसका अर्थ हैं कि किसी बात को परमेश्वर से अधिक महत्वपूर्ण समझना, कुछ बात जो इतनी महत्वपूर्ण हैं कि वह मांग करती हैं...
* उस प्रतिबध्दता की जो आप परमेश्वर को धारते हैं।
* दसवांश और भेटें जो आप परमेश्वर को धारते हैं।
आप कहते हैं कि आप परमेश्वर की उपासना करते हैं और मूर्तियों से घृणा करते हैं। परन्तु स्वयं से पूछे क्या आप उसे लेते हैं जो परमेश्वर का हैं - आपकी प्रतिबध्दता आपका समय, आपकी उर्जा, आपका दसवांश और उसे कुछ और देते हैं? क्या आप किसी और बात को परमेश्वर से अधिक महत्व देते हैं; क्या आप उसे एक मूर्ति बना लेते हैं? कुछ सेवकों का यह बड़ा पाप हैं।
"इसलिए अपने विषय में सावधान रहो, ऐसा न हो कि तुम्हारे मन धोखा खाएं, और तुम बहककर दूसरे देवताओं की पूजा करने लगो और उनको दण्डवत् करने लगो" (व्यव. 11:16)।
"मैं यहोवा हूं, मेरा नाम यही हैं; अपनी महिमा मैं दूसरे को न दूंगा और जो स्तुति मेरे योग्य हैं वह खुदी हुई मूखों कोन दूंगा" (यशा 42:8)।
"हे बालको, अपने आप को मूरतों से बचाए रखों" (1 यूह 5:21)।
ई) "तू जो व्यवस्था के विषय में घमण्ड करता हैं, क्या व्यवस्था न मानकर, परमेश्वर का अनादर करता हैं? उत्तर स्पष्ट हैं।
* आप अवश्य परमेश्वर का अनादर करते हैं जब आप उसके वचन के विषय में बोलते हैं तथापि उसकी आज्ञाओं को भंग करते हैं।
* आप अवश्य परमेश्वर का अनादर मनुष्यों के सामने करते हैं, उसके नाम की निंदा और श्रापित किए जाने का कारण बनते हैं।
जब आप परमेश्वर के वचन पर घमण्ड करते हैं तथापि उसकी आज्ञाओं को भंग करते हैं, तो आप संसार और उसके लोगों को बड़ा अवसर देते हैं कि वे परमेश्वर का नाम लें और...
* निंदा करें
* ठट्टा करें
* श्राप दें
* इंकार करें
* छिकारें
* अपमान करें
* हंसी उड़ाएं
* तिरस्कार करें
अनेक व्यक्ति नाश होते हैं कुछ सेवकों की कपट के कारण। एक कपटी सेवक के भयानक पापों में यह एक हैं।
एक सेवक के रूप में, आप को उत्तरदायी होना हैं; आप को अपने पेशे के अनुसार जीना हैं। सब विश्वासियों से, विशेषकर सेवकों से पवित्रशास्त्र यह मांग करता है.
"जो कोई यह कहता हैं, कि मैं उसमें बना रहता हूं, उसे चाहिए कि आप भी वैसा ही चले जैसा वह चलता था" (1 यूह. 2:6)।
"चलता" शब्द एक लगातार क्रिया हैं। इसका अर्थ हैं मसीह में चलना और उसमें चलते रहना। यथार्थ में "उसे चाहिए शब्द का अर्थ कर्ज, बंधन, और आभार हैं। एक सेवक के रूप में, आप मसीह का अंगीकार करते हैं; आप परमेश्वर को जानने का दावा करते हैं। इसलिए, आप मसीह के कर्जदार हैं। आप आभारी हैं मसीह के समान चलने के लिए। मसीह पृथ्वी पर कैसे चला? वह चला...
* परमेश्वर पर विश्वास करते और भरोसा रखते हुए।
* परमेश्वर की आराधना करते और प्रार्थना करते हुए।
* परमेश्वर के साथ संगति रखते और बातचीत करते हुए।
* जो वह था और उसके पास था वह सब परमेश्वर को देते और बलिदान करते हुए।
* परमेश्वर की खोज करते और उसके पीछे चलते हुए।
* परमेश्वर के विषय में दूसरों को बताते और शिक्षा देते हुए।
* दूसरों से प्रेम करते और देखभाल करते हुए ठीक वैसे ही परमेश्वर ने कहा हैं कि करें।
* परमेश्वर की सब आज्ञाओं को मानते और पालन करते हुए।
यही वह उत्तरदायी मनुष्य हैं, जो आप को होना हैं। आप को वही करना हैं जो मसीह ने कियाः परमेश्वर पर विश्वास और भरोसा रखें, परमेश्वर की आराधना और प्रार्थना करें - आप को मसीह के पदचिन्हों पर चलना हैं, ठीक वही करते हुए जो मसीह ने किया। एक सेवक के रूप में यह आपका कर्तव्य और आभार है: आप को अपने प्रचार और शिक्षा के अनुरूप जीना हैं। यदि आप मसीह के लिए नहीं जी रहे हैं - अपने प्रचार और शिक्षा के अनुरूप - तब आप को तुरन्त अंगीकार करना और मन फिराना हैं, मसीह के लिए और अपनी स्वयं की आत्मा के लिए कि कहीं आप बाहर फेंके न जाएं।
2. आप को सुसमाचार के प्रचार को एक अतिआवश्यकता की चेतना के साथ करना हैं।
"और यदि मैं सुसमाचार सुनाऊं, तो मेरा कुछ घमण्ड नहीं; क्योंकि यह तो मेरे लिए अवश्य हैं; और यदि मैं सुसमाचार न सुनाऊं, तो मुझ पर हाय" (1 कुरि. 9:16)।
विचार
एक सेवक के रूप में, आप को सुसमाचार के प्रचार को एक अतिआवश्यकता की चेतना के साथ करना हैं। आप को चेतना होना हैं पकड़े जाना हैं - सुसमाचार प्रचार करने की एक विवशता व्दारा। क्यों? तीन कारण हैं।
अ) आप आभारी हैं, कर्त्तव्य बध्द हैं, सुसमाचार प्रचार करने के लिए। ध्यान दें कि पौलुस क्या कहता हैं: एक परमेश्वर प्रदत्त "आवश्यकता (एपीकीटाइ) उस पर डाली गई थी" सुसमाचार प्रचार करने की। "आवश्यकता" शब्द का अर्थ हैं दबाव, विवशता, बंधन, मांग, कर्त्तव्यबध्दता सुसमाचार प्रचार करने के लिए। परमेश्वर ने पौलूस की बुलाया था सुसमाचार प्रचार करने के लिए, इसलिए यह उसका प्रभार, उसका कार्य, उसका व्यवसाय, जीवन में उसकी बुलाहट थी। वह अन्यथा नहीं कर सकता थाः वह प्रचार करने के लिए विवश था। उसका प्रचार करना चुनाव की एक बात नहीं थी; एक प्रचारक बनने का चुनाव उसने नहीं किया था। उसका प्रचार करना एक कर्त्तव्य की बात थी। यदि वह प्रचार नहीं करता, तो वह परमेश्वर की अवज्ञा करता और पृथ्वी पर उसके जीवन के उध्देश्य से चूक जाता।
एक सेवक के रूप में, आप को एक आवश्यकता की चेतना के साथ प्रचार करना हैं, कि कहीं आप जीवन में आपके उध्देश्य से न चूक जाएं।
ब) सुसमाचार प्रचार का लेखा आपको परमेश्वर को देना हैं। यदि आप प्रचार नहीं करते हैं, तो आप को परमेश्वर के न्याय और हाय का सामना करना होगा। "हाय" शब्द का यह अर्थ हैः जब पौलुस परमेश्वर के सामने खड़ा होगा तो उसे सामना करना होगा कुछ भयानक...
* शोक
* दोषारोपण
* व्याकुलता
* दुख
*आपदा
कोई भी व्यक्ति जिसे परमेश्वर ने कभी बुलाया है इस आनेवाले न्याय से नहीं बच सकता हैं। यह स्पष्ट कर दिया गया हैं।
यदि पौलस स्वेच्छा से सुसमाचार प्रचार करता, तो उसे प्रतिफल मिलता। परन्तु यदि वह अनिच्छा से प्रचार करता, तब भी सुसमाचार प्रचार करने के लिए वह प्रभारी था" (1 कुरि. 9:17)। इसका सरल अर्थ हैं कि चाहे वह अनिच्छा से करता या ऐसा करने से इंकार करता तब भी सुसमाचार प्रचार करने के लिए वह उत्तरदायी था। "प्रभारी" (ओकोनोमिया) का अर्थ हैं एक भंडारीपन, एक भरोसा। भंडारी एक बड़े घराने या संपदा का प्रबन्धक था। परमेश्वर का सेवक परमेश्वर के घराने और संपदा (कलीसिया और जगत) का प्रबन्धक हैं।
एक बार जब परमेश्वर ने, आपको प्रचार करने के लिए बुलाया हैं, तो प्रचार करने का भंडारीपन और भरोसा आप का हैं। चाहे आप प्रचार करें या न करें इससे अंतर नहीं पड़ता; प्रचार करने के लिए आप तब भी उत्तरदायी हैं। सुसमाचार प्रचार करने के लिए आप को उत्तर देना पड़ेगा या सुसमाचार को प्रचार न करने का उत्तर आप को देना होगा।
एक सेवक के रूप में, आप को सुसमाचार प्रचार अत्यन्त आवश्यकता के साथ करना हैं, ऐसे प्रचार करना हैं कि मनुष्यों की समझ में आए और वे पाप, मृत्यु, और आनेवाले न्याय से बच सकें।
"और जैसे मनुष्यों के लिए एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त हैं" (इब्रा. 9:27)।
3. आपको परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ में प्रचार करना हैं, मनुष्यों के फुसलानेवाले विचारों और धारणाओं से नहीं।
"और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभानेवाली बातें नहीं; परन्तु आत्मा और सामर्थ का प्रमाण थाः इसलिए कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो" (1 कुरि. 2:4-5)।
विचार
एक सेवक के रूप में, आपको परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ में प्रचार करना हैं। आकर्षक, लुभानेवाले विचारों और धारणाओं के साथ जो मनुष्यों के हैं आप को प्रचार नहीं करना हैं - आपको लोगों तक पहुंचने का प्रयास नहीं करना हैं। उपरोक्त वचनों में अनेक बिन्दुओं पर ध्यान दें।
अ) दैनिक बोलचाल या सामान्य वार्तालाप और प्रचार में एक अंतर किया गया हैं। पौलुस के दैनिक वार्तालाप यीशु मसीह पर केंद्रित थे ठीक उसी प्रकार जैसे उसके प्रचार। वह कह रहा हैं जिस पर पहिले ही वह बल दे चुका है: उसने ठान लिया था कि लोगों में वह "यीशु मसीह और उसके क्रूसित किए जाने" के अतिरिक्त और कुछ न जाने।
क्या ही गतिशील नमूना ! आपके जीवन और वार्तालाप को यीशु मसीह पर केंद्रित होना हैं - प्रत्येक दिन, पूरे दिन भर। जब भी संभव हो और जब भी अवसर बनाया जा सकें, आपके वार्तालाप का विषय यीशु मसीह और उसका क्रूसित होना ही होना चाहिए...
* घर पर
* प्रचार में
* काम पर
* शिक्षा में
* खेल के समय
* चर्चा में
* भोजन के समय
* बांटने में
"क्योंकि यह तो हम से हो नहीं सकता, कि जो हमने देखा और सुना हैं, वह न कहें" (प्रेरि 4:20)।
ब) "लुभानेवाले" (पीथोइस) शब्द का अर्थ हैं फुसलानेवाले, ठीक दिखने वाले। आप के गवाही देने और प्रचार को लुभानेवाले फुसलानेवाले, ठीक दिखनेवाले तर्को पर आधारित नहीं होना हैं जो मनुष्य की बुध्दि और दर्शन के हैं। "प्रमाण" (पीथोइस) शब्द का अर्थ हैं सबसे ठोस सबूत और प्रमाण के साथ दर्शाना। विचार यह हैं कि प्रमाण इतनी प्रबलता से प्रस्तुत किए जाते हैं कि सत्य स्पष्ट दिखाई देता हैं।
स) आपकी गवाही और प्रचार के इतनी प्रबलता से घोषित किए जाने का एकमात्र तरीका हैं पवित्र आत्मा और उसकी सामर्थ व्दारा। उध्दार का सुसमाचार तब ही प्रतीति दिला सकता हैं जब पवित्रआत्मा और उसकी सामर्थ उसे प्रदर्शित करें।
केवल पवित्र आत्मा ही पाप निश्चय प्रतीति दे सकता हैं और एक व्यक्ति को परमेश्वर के लिए जीने के लिए परिवर्तित कर सकता है।
केवल पवित्रआत्मा एक व्यक्ति को जीवन दे सकता हैं। इसलिए परमेश्वर के एक सेवक के रूप में, आप को अपने जीवन को परमेश्वर के आत्मा को समर्पित करना अवश्य हैं। आप को पवित्रआत्मा की उपस्थिति, पूर्णता और सामर्थ से भरना अनिवार्य हैं।
"और जब वह (पवित्रआत्मा) आएगा, तब वह संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा। पाप के विषय में इसलिए कि वे मुझ पर विश्वास नहीं करते। और धार्मिकता के विषय में इसलिए कि मैं पिता के पास जाता हूं। और तुम मुझे फिर न देखोगेः न्याय के विषय में इसलिए कि संसार का सरदार दोषी ठहराया गया हैं" (यूह 16:8-11)।
ई) आप के प्रचार का एक लक्ष्य और केवल एक ही लक्ष्य होना हैः प्रभु यीशु मसीह में विश्वास में लोगों की अगुवाई करना। आप को ठीक वही करना हैं जो उपरोक्त पवित्रशास्त्र कहता हैः आपको मनुष्यों के विश्वास को मनुष्यों की बुध्दि में नहीं रखना हैं, परन्तु परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ में (1 कुरि. 2:5)। मनुष्यों की बुध्दि मनुष्य को नहीं बचा सकती। केवल परमेश्वर की सामर्थ ही बचा सकती है। एक मनुष्य के लिए केवल यह मान लेना कोई मूल्य नहीं रखता...
* कि यीशु मसीह जीवित था, यह कि वह एक ऐतिहासिक व्यक्ति था।
* कि यीशु मसीह उध्दारकर्ता हैं, कि वह वास्तव में परमेश्वर का पुत्र हैं।
* कि अन्य धर्म और मत सत्य नहीं हैं।
एक व्यक्ति का उध्दार मानवीय ज्ञान और मनुष्यों की बुध्दि पर खड़ा नहीं हो सकता। मानवीय तर्क और निवेदन तर्कयुक्त लग सकते हैं, परन्तु उन में कोई आत्मिक सामर्थ नहीं हैं। कोई व्यक्ति - कोई भाषण और कोई प्रचार - एक मानवीय आत्मा को परिवर्तित करके उसे अनन्त जीवन नहीं दे सकता हैं। इसलिए आपको परमेश्वर के आत्मा के प्रभाव और सामर्थ में बोलना और प्रचार करना हैं।
परमेश्वर के आत्मा से कुछ भी कम एक व्यक्ति के विश्वास को मनुष्य के ज्ञान और बुध्दि में रखता हैं। पुकारने वाली आवश्यकता हैं कि परमेश्वर के सेवक और परमेश्वर के लोग परमेश्वर के आत्मा व्दारा नियंत्रित हों जिससे कि परमेश्वर उनके व्दारा अपनी सामर्थ को एक खोए हुए और मरणासन्न जगत पर प्रदर्शित कर सकें।
"परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे" (प्रेरि. 1:8)।
"और प्रेरित बड़ी सामर्थ से प्रभु यीशु के जी उठने की गवाही देते रहे और उन सब पर बड़ा अनुग्रह था" (प्रेरि. 4:33)।
4. परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए आप को प्रचार और शिक्षा देना हैं, मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिए नहीं। आपको सुसमाचार को पतला नहीं करना हैं और न चापलूसी के शब्दों का प्रयोग करना हैं समर्थन प्राप्त करने के लिए।
पर जैसा परमेश्वर ने हमें योग्य ठहराकर सुसमाचार सौंपा, हम वैसा ही वर्णन करते हैं; और इस में मनुष्यों को नहीं, परन्तु परमेश्वर को, जो हमारे मनों को जांचता है, प्रसन्न करते हैं। क्योंकि तुम जानते हो, कि हम न तो कभी लल्लोपत्तो की बातें किया करते थे, और न लोभ के लिये बहाना करते थे, परमेश्वर गवाह है। (1 थिस्स. 2:4-5)।
विचार
आप को सदा प्रचार करना और शिक्षा देना है परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए, मनुष्यों को नहीं। आप को सुसमाचार को कभी भी पतला नहीं करना है और न चापलूसी के शब्दों का प्रयोग करना हैं लोगों का अनुमोदन और समर्थन पाने के लिए। अधिकांश लोग सुनना नहीं चाहते...
* पाप और न्याय के विषय में।
* उध्दार पाने के लिए मसीह की मृत्यु पर निर्भर रहने की मनुष्यों की अतिआवश्यकता के विषय में।
* उस मांग के विषय में कि एक व्यक्ति उस सब को जो वह हैं और जो उसके पास हैं मसीह को समर्पित करे जिससे कि एक हताश जगत की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकें।
सत्य का प्रचार सदा लोकप्रिय नहीं हैं. शारीरिक और अविश्वासी लोगों में। इसलिए, जब आप ऐसे लोगों के मध्य में होते हैं जो सांसारिक हैं, तब आप को प्रलोभन हो सकता हैं कि लोगों को प्रसन्न करने के लिए अपने संदेश को कोमल कर दें। प्रलोभन विशेषकर प्रबल हो सकता हैं यदि आपकी जीविका खतरे में हैं।
तथापि, ध्यान दें कि पौलुस क्या कहता हैं; वह दो महिमामय गवाहियां देता हैं।
अ) पौलुस स्पष्ट कहता हैंः उसने केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहा हैं, मनुष्यों को नहीं। आप को भी, केवल परमेश्वर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करना हैं, मनुष्यों को नहीं। ऐसा करने के लिए दो प्रबल कारण हैं।
* प्रथम, परमेश्वर ही वह व्यक्ति हैं जिस ने आपको सुसमाचार सौंपा हैं, मनुष्यों ने नहीं। सुसमाचार का स्वामी परमेश्वर हैं, और वही वह व्यक्ति हैं जिसने आप को सुसमाचार प्रचार के लिए बुलाया हैं। सुसमाचार के निर्माण में मनुष्यों का कोई हाथ नहीं हैं और न आप को बुलाने में। परमेश्वर आपकी देखभाल करेगा जब आप सुसमाचार प्रचार करते हैं। परमेश्वर ने आपको प्रचार के लिए बुलाया हैं, इसलिए आप परमेश्वर के हैं। इसलिए, आप परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं कि आप की देखभाल करे यदि मनुष्य सुसमाचार के विरूध्द प्रतिक्रिया करते और आप पर आक्रमण करते हैं।
* व्दितीय, केवल परमेश्वर आपके मन की जांच करेगा और आपका न्याय करेगा। एक दिन आपको खडे होकर अपनी सेवकाई का लेखा देना होगा, और आप को परमेश्वर के सामने खड़ा होना हैं, मनुष्यों के सामने नहीं। आपके लिए पृथ्वी पर मनुष्य कुछ कठिनाई का कारण बन सकते हैं, परन्तु परमेश्वर आप के लिए अनन्तकाल के लिए कठिनाई का कारण होगा यदि आप परमेश्वर के सुसमाचार का दुरूपयोग या विरोध करते हैं।
ब) पौलुस एक और स्पष्ट बात कहता हैं: उसने अपने लाभ के लिए प्रचार या शिक्षा नहीं दी। और न आपको या अन्य किसी सेवक को ऐसा करना हैं।
"चापलूसी" (कोलाकीयम) शब्द का सदा अर्थ हैं उस प्रकार की चापलूसी जो लोगों से कुछ पाने के लिए की जाती हैं (विलियम बाक्लै। फिलिप्पियों, कुलुस्सियों और थिस्सलनीकियों की पत्रियां। "द डेली स्टड़ी बाईबिल"। फिलाडेलफिया, पी.ए. द वेस्टमिन्सटर प्रेस 1957, पृ. 221)। पौलुस ने लोगों की चापलूसी नहीं की उनकी साथी, अनुयाई होने या समर्थन प्राप्त करने के लिए। अवश्य उसने लोगो की सराहना की, और नए नियम में उसकी पत्रियां दर्शाती हैं कि बहुधा उसने उनकी सराहना की। परन्तु उसने सच्चाई से यह किया, सदा उन दुर्बल क्षेत्रों को आच्छादित करते हुए जिन को प्रबल बनाने की लोगों को आवश्यकता थी उनके प्रबल और सराहनीय क्षेत्रों के साथ। प्रभु के एक सेवक के रूप में, आप को लोगों की सराहना करना हैं, परन्तु केवल सच्चाई के साथ। आप को कभी भी लोगों की चापलूसी नहीं करना हैं उनका समर्थन पाने या अनुयायी बनाने या अपनी जीविका को बढ़ाने के लिए।
"लालच" शब्द दर्शाता हैं कि पौलुस पर आरोप लगाया गया था कि वह लाभ के लिए सेवकाई में थाः कि उसने सेवकाई को चुना था जीविकोपार्जन के लिए, पैसा बनाने के लिए। दृढ़तापूर्वक, पौलुस इसका इंकार करता हैं और कहता हैं कि उसकी जीवन शैली इसे प्रमाणित करती हैं। वह घोषणा करता हैं कि कलीसिया सत्य को जानती हैं और परमेश्वर इस सत्य का गवाह हैं।
आप को कभी भी सेवकाई का उपयोग लालच के एक वस्त्र के रूप में नहीं करना हैं कि आप को इससे कुछ मिले। सेवकाई में होने का आपका उद्देश्य पैसा बनाना नहीं है, और न जीविकोपार्जन हैं। आपका उध्देश्य हैं प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार का प्रचार करना और शिक्षा देना।
एक सेवक के रूप में, आप को कभी भी सुसमाचार को पतला नहीं करना हैं क्योंकि आपको भय हैं प्रतिक्रिया का, जीविकोपार्जन की हानि का, आय, या वेतन में होनेवाली बढ़त का। आप को सदा प्रचार करना और शिक्षा देना हैं परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए,, न कि मनुष्यों को।
5. आप को स्वयं की महिमा नहीं करना हैं, आप को केवल क्रूस की ही महिमा करना हैं। आप को सांसारिक लोकप्रियता और मान्यता की खोज नहीं करना हैं,
और न अच्छा प्रभाव डाल कर स्वय पर ध्यानाकर्षण करने का प्रयत्न करना है।
"हम मनुष्यों से आदर नहीं चाहते थे, और न तुम से, न किसी और से" (1 थिस्स. 2:6)।
"जितने लोग शारीरिक दिखाव चाहते हैं वे तुम्हारे खतना करवाने के लिए दबाव देते हैं, केवल इसलिए कि वे क्रूस के कारण सताए न जाएं। क्योंकि खतना करानेवाले आप तो, व्यवस्था पर नहीं चलते, पर तुम्हारा खतना कराना इसलिए चाहते हैं, कि तुम्हारी शारीरिक दशा पर घमण्ड करें" (गला. 6:12-13)।
"पर ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिसके व्दारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं" (गला 6:14)।
"क्योंकि हम अपने को नहीं, परन्तु मसीह यीशु को प्रचार करते हैं, कि वह प्रभु हैं; और अपने विषय में यह कहते हैं, कि हम यीशु के कारण तुम्हारे सेवक हैं" (2 कुरि. 4:5)।
विचार
पौलुस सीधी बात करता हैं, अपने कथन में वह सीधा वार करता हैं; उसने महिमा, सम्मान, आदर या लोगों की मान्यता नहीं चाहा। (1 थिस्स. 2:6)। दो महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान दें।
अ) एक सेवक के रूप में, आप को स्वयं की महिमा नहीं करना हैं। आप को वही करना हैं जो पौलुस कहता हैं कि उसने किया आप को लोगों से महिमा, सम्मान, आदर या मान्यता की चाह नहीं करना हैं। एक महान प्रचारक या अच्छे सेवक के मान्यता पाने की चाह पौलुस को नहीं थी। उसे एक अगुवें या उच्च पदधारी के रूप में मान्यता पाने को चाह नहीं थी परन्तु बड़ी त्रासदी यह हैः कुछ सेवक स्वयं की महिमा करते हैं; वे सांसारिक रूप से बड़े प्रभावशाली दिखना चाहते हैं। कुछ सांसारिक लोकप्रियता और मान्यता की खोज में रहते हैं।
उपरोक्त गलातियों 6:12 पर ध्यान दें। परमेश्वर के सेवक के लिए यह एक अत्यन्त आवश्यक पाठ हैं। झूठे सेवकों ने गलातिया की कलीसियाओं में घुसपैठ मचा दी थी। वे पौलुस और जो सुसमाचार वह प्रचार करता था दोनों का विरोध करते थे। वे इस पर अत्यन्त बल देते थे कि एक व्यक्ति को धर्म के मूल कर्मकाण्ड को करना हैं, अर्थात् खतना। उध्दार के लिए खतने को वे आवश्यक बताते थे। यदि एक व्यक्ति का खतना हो चुका था, तो वह उध्दार के मार्ग पर काफी आगे था। पौलुस ने इस स्थिति पर आक्रमण करके झूठे शिक्षकों के विरूध्द एक प्रबल आरोप लगाया। सांसारिक उद्देश्यों व्दारा चालित होने का आरोप उसने उन पर लगाया। यह ध्यान में रखें कि वह कलीसिया के झूठे शिक्षकों और सेवकों से निपट रहा था। जो उसे कहना था वह प्रत्येक पीढ़ी के शिक्षकों के लिए एक प्रबल पाठ हैं।
प्रथम, झूठे शिक्षकों ने अपने साथियों का अनुमोदन पाकर सताव से बचने का प्रयास किया। परमेश्वर के पक्ष की अपेक्षा उन्होंने मनुष्यों का पक्ष चाहा। सुसमाचार के आरम्भिक सेवकों में से अनेक याजक थे जिन्होंने यीशु मसीह को जगत के उध्दारकर्ता के रूप में देखा। तथापि उन्होंने उसे व्यवस्था के एक योग के रूप में ही ग्रहण किया। उन्होंने कहा कि यीशु मसीह प्राथमिक रूप से यह दर्शाने के लिए आया कि परमेश्वर कैसे चाहता हैं कि हम जीए; इसलिए, वह व्यवस्था में केवल एक योग हैं। व्यवस्था फिर भी महत्वपूर्ण थी परमेश्वर तक पहुंचने में हमें व्यवस्था और यीशु मसीह दोनों के व्दारा परमेश्वर तक पहुंचना था। इसलिए, उन दिनों में यह घोषणा करना कि परमेश्वर तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग मसीह था। सेवकाई में लोकप्रिय नहीं था। जो सेवक केवल मसीह का प्रचार करते थे वे उपहास, हंसी, दुरूपयोग और तिरस्कार व्दारा सताए जाते थे। एक सेवक जो केवल मसीह के क्रूस व्दारा उध्दार का प्रचार करता था उसे व्यवस्था और स्थापित धर्म दोनों के विनाशक के रूप में समझा जाता था। इसलिए स्थापित धर्म के सेवक क्रूस के सेवकों को सताते थे। परिणामस्वरूप, अत्यन्त साहस की आवश्यकता थी खड़े होकर सत्य का प्रचार करने के लिए। अधिकांश ने सरल मार्ग चुना और सताव से बचने के लिए स्थापित धर्म के साथ - साथ चले।
आप - परमेश्वर के सेवकों के रूप में हम सब को स्वयं से यह पूछने की आवश्यकता हैः क्या मैं जगत के स्थापित और लोकप्रिय धर्म के साथ साथ चलता हूं यीशु मसीह और उसके वचन के सत्य का प्रचार करने की अपेक्षा? क्या मै क्रूस के उपहास, तिरस्कार, और दुरूपयोग से डरता है? कितनी बार मैं प्रलोभित होता है , क्रूस के संदेश को हल्का करूं सभा में कुछ लोगों को ठोकर खाने के बचाने के लिए? क्या मुझे प्रतिक्रिया से डरना हैं यदि में केवल मसीह के क्रूस में उध्दार के सरल संदेश का प्रचार करूं? क्या मेरे साथियों और समुदाय के अगुवों की प्रतिक्रिया से मुझे डरना हैं?
व्दितीय, झूठे शिक्षकों ने अपनी संख्या में वृध्दि करने के व्दारा एक अच्छा प्रदर्शन करना चाहा (गला. 6:13)। ठीक से ध्यान दें कि पवित्रशास्त्र क्या कहता हैं: वे लोगों का खतना कराना चाहते थे जिससे कि वे अपनी संख्या पर घमण्ड कर सकें। लोगों को प्रभु और व्यवस्था का आज्ञापालन सिखाने में उनकी उतनी रूचि नहीं थी जितनी कि उनकी अपनी सुरक्षा के निर्माण में थी। एक विकासशील सेवकाई के दिखावे के व्दारा वे मान्यता चाहते थे। वे लोगों की भलाई से अधिक लोगों का अनुमोदन और ग्राह्यता चाहते थे। एक विकासशील सेवकाई का दिखाना उनकीः प्राथमिक चिंता थी जिससे कि वे अपने जीविकोपार्जन और लोगों के साथ उनके पद को सुरक्षित करलें।
आंकड़े के विकास पर बढ़ी हुई संख्या से लोग प्रभावित होते हैं। सब यह जानते हैं, धार्मिक और साधारण अगुवे दोनों। परिणामस्वरूप, आप को बपतिस्मों, सभा उपस्थिति, बाइबिल अध्ययन, कार्यक्रमों, या गतिविधियों में विकास पर बल देने के प्रलोभन के विरूध्द रक्षा करना हैं। आपको संख्या में वृध्दि पर बल देने के विरूध्द रक्षा करना हैं, क्योंकि संख्या में वृध्दि स्वयं की महिमा करवा सकती हैं। बढ़ी हुई संख्या...
* छवि बनाती हैं
* अहं बढ़ाती हैं
* सफलता बताती हैं
* ख्याति बढ़ाती हैं
* पद सुरक्षित करती हैं
* अवसरों को बढ़ाती हैं
* वरदानों और योग्यताओं की ओर संकेत करती हैं
* प्रतिभा पर बल देती हैं
* व्दारों को खोलती हैं
* आए वृध्दि में सहायक हैं
* ध्यानाकर्षण करती हैं।
ब) एक सेवक के रूप में, आप को केवल एक ही बात पर घमण्ड करना हैः मसीह के क्रूस पर (गला. 6:14)। मसीह का क्रूस परमेश्वर के एक सच्चे संवक का एक मात्र घमण्ड या डींग हैं, क्योंकि परमेश्वर तक पहुंचने का क्रूस के अतिरिक्त कोई भी अन्य मार्ग नहीं हैं। एक व्यक्ति को परमेश्वर तब ही ग्रहण करता हैं जब वह उस के पास क्रूस के मार्ग से आता हैं। परमेश्वर व्दारा ग्रहणयोग्य बनने का कोई अन्य मार्ग नहीं हैं। इसलिए सच्चे सेवक के पास कोई अन्य संदेश, डींग मारने का कोई अन्य सत्य नहीं हैं। ध्यान दे क्यों, क्योंकि क्रूस जगत को आप के लिए और आप को जगत के लिए क्रूसित करता हैं: इसका अर्थ क्या हैं?
प्रथम, क्रूस जगत को आप के लिए क्रूसित करता हैं। जगत में सब प्रकार के आकर्षण हैं जो आप को लुभाते हैं, और आपका शरीर कभी-कभी उन आकर्षणों की चाह करता हैं। ऐसे आकर्षण हैं जैसे कि...
* पद
* यौन
* शक्ति
* आनन्द
* ग्राह्यता
* आदर
* मान्यता
* भोजन
* पैसा
* संपदा
सूची लगातार बढ़ाई जा सकती हैं पृथ्वी पर प्रत्येक लुभानेवाले आकर्षण को सम्मिलित करने के लिए, परन्तु सब अभिलाषाओं का अन्त क्या हैं? पतन, सड़न, मृत्यु, और न्याय का एक अहसास। स्वयं मनुष्य वृध्द होता हैं, मर जाता हैं, और सड़ जाता हैं। पृथ्वी पर ऐसा कुछ नहीं हैं जो अनन्त काल तक जीवित रहेगा या बना रहेगा। यदि आप अनन्तकाल तक जीवित रहना चाहते हैं, तो किसी को जो सर्वशक्तिमान हैं इस जगत का ढांचा पुनः बनाना होगा। किसी को जगत को नष्ट करके पुनः बनाना होगा, जो कुछ उस में हैं, आपके शरीर समेंत। महिमामय समाचार यह हैं कि परमेश्वर ने यह कार्य कर दिया हैं। परमेश्वर ने दर्शाया हैं कि वह इस जगत से प्रेम करता हैं. और उसने अपने प्रेम को सबसे सिध्द तरीके से प्रदर्शित किया हैं जो संभव था। कैसे?
परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में भेज दिया आप के लिए मरने के लिए और आप को इस जगत से छुटकारा देने के लिए। जब यीशु मसीह क्रूस पर मरा, तो उसने आपके अपराधों के दण्ड को सहा। आप के विरूध्द व्यवस्था की दण्डाज्ञा को उसने लिया और आप के लिए दण्ड को सहा। इसलिए यदि आप विश्वास करते हैं कि यीशु मसीह आप के लिए मरा उस बिन्दु तक विश्वास करते हो कि आप मसीह के साथ क्रूसित हो गए। आप को कभी भी मरना नहीं हैं। जब वह क्षण आता हैं कि आप इस जगत से अगले में जाएं, तो परमेश्वर आप को सीधे उसकी उपस्थिति में अनन्तकाल के लिए स्थानांतरित करेगा। यह सब पलक झपकते ही हो जाएगा। क्योंकि आप मसीह में विश्वास करते हैं - वास्तव में विश्वास करते और उसके पीछे चलते हैं आप कभी न मरेंगे; मृत्यु का स्वाद कभी न चखेंगे या अनुभव करेंगे।
आप के लिए जगत के क्रूसित होने का यही अर्थ हैं। आप को कभी भी जगत के मार्ग पर नहीं जाना हैं, अर्थात्, पाप, सड़न, मृत्यु और न्याय के मार्ग पर।
* आप को जगत, और उसके सब बंधनों, मृत्यु के बंधन समेत, से छुड़ाने के लिए यीशु मसीह मरा।
* यीशु मसीह का आत्मा (पवित्र आत्मा) आप में जीवित हैं आप को जगत और उसके सब नाशमान आकर्षणों पर जय पाने की शक्ति देने के लिए। परमेश्वर के आत्मा व्दारा, शरीर की अभिलाषाओं पर जय पाने की सामर्थ आप के पास हैं।
व्दितीय, क्रूस आपको जगत के लिए क्रूसित करता हैं। इसका अर्थ क्या हैं? जब आप जगत के लिए मर जाते हैं, तो आप जगत के आकर्षणों और आनन्दों से विमुख हो जाते हैं; इसलिए आप जगत के लिए अनाकर्षित बन जाते हैं। सांसारिक लोग पसन्द नहीं करते जो वे देखते हैं, क्योंकि आप संसार की जीवनशैली और आनन्दों का तिरस्कार कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, सांसारिक लोग आप से कोई संबंध नहीं रखना चाहते। वे चाहते हैं कि आप उन के मार्ग से हट जाएं। वे चाहते हैं कि आप का अस्तित्व न रहे, जैसा कि उनके लिए एक मृत व्यक्ति का हैं। इसलिए जब आप मसीह के क्रूस पर आते हैं कि आप का अस्तित्व न रहे, जैसा कि उनके लिए एक मृत व्यक्ति का हैं। इसलिए जब आप मसीह के क्रूस पर आते हैं, तो क्रूस आपको जगत और उसके मार्गो के लिए क्रूसित कर देता हैं। अब आप संसार के लिए आकर्षित नहीं हैं।
बिन्दु यह हैं: परमेश्वर के एक सेवक के रूप में, आप को मसीह के क्रूस
पर घमण्ड करना हैं, स्वयं पर नहीं। मसीह के क्रूस में परमेश्वर ने आपको सब कुछ दिया है, वर्तमान और अनन्तकाल दोनों के लिए जीवन इस संसार की अभिलाषाओं से और शरीर, मृत्यु और आनवाले न्याय दोनों से छुटकारा। इसलिए, आप को सांसारिक लोकप्रियता और मान्यता नहीं खोजना हैं, और न एक अच्छा प्रभाव डालने और न स्वयं पर ध्यानकर्षण की चाह करना हैं। आप को मसीह में घमण्ड करना हैं और केवल उस में।
6. आप को स्वयं का प्रचार नहीं करना हैं स्वयं की महिमा नहीं परन्तु मसीह यीशु प्रभु का प्रचार करना हैं।
"क्योंकि हम अपने को नहीं, परन्तु मसीह यीशु प्रभु का प्रचार करते हैं; और स्वयं को यीशु के लिए आपके सेवक कहते हैं" (2 कुरि. 4:5)।
विचार
सेवकाई मांग करती हैं सेवक होने की कि आप यीशु मसीह के और दूसरों के सेवक बनें। उपरोक्त पवित्रशास्त्र में दो महत्वपूण बिन्दुओं पर ध्यान दें।
अ) आपको मसीह का प्रचार करना हैं, स्वयं का नहीं।
* लोगों की दृष्टि में स्वयं को उच्च करने के लिए आप प्रचार नहीं करते हैं।
* आप स्वयं के विचारों, धारणाओं, सोच, मतों या दर्शन का प्रचार नहीं करते हैं।
* आप स्वयं की प्रतिभा, योग्यता, प्रवाह, भाषण या अगुवाई व्दारा लोगों को प्रभावित करने के लिए प्रचार नहीं करते हैं।
आप यीशु मसीह का प्रचार करते हैं और केवल उसका। ध्यान दें कि आप क्या प्रचार करते हैं: "मसीह यीशु प्रभू है"। सुसमाचार का संदेश हैं कि "मसीह यीशु प्रभु हैं।"
* मसीह का अर्थ हैं मसीहा, इतिहास के आरम्भ से परमेश्वर व्दारा प्रतिज्ञा किया गया उध्दारकर्ता मसीहा।
* मसीह यीशु है, नासरत का बढ़ई।
* यीशु प्रभु हैं, स्वयं प्रभु परमेश्वर।
"परमेश्वर ने उसी यीशु को जिसे तुमने क्रूस पर चढ़ाया, प्रभु भी ठहराया और मसीह भी" (प्रेरि. 2:36)।
"और वह तुरन्त आराधनालयों में यीशु का प्रचार करने लगा, कि वह परमेश्वर का पुत्र है" (प्रेरि 9:20)।
"कि यदि तू अपने मुह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करें और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उध्दार पाएगा" (रोमि 10:9)।
ब) आप को मनुष्यों की सेवा करना हैं, स्वयं की नहीं। "सेवक" (डाऊलौस) शब्द पर ध्यान देंः इसका अर्थ हैं बंधुवा दास। आप को दूसरों का एक दास होना हैं, उनकी सेवा करना हैं। आप को लोगों के प्रति उतना ही समर्पित होना हैं जितना कि एक दास अपने स्वामी के प्रति होता हैं, उनकी सहायता करने और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उतना ही तत्पर रहना हैं जितनी दत्परता की मांग एक दास से उसका स्वामी करेगा। ध्यान दें कि क्योंः यीशु के लिए। इसका क्या अर्थ हैं?
यीशु हमारा सेवक या दास बन गया। उसने स्वयं का बलिदान प्रतिदिन किया और उसने यह हमारे लिए किया। उसने संघर्ष किया हमारे लिए संसार और शरीर पर जय पाने के लिए, पाप और अभिलाषा पर जय पाने के लिए, जीवन के दास बनानेवाले बंधनों और आदतों से स्वतन्त्रता के लिए। यीशु मसीह ने प्रतिदिन दुख उठाया और तब स्वयं का बलिदान अंतिम अर्थ में किया मरने के व्दारा और हमारे दण्ड को हमारे लिए उठाने के व्दारा। उसने हमारे लिए स्वयं को दे दिया, हमें बचाने के लिए हमारा दास बन गया। इसलिए, प्रभु के सेवक के रूप में आप को मनुष्यों के एक सेवक बनना हैं; आप को स्वयं को बलिदान कर देना हैं यीशु मसीह के कारण मनुष्यों की सेवा में। आप को यह करना हैं क्योंकि यीशु मसीह ने आप के लिए ऐसा किया। मसीह के कारण, उस के कारण जिस ने आप से प्रेम किया और स्वयं को आप के लिए दे दिया, दूसरों की सेवा करने से अधिक उच्च सेवा नहीं की जा सकती हैं।
"जो कोई तुम में बड़ा होना चाहे वह तुम्हारा सेवक बने। और जो कोई तुम में प्रधान होना चाहे, वह सब का दास बने" (मर. 10:43-44)।
"यदि मैंने प्रभु और गुरू होकर तुम्हारे पांव धोए; तो तुम्हें भी एक दूसरे के पांव धोना चाहिए" (यूह. 13:14)।
"तुम एक दूसरे के भार उठाओं, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो" (गला. 6:2)।
7. आप में स्थिरता होना हैं और समय की एक लम्बी अवधि तक शिक्षा देना हैं।
"और जब (बरनबास) उससे मिला तो उसे अन्ताकिया में लाया, और ऐसा हुआ कि वे एक वर्ष तक कलीसिया के साथ मिलते और बहुत लोगों को उपदेश देते रहे और चेले सबसे पहिले अन्ताकिया ही में मसीही कहलाए" (प्रेरि. 11:26)।
"सो वह उन में परमेश्वर का वचन सिखाते हुए डेढ़ वर्ष तक रहा" (प्रेरि. 18:11)।
विचार
आप में स्थिरता होना हैं और समय की एक लम्बी अवधि तक शिक्षा देना हैं। लोगों को परमेश्वर का वचन सिखाने में समय लगता हैं। आपकी शिक्षा और शिक्षाशैली अव्दितीय हैः कोई और परमेश्वर के वचन का प्रचार और शिक्षा आप के समान नहीं कर सकता। परमेश्वर ने आपको आत्मिक वरदान आत्मिक योग्यता दिया हैं कि परमेश्वर के वचन की शिक्षा स्वयं के अव्दितीय तरीके से दें। जब आप वचन की शिक्षा देते हैं, तो कुछ लोग - प्रत्येक नहीं, पर कुछ लोग - वचन को समझ पाते हैं जैसा पहिले कभी नहीं समझा। इसलिए, आप को स्थिर रहना हैं जहां आप हैं और समय की एक लम्बी अवधि तक शिक्षा देना हैं।
उपरोक्त, प्रेरितों. 11:26 में तीन सत्यों पर ध्यान दें।
अ) कलीसिया के एकत्रित होने का उध्देश्य था प्रभु के विषय में शिक्षण पाना।
ब) "अनेक लोग” सिखाए गए थे, केवल कुछ नहीं। अनेक लोग भूखे थे सत्य को सीखने के। प्रत्येक सत्य को सीखने का भूखा नहीं था, परन्तु अनेक थे। और पौलुस और बरनबास ने उन को सिरवाया जो भूखे थे। आप को भी, उन सब को सिखाना हैं जो भूखे हैं अनेक या कुछ आपकी कलीसिया में।
स) सेवक और लोग स्थिरता से एक पूरे वर्ष एकत्रित होते रहे। परमेश्वर के वचन में सघन प्रशिक्षण के लिए वे एकत्रित हुए।
प्रेरितों. 18:11 पर ध्यान दें जहां पौलुस ने डेढ़ वर्ष तक कुरिन्थ में विश्वासियों को सघन प्रशिक्षण दिया।
स्मरण रखेंः विश्वासी बहुधा रविवार के अतिरिक्त अधिकांश रातों में प्रचार और शिक्षण के लिए मिलते थे। आप को अपने लोगों के साथ स्थिरतापूर्वक समय की एक लम्बी अवधि तक मिलना होगा उस योगदान को देने के लिए जो परमेश्वर चाहता हैं कि आप उनके जीवनों में दें।
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