इस पुस्तक में बाइबल की घटनाओं को प्रस्तुत किया गया है।

इस पुस्तक का उद्देश्य किसी को किसी धर्म संस्था का सदस्य बनाना नहीं है। परन्तु इसका उद्देश्य पाप के अंधकार में भटके हुए मनुष्यों को सच्चे परमेश्वर का मार्ग बताना है।

आशा की किरण 

परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की

    आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की। पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी : गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था: परमेश्वर का आत्मा जल की सतह पर मंडराता था। तब परमेश्वर ने कहा, “ उजियाला हो” तो उजियाला हो गया । और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; तो परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। उसने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। संध्या हुई फिर सबेरा हुआ; इस प्रकार पहिला दिन हो गया ।

    फिर परमेश्वर ने कहा, "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भागों में बंट जाए| " तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया और वसा ही हों गया। और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा | सन्ध्या हुई फिर सबेरा हुआ; इस प्रकार दूसरा दिन हो गया।

    फिर परमेश्वर ने कहा, " आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सुखी भूमि दिखाई दे ।" और वैसा ही हो गया। परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा; तथा जो जल इकट्ठा हुआ था उसको उसने समुद्र कहा। और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

    तब उसने कहा, " पृथ्वी वनस्पति उत्पन्न करे, अर्थात् पृथ्वी पर बीजवाले छाटे छोटे पेड़-पौधे, और फलदायक वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार होते हैं पृथ्वी पर उगें। और वैसा ही हो गया। और पृथ्वी से वनस्पति, जिनमे अपनी अपनी जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदायक वृक्ष जिनके बीज एक एक की जाति के अनुसार उन्ही में होते हैं उगें : तब परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। संध्या हुईं फिर सवेरा हुआ : इस प्रकार तीसरा दिन हो गया।

    फिर परमेश्वर ने कहा, " दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हो; और वे नियत समयों, दिनो और वर्षों के संकेत बनें। और ये ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें । और वैसा ही हो गया। परमेश्वर ने दो बडी ज्योतियाँ बनाई; उनमें से बडी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिये, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिये बनाया। उसने तारागण भी बनाए । परमेश्वर ने उनको आकाश के अन्तर में इसलिये रखा कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें, तथा दिन और रात पर प्रभुता करें और उजियाले को अन्धियारे से अलग करें। परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। सन्ध्या हुई फिर सवेरा हुआ; इस प्रकार चौथा दिन हो गया।


परमेश्वर ने जाति जाति को बनाया 

    फिर परमेश्वर ने कहा, जल जीव-जन्तुओं से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें। इसलिए परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की सृष्टि की जिनसे जल बहुत ही भर गया और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्टि की । परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। उसने यह कहकर उनको आशीष दी, फूलो-फलो,  समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्षी पृथ्वी पर बढ़ें। और सन्ध्या हुई फिर सवेरा हुआ; इस प्रकार पांचवां दिन हो गया । 

    फिर परमेश्वर ने कहा, " पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी अर्थात् घरेलू पशु, रेंगने वाले जन्तु, पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों। और वैसा ही हो गया । सो परमेश्वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन–पशुओं को, और जाति जाति के पालतू पशुओं को, और भूमि पर रंगनेवाले जाति जाति के सब जीव-जन्तुओ को बनाया; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

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परमेश्वर ने मनुष्य जाति को बनाया

    फिर परमेश्वर ने कहा, " हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता मे बनाएं ; और वे समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों, घरेलू पशुओं, जंगली जानवर और सब रेंगनेवाले जीव-जन्तुओं पर अधिकार रखें तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मानव की सृष्टि की। और परमेश्वर ने उनको आशीष दी; और उनसे कहा, " फूलो- फलो और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रंगने वाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।" फिर परमेश्वर ने उनसे कहा, " सुनो, जितने बीजवाले पौधे और फल देनेवाले पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं, वे सब मैंने तुम्हें दिए है; वे तुम्हारे भोजन के लिए है। और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले जीव-जन्तु हैं, जिनमें जीवन के प्राण है, उन सब के खाने के लिए मैंने सब प्रकार के छोटे पेड़-पौधे दिए है। " और वैसा ही हो गया ।

    तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा तो क्या देखा कि वह बहुत ही अच्छा है। तब सन्ध्या हुई फिर सवेरा हुआ इस प्रकार छठवाँ दिन हो गया। इस प्रकार आकाश और पृथ्वी और उनके समस्त गणों का बनाना पूरा हो गया। और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह कर रहा था सातवें दिन समाप्त किया। उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम लिया। और परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने अपनी सृष्टि के रचना की सारे काम से विश्राम लिया ।

शैतान के द्वारा छले गए 

    जिस दिन परमेश्वर ने पृथ्वी और आकाश को बनाया, तब मैदान का कोई पौधा भूमि पर न था, और न मैदान का कोई छोटा पेड़ उगा था, क्योंकि परमेश्वर ने पृथ्वी पर जल नहीं बरसाया था, और भुमि पर खेती करने के लिए मनुष्य भी नहीं था; तौभी कुहरा पृथ्वी से उठता था जिससे सारी भूमि सिच जाती थी। और परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नथनों में जीवन का भवास फूक दिया; और आदम जीवित प्राणी बन गया। फिर, परमेश्वर ने पूर्व की ओर अदन नामक स्थान पर एक वाटिका लगाई;
    और वहाँ आदम को जिसे उसने बनाया था रख दिया। और परमेश्वर ने भूमि से सब भांति के वृक्ष, जो देखने में मनोहर और जिनके फल खाने में अच्छे है, उगाए और वाटिका के बीच में जीवन के वृक्ष को और भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष को भी लगाया।

    जब परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे, तब परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, " तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है पर भले-बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

    परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब मे सर्प धूर्त था । उसने स्त्री से कहा, " क्या परमेश्वर ने वास्तव में कहा है कि तुम इस वाटिका के किसी भी वृक्ष का फल न खाना ?" स्त्री ने सर्प से कहा, " इस वाटिका के सभी वृक्षों के फल हम खा सकते हैं, पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे। " तव सर्प ने स्त्री से कहा, " तुम वास्तव में नहीं मरोगे, वरन् परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आंखे खुल जाएंगी, और तुम भले-बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।" जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने मे अच्छा, और देखने मे लुभावना और बुद्धि देने के लिए चाहनें योग्य भी तब उसने उसमें से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया ।

    फिर उन्हें दिन के ठंडे समय वाटिका में चलता-फिरता परमेश्वर का शब्द सुनाईं दिया जिसमे डर कर आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच छिपू गए। तब परमेश्वर ने पुकारकर आदम से पूछा, "तू कहाँ है ?" उसने कहा, "मैं वाटिका में तेरा शब्द सुनकर डर गया क्योंकि मैं नंगा हू इसलिए छिप गया।" उसने कहा, "तुझे किसने बताया कि तू नंगा है ? जिस वृक्ष के फल खाने को मैंने तुझे मना किया था, क्या तु ने उसका फल खाया है ?


    "आदम ने कहा, जिस स्त्री को तु, ने मेरे संग रहने को दिया है, उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैंने खाया है। " तब परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह  क्या किया ?" स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैंने खाया।" फिर परमेश्वर ने स्त्री से कहा, मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दुःख को बहुत बढाऊगा; तू पीडित होंकर सन्तान उत्पन्न करेगी; फिर भी तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।" 

    आदम से के फल के उसने कहा, “ तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष विषय में मैंने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तूने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है; तू उसकी उपज जीवन भर दुःख के साथ खाया करेगाः और वह तेरे लिये कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, और तु खेत की उपज खाएगा; और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्योकि तू उसी में से निकाला गया है तू मिट्टी है तू और फिर मिट्टी में ही मिल जाएगा। “ और आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदिमाता वहीं हुई। फिर परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के चमड़े के वस्त्र बनाकर उनको पहिना दिए। तब परमेश्वर ने उनको अदन की सुन्दर वाटिका में से बाहर निकाल दिया ताकि आदम भूमि पर खेती करे।

नूह

    हमारे आदि माता पिता आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा का उलंघन करके पाप किया। इसलिए हम भी जो उनकी संतान हैं, परमेश्वर की आज्ञा का उलंघन करके पाप करते है। इस प्रकार हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा का दुरुपयोग करके अपने मनमाने रास्ते पर चलते हैं जो अन्त में हमें विनाश की ओर पहुंचाता है । पृथ्वी पर जैसे जैसे मनुष्य बढ़ते गए वैसे वैसे उनका पाप और अधर्म भी बढ़ता गया । स्वर्ग से परमेश्वर यह देखकर बहुत दुःखी हुआ कि मनुष्य की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचारो में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरंतर बुरा ही होता है। क्योकि मनुश्य अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर को भूल गया है। सारे संसार में दुश्टता, अशान्ति, अत्याचार और उपद्रव फेल गया है। इसलिए परमेश्वर पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया और निर्णय लिया कि मै पृथ्वी पर से सब प्राणियो को मिटा दूंगा उस युग में नूह एक धर्मी पुरुष था । वह लोगों के पापों और दुष्कर्मों को देखकर मन में दुःखी हुआ । 



परमेश्वर ने नूह से कहा, "सव प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है। मैं जल प्रलय से उनका नाश कर डालूंगा। इसलिए तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक बड़ा जहाज बना और अपने घराने समेत जहाज में प्रवेश करना तथा सब जातियों के पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओं का एक एक जोड़ा जहाज में ले जाकर अपने साथ जीवित रखना।" परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने एक बड़ा जहाज बनाया । 

    जल प्रलय के आने तक नूह लोगों को चेतावनी देता रहा कि, " पाप के मार्ग को छाड़कर परमेश्वर के पास लौट आओ क्योंकि परमेश्वर समस्त पृथ्वी को जल प्रलय से नाश करनेवाला है।" परन्तु लोगों ने नूह को पागल समझकर उसका मजाक उड़ाया। 
    जब वह विशाल जहाज बनकर तैयार हो गया तब परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार नूह ने अपने सारे घराने समेत जहाज में प्रवेश किया और सब जातियों के पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं के एक एक जोड़े जहाज में आ गए। 


    तव स्वयं परमेश्वर ने जहाज का द्वार बन्द कर दिया। वर्षा चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृथ्वी पर होती रही जल पृथ्वी पर इतना अधिक बढ़ गया कि सारी धरती पर जितने बड़े बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए और पृथ्वी पर के सब पशु-पक्षी, जीव-जन्तु और सव मनुष्य मर गए । केवल नूह और जितने उसके संग जहाज में थे, वे ही बच गए। कई महीनों के बाद जल घटने लगा और नूह का जहाज अरारात नामक पर्वत पर टिक गया । जब धरती सूख गई तब नूह और जितने जहाज में थे सब बाहर निकल आए तब नूह ने परमेश्वर को धन्यवाद दिया।

    पृथ्वी, फिर मनुष्यों और अन्य सब प्राणियों से भर गई । और मनुष्य फिर परमेश्वर से दूर होते चले गए । मनुष्य का मन ईष्या, निन्दा, घृणा, कुविचार, क्रोध, लालच, झूठ और घमण्ड से भर गया । यही कारण है कि मनुष्य के दिन-प्रतिदिन के जीवन में चोरी, व्यभिचार, धोखेबाजी अत्याचार, बलात्कार, हैं लड़ाई-झगड़े और हत्या जैसे बुरे बुरे काम होते रहते हैं । यहीं नहीं, मनुष्य सत्य के मार्ग से भटककर जीवित और सच्चे परमेश्वर से घृणा करने लगा है और अपनी इच्छा के अनुसार अपने हाथ के बनाए देवी-देवताओं की पूजा करने लगा है ।  इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर से दूर हो गया है।

कोई धर्मी नहीं है

    बाइबल बताती है कि कोई मनुष्य धर्मी नही है, एक भी नही। सब के सब भटक गए, सब ने अपना अपना मार्ग लिया । इसलिए मनुष्य के लिए एक बार मरना और मरने के बाद उसके लिए न्याय का दिन ठहराया गया है । यह सच है कि हम सब परमेश्वर के सामने पापी हैं । मरने के बाद एक दिन हमें परमेश्वर के न्याय - आसन के सामने खड़ा होना पड़ेगा और फिर हमें अनन्त नरक के दण्ड की आज्ञा को सुनना होगा।

    परमेश्वर दयालु है । उसने हम सब मनुष्यों से इतना अधिक प्रेम किया कि समस्त संसार के मनुष्यों के लिए एक मुक्तिदाता को इस संसार में भेज दिया । यहीं परमेश्वर का एकलौता पुत्र यीशु मसीह है । परमेश्वर - पुत्र होने पर भी यीशु ने स्वर्ग के वैभव और महिमा को छोड़ दिया और वह मनुष्य रूप धारण करके इस संसार में आया ।

    यीशु के जन्म के विषय में युगों पूर्व परमेश्वर के नबियों द्वारा भविष्यवाणियां की गई थी। यीशु संसार में इसलिए आया कि पाप के कारण हम मनुष्यों का परमेश्वर से जो सम्बन्ध टूट गया है उसे फिर से जोड़कर मेल-मिलाप कराए । वह चमकीले सितारे के समान हमारा एकमात्र उद्धारकर्त्ता बनकर पाप के अंधकार में डूबें इस संसार में आया ।


मोक्षदाता के विषय में भविष्यवाणी

    यीशु के जन्म से 700 वर्ष पहिले यशायाह नबी ने यीशु के जन्म और उसकी मृत्यु के बारे में इस प्रकार भविष्यवाणी की थी:

परमेश्वर अपने सेवक, उद्धारकर्ता के विषय में यह कहता है :

" देखो ! मैं तुम्हें एक चिंन्ह देता हूँ । एक कुंवारी गर्भवती होगी और एक बालक को जन्म देगी । उसका नाम “ इम्मानुएल " रखा जाएगा । जिसका अर्थ है; परमेश्वर हमारे साथ ) ।

" वह एक ऐसी ज्योति ठहरेगा जो समस्त देशों के लोगों के मार्गों. को प्रकाशित करेगा तथा उन्हें मेरी ओर फेरेगा ।

" वह तुच्छ समझा गया और मनुष्यों का त्यागा हुआ था;

" वह दुःखी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी; और लोग उससे मुख फेर लेते थे।

" वह तुच्छ जाना गया, और हम ने उसका मूल्य न जाना ।

" निश्चय उसने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दुःखों को उठा लिया;

" तभी हमने उसे परमेश्वर का मारा - कूटा और दुर्दशा में पड़ा हुआ समझा।
 
" परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, 

वह हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; 

हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पडी, 

कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएं ।

" हम तो सब के सब भेडों की नाई भटक गए थे

" हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया;
और परमेश्वर ने हम सभी के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया ।

" वह सताया गया और उसे दूःख दिया गया,
फिर भी वह सहता रहा और अपना मुंह न खोला ।

" जिस प्रकार मेम्ना वध होने के समय
और भेड़ ऊन कतरने के समय चुपचाप रहती है, 
वैसे ही उस ने भी अपना मुंह न खोला ।

" अत्याचार करके और दोष लगाकर वे उसे ले गए। 
उस समय के लोगों में से किसने इस पर ध्यान दिया कि वह 
जीवितों के बीच में से उठा लिया गया ?

मेरे ही लोगों के अपराधों के कारण उस पर मार पड़ी । और उसकी कब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और, मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ। यद्यपि उसने किसी प्रकार का उपद्रव न किया था और उसके मुंह से कभी कोई छल की बात नहीं निकली थी, फिर भी परमेश्वर को यहीं भाया कि उसे कुचले । " उसी ने उसको रोगी कर दिया । "

मोक्षदाता का जन्म

   परमेश्वर के पुत्र तथा जगत के उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के जन्म की अनुपम कथा इस प्रकार आरम्भ होती है :

   परमेश्वर ने एक स्वर्गदूत को मरियम नामक एक कुँवारी के पास भेजा जो इस्राएल देश के एक छोटे से कस्बे में रहती थी । मरियम की सगाई यूसुफ नामक पुरुष के साथ हो चुकी थी जो दाऊद के वंश का था ।

    स्वर्गदूत ने मरियम का अभिवादन करके कहा, “ आनन्द और जय तेरी हो, तुझ पर परमेश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है।

    इस अभिवादन से मरिया घबरा गई । वह विचार करने लगी कि यह किस प्रकार का अभिवादन है।

    स्वर्गदूत ने उससे कहा, “ मरियम भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है और देख तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा । तू उसका नाम यीशु रखना (जिसका अर्थ है उद्धारकर्ता) । वह बहुत महान् होगा । जो परमेश्वर पर विशवास करेंगे, उन सबको वह उनके पापों से मुक्त करेगा । हाँ, वह परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा । एक दिन वह सारी पृथ्वी का राजा होगा, उसके राज्य का कभी अन्त न | वह सदा सर्वदा राज्य करता रहेगा।" होगा -
    तब मरियम ने स्वर्गदूत से पूछा, " ऐसा कैसे हो सकता है ? मैं एक कुंवारी हूँ । अभी तक तो मैं पति के साथ रहीं भी नहीं ।

    स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, “ पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा और परमेश्वर की सामर्थ तुझ पर छाया करेगी। इसलिए वह पवित्र जो उत्पन्न होगा, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा । क्योंकि है मरियम ! परमेश्वर के लिए कोई भी बात असम्भव नहीं है ।" तब स्वर्गदूत वहाँ से अदृश्य हो गया।

    यूसुफ जिसके साथ मरियम की सगाई हो चुकी थी, बड़ा ही धर्मी पुरुष था । अतः जब उसने यह सुना कि मरियम गर्भवती है, तो उसने चुपके से उसे त्याग देने का निश्चय कर लिया, क्योंकि वह मरियम को लोगों के सामने बदनाम करना नहीं चाहता था ।

    जब वह इन्हीं विचारों में सो गया, तो स्वप्न में उसने एक स्वर्गदूत को अपने पास खड़े हुए देखा । स्वर्गदूत ने उससे कहा, " यूसुफ ! तू मरियम को अपनी पत्नी के रूप में अपने यहीं लाने से मत डर ; क्योंकि जो उसके गर्भ में है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है । वह एक पुत्र को जन्म देगी, ताकि परमेश्वर का वह वचन, जो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा कहा गया था, पूरा हो देखो ! एक कुंवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र को जन्म देगी और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा।

    अतः जैसे ही यूसुफ नीद से जागा, उसने वैसा ही किया, जैसा कि स्वर्गदूत ने उसे आज्ञा दी थी । वह मरियम को अपनी धर्मपत्नी बनाकर अपने घर ले आया। परन्तु मरियम उस बालक को जन्म देने तक कुंवारी ही रहीं।

    उन्हीं दिनों में, रोमी सम्राट औगुस्तुस कैंसर ने यह आज्ञा निकाली कि उसके सम्पुर्ण साम्राज्य में जनगणना की जाए। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपना नाम पंजीकरण कराने के लिए अपने अपने पूर्वजों के नगरों को जाना पड़ा। यूसुफ भी गलील के नासरत से चलकर यहूदा के नगर बैतलहम गया जो उसका पैतृक निवास स्थान था । वह मरियम को भी अपने साथ ले गया। वहाँ रहते हुए उसके बालक जनने का समय निकट आ गया था। जब आ वे बैतलहम में ही थे, तब भविष्यवाणी के अनुसार वहीं उस बालक का जन्म हुआ । वह मरियम का पहलौठा पुत्र था । मरियम ने बालक को कपड़े में लपेटकर गोशाले की चरनी में रखा, क्योंकि उनके लिए उस गांव की सराय में कोई जगह न थी । और यूसुफ ने उस बालक का नाम यीशु रखा ।

यीशु की परीक्षा

    जव यीशु लगभग तीस वर्ष का हुआ तो वह अपना घर छोड़कर यरदन नदी की ओर गया और वहाँ उसने बपतिस्मा लिया । जब वह जल से बाहर निकला, तो एकाएक आकाश खुल गया और उसने परमेश्वर के पवित्र आत्मा को कबूतर की नाई अपने ऊपर उतरते देखा। ठीक उसी समय यह आकाशवाणी हुई, “ यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ ।”

   इसके तुरन्त बाद ही पवित्र आत्मा यीशु को एक जंगल में ले गया ताकि वहाँ शैतान के द्वारा उसकी परीक्षा हो । वहीं वह चालीस दिन और चालीस रात निराहार रहा।

   और जब उसे बहुत जोर से भूख लगी, तो शैतान ने उसके पास आकर उससे कहा, “ यदि तू वास्तव में परमेश्वर का पुत्र है, तो इन पत्थरों को आज्ञा दे कि ये रोटी वन जाएं।"

    परन्तु यीशु ने उत्तर दिया, " पवित्रशास्त्र में यह लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नही, परन्तु प्रत्येक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा ।"

    इसके पश्चात् शैतान यीशु को एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर ले गया और उसने उसे सारे जगत का राज्य तथा उसका वैभव दिखाया । फिर शैतान ने यीशु से कहा, " यदि तू झुककर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दुंगा ।”

    यीशु ने उसे उत्तर दिया, " हे शैतान, दुर हो ! पवित्रशास्त्र में यह लिखा है कि तू अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर को ही प्रणाम कर और केवल उसी की उपासना कर।" तब शैतान उसके पास से चला गया और स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा-टहल करने लगे।

यह कोन है।

    इसके पश्चात् यीशु लोगों को यह उपदेश देने लगा, “ अपने अपने पापों से पश्चात्ताप करो । परमेश्वर के सुसमाचार पर विश्वास करों। परमेश्वर का राज्य निकट है !"

    यीशु सारे गलील प्रदेश में यात्रा करते हुए, प्रत्येक जगह परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाता रहा । और वे सब जो अनेक प्रकार की बीमारियों से पीडित थे, यीशु के पास आते थे, और वह उनकी चंगा कर दिया करता था।

    एक दिन, यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, आओ, हम झील के उस पार चलें । अतः वे यीशु को नाव में बैठाकर, नाव खेने लगे । इतने में एक बड़ा तूफान उठा और लहरें नाव पर ऐसी टकराने लगी कि वह पानी से भरकर डूबने पर थी। परन्तु यीशु नाव के पिछले भाग में सो रहा था । शिष्यों ने घबराकर यीशु को जगाया और चिल्लाकर कहा, “ हे प्रभु ! नाव डूबने पर है । हमें बचा ! हम डूबे जा रहे है ! "

    तब यीशु ने उठकर तूफान को होस तथा पानी से कहा, “ शान्त रंह, थम जा ! “ तुरन्त तूफान थम गया और बड़ा चैन हो गया । उसने उनसे कहा, “तुम इतने भयभीत क्यों थे? क्या अभी भी तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं ?"

    जितने नाव में थे, वे सब अत्याधिक डर गए और आपस में एक दूसरे की ओर देख़कर बोले, “ यह कैंसा मनुष्य है, समुद्र और तुफान भी इसकी आज्ञा मानते है । "


यीशु का उपदेश

    जब यीशु ने देखा कि जगह जगह लोगों की भीड़ ही - भीड़ उसकी प्रतीक्षा कर रहीं है, तो उसको उन पर तरस आया, क्योंकि वे ऐसी भेड़ों के समान थे जिनका कोई चरवाहा न हो । अतः वह उन्हें बहुत बाते सिखाने लगा जो उनके लिए अत्यन्त आवश्यक थी । वह उनको यह उपदेश देने लगाः 

धन्य है वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्ही का है। 

धन्य है वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएंगे। 

धन्य है वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे। 

धन्य हे वे, जो परमेश्वर की इच्छा पुरी करने के लिए लालायित रहते हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएंगे।

धन्य है वे, जो दयालु है, क्योंकि परमेश्वर उन पर दया करेगा ।

धन्य हैं वे, जो अपना मन शुद्ध रखते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।

धन्य है वे, जो मेल-मिलाप कराते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे।

धन्य हैं वे, जो परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। 

धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें और सताए और झूठ बोल-बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें। तब आनन्दित और मगन होना, क्योंकि तुम्हारे लिए स्वर्ग में बहुत बडा प्रतिफल है।

 
" किन्तु धिक्कार है उन पर, जो इस संसार से प्रीति रखते हैं ! क्योंकि वे अपना सारा सुख पा चुके ।

" धिक्कार है उन पर, जो इस संसार की वस्तुओं से तृप्त हैं और लापरवाही तथा भोग-विलास का जीवन व्यतीत करते हैं ! क्योंकि वे शीघ्र ही भूख से रोएंगें ।

" धिक्कार है उन पर, जो अब हंसते और ठट्ठा करते हैं ! क्योंकि वे शोक करेंगे और छाती पीटेंगे ।

" धिक्कार है उन पर, जो इस संसार में आदर और प्रतिष्ठा पाते हैं क्योंकि इस संसार में प्रायः केवल झूठे और दुष्ट लोग ही सम्मानित होते है ।

    इस संसार में अपने लिए धन-सम्पत्ति इकट्ठा न करों । यहाँ तुम्हारे धन को कीड़ा या काई नष्ट कर देगे, या फिर चोर संध लगाकर चुरा ले जाएगे । तुम अपना धन स्वर्ग में इकट्ठा करो ! वहाँ किसी भी प्रकार का कीड़ा अथवा कोई उसे नष्ट नहीं कर सकती, और न ही वहाँ चोरों का कोई भय होगा। क्योंकि जहाँ तुम्हारा धन है, वहीं तुम्हारा मन भी लगा रहेगा।

    कोई भी मनुष्य एक साथ दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता क्योंकि वह एक से प्रेम तथा दुसरे से बैर रखेगा । तुम भी परमेश्वर और धन दोनों की । सेवा एक साथ नहीं कर सकते। 

     भोजन और वस्त्र की चिन्ता न करों । क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं ? तुम्हारा पिता जो स्वर्ग में रहता है, भली-भांति जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है। इसलिए पहले परमेश्वर तुम के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करो तब ये सब वस्तुएं भी तुम्हें दे दी जाएंगी।

    सावधान ! सब प्रकार के लोभ से अपने आपको बचाए रखो, क्योंकि किसी का जीवन उसकी सम्पत्ति की बहुतायत से नहीं होता। क्योंकि जो कुछ इस संसार में है, वह शरीर की अभिलाषा, आँखों की अभिलाशा, और जीविका का घमण्ड है । परन्तु यह संसार और इसकी अभिलाशाएं दोनों मिटते जाते हैं, परंतु जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह स्वर्ग में अनन्त जीवन पाएगा।

    स्वर्ग जाने का द्वार बहुत सकरा है । परन्तु नरक का द्वार बहुत चौड़ा है, और जो मार्ग वहाँ पहुंचाता है, चौड़ा और आरामदायक हैं इसीलिए अधिकांश लोग उसी मार्ग पर चलते है। परन्तु जो लोग अनन्त जीवन में प्रवेश करना चाहते हैं, वे इस सकरे द्वार - और सकरे मार्ग से होकर जाते हैं जिसमें कठिनाइयाँ और बाधाएं है। मैं सत्य कहता हूँ कि, बहुत थोड़े हैं जो इस पर चलते हैं |

     "ऐसे लोगों से सावधान रहना जो " गुरु " या " शिक्षक " कहलाते और मेरे नाम से तुम्हारे पास आते हैं । ये बाहर से तो नम्र, और भोली-भाली भेड़ के समान लगते हैं, परन्तु भीतर से खूखार, फाड़ खानेवाले भेड़िये हैं । ऐसे लोगों को पहिचानने का सबसे सरल उपाय उनके कार्य है । तुम को झाड़ियों से अंगूर और ऊंटकटारो से अंजीर नहीं मिल सकते । अतः उनके फलों से तुम उनके पहिचान लोगे।

    इस संसार के अन्त में समस्त मृतक जी उठेंगे । उन्होंने अपना जीवन सच्चाई में व्यतीत किया, वे स्वर्ग में प्रवेश करते के अधिकारी होंगे तथा अनन्त जीवन प्राप्त करेंगें । और जिन्होंने अपना जीवन दुष्टता में व्यतीत किया, वे भी जी उठेंगे, परंतु परमेश्वर उनका न्याय करेगा। वे सर्वज्ञ के लिए नरक में डाले जाएंगे। प्रभु कहता है, वह दिन शीघ्र आ रहा है, जबकि प्रत्येक मृतक मेरी आवाज सुनेगा और जीवित हो उठेगा । और प्रत्येक अपने अपने कार्यों के अनुसार उचित फल पाएगा।

    "स्वर्ग का द्वार मैं हूँ । जो कोई मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन प्राप्त करेगा ! वास्तव में, परमेश्वर ने संसार के लोगों से इतना अधिक प्रेम किया कि उसने अपने एकलौते पुत्र (यीशु) को स्वर्ग से भेज दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो परंतु अनन्त जीवन पाए। "

     लोग यीशु के उपदेशों से चकित हो जाते थे, क्योंकि वह किसी शिक्षा प्राप्त विद्वान की तरह शिक्षा नहीं देता था, जिससे लगे कि वह अपने ज्ञान का प्रदर्शन कर रहा हो, परन्तु यीशु बड़े अधिकार के साथ शिक्षा देता था।

दुनिया का उजाला 

    एक दिन जब एक बड़ी भीड़ यीशु के चारों ओर एकत्रित थी, तभी याईर नामक एक मनुष्य जो आराधनालय के अधिकारियों में से एक था, भीड़ को चीरता हुआ वहाँ आया और यीशु के चरणों में गिर पड़ा। उसने यीशु से -विनती की, " मेरी बेटी मरने पर है । तू आकर उस पर अपना हाथ रख और उसे चंगा कर दे। "

    अतः यीशु उसके साथ जाने लगा । एक बहुत बडी लोगों की भीड़ भी एक दूसरे को बोलते हुए उसके पीछे हो ली। ऐसा लगता था कि भीड़ यीशु को दबा लेगी।

    जब वे मार्ग में ही थे तभी याईर के घर से कुछ लोग उनसे आ मिलें और उन्होंने कहा, " तेरी पुत्री अब मर चुकी है। क्या अब गुरु को कष्ट देना उचित होगा ?"

    परन्तु यीशु ने याईंर से कहा, "डरो मत, केवल मुझ पर विश्वास रखो । तब यीशु ने भीड़ को वहीं रुकने के लिए कहा और वह अपने साथ तीन शिष्यों को ले गया । जब वे उसके घर पहुचे तो यीशु ने लोगों को रोते-पीटते और अत्यन्त भाोक मनाते देखा । उसने लोगों से कहा, “तुम क्यों रोते- पीटते और हल्ला मचाते हो ? लड़की मरी नहीं वह तो सो रहीं है।"

     इस पर वे सब यीशु की हंसी उड़ाने लगे । परन्तु उसने सबको बाहर फिर निकाला। वह अपने तीन शिष्यों तथा उस लड़की के माता पिता के साथ घर के भीतर गया जहाँ लडकी पड़ी थी।

    यीशु ने उसका हाथ पकड़कर कहा, " है लडकी, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ ! " और लड़की उठ खड़ी हुई तथा कमरे में चलने फिरने लगी । वह बारह वर्ष की थी। यह देखकर प्रत्येक जन आश्चर्यचकित हो गया। 

   परमेश्वर की इस सामर्थ और अदभुत कामों को देखकर लोगों में बड़ा भय छा गया । जो आश्चर्यकर्म यीशु ने किए, उनके विषय में लोगों में तरह तरह की बातें होने लगी। परन्तु यीशु ने अपने शिष्यों को अलग ले जाकर उनसे कहा, " सुनो, हम यरूशलेम को जा रहे है। वहाँ पहुंचने पर मैं यहूदी अगुवों के हाथों पकड़वाया जाऊँगा । वे मुझे मृत्युदण्ड के योग्य ठहराएँगे, मेरा उपहास करेंगें, मुझ पर थूकेगे, कोडे मारेंगे और अन्त में मुझे मार डालेंगे । परन्तु मैं तीसरे दिन मृतकों में से पुनः जीवित हो उठुगा।


    यरूशलेम के ही मार्ग पर एक और घटना घटी : यीशु एक बडी भीड़ के आगे आगे चल रहा था, और वे जैसे ही यरीहो नगर में से होकर निकले कि वहाँ बरतिमाई नामक एक अन्धा भिखारी सड़क के किनारे बैठा हुआ था।

जब उस भिखारी ने आती हुई भीड़ का शोर सुना तो लोगों से पूछने पर उसे मालुम हुआ कि यीशु जा रहा है। वह तुरन्त चिल्लाने लगा, “ हे यीशु, इस्राएल के राजा, मुझ पर दया कर ! भीड़ के लोग उसे डाँटने - फटकारने लगे, "चुप रह, अपना मुंह बन्द रख ! " परन्तु बरतिमाई और अधिक चिल्लाता रहा, हे इस्राएल के राजा ! मुझ पर दया कर !" जब यीशु ने उसे इस प्रकार चिल्लाते सुना, तो उसने रुककर अपने शिष्यों से कहा, " उसे मेरे पास ले आओं। 
    "उन्हों ने उस अन्धे से कहा, “ आ जल्दी कर ! यीशु तुझे बुला रहा है। " वह अन्धा बरतिमाई अपने कपड़े फेककर उछल पड़ा और यीशु के पास आया । यीशु ने उससे पुछा, " तू क्या चाहता है कि मैं तेरे लिए करू ? अन्धे ने कहा, " हे प्रभू, यह कि मैं देखने लगूँ

    तब यीशु ने उससे कहा, " ठीक है, देखने लग ! तेरे विशवास ने तुझे चंगा कर दिया है । " बरतिमाई तुरन्त देखने लगा, और भीड़ में सम्मिलित होकर यीशु के साथ चलने लगा।

    फिर यीशु ने लोगों से कहा, "मैं जगत की ज्योति हूँ। जो मेरे पीछे चलेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा । वास्तव में, मैं इस संसार में न्याय करने के लिए आया हूँ, कि जो नहीं देखते, वे देखें और जो देखते हैं, वे देखते हुए भी न देखे । "

यीशु का गिरफ्तार किया जाना

    यीशु को, अपने शिष्यों के साथ इस्राएल के नगरों और गांवों में घूम-घूमकर लोगों को स्वर्ग के राज्य और परमेश्वर के उद्धार का सन्देश सुनाते हुए लगभग तीन वर्ष हो चुके थे ।

    उसने सब प्रकार के रोगियों को चंगा किया, और मृतकों को भी जीवित कर दिया । उसने इस संसार के शीघ्र विनाश, तथा परमेश्वर के नए राज्य के स्थापित होने की भविष्यवाणी करते हुए हर जगह उपदेश दिया । परिणाम स्वरूप बडी संख्या में लोग उस पर विश्वास करने लगे कि युगों पूर्व भविष्यद्वक्ताओं द्वारा प्रतिज्ञा क्रिया हुआ उद्धारकर्ता मसीह यही है।

    परन्तु उस देश के मुखिए, धार्मिक अगुवे, बुद्धिजीवी तथा अधिकारीगण डर गए और यीशु से घृणा करने लगे। वे यह जानते थे कि वास्तव में यह परमेश्वर का पुत्र है, फिर भी उनमें इस बात की तनिक भी इच्छा नही थी कि वे अपने पापों से पश्चाताप करके उसे अपना उद्धारकर्ता ग्रहण कर ले।

    अंत में उन्होंने यीशु को गिरफ्तार करके उस पर मुकदमा चलाया।

     यहूदी पंथ के मुख्य पुरोहित तथा सर्वोच्च यहूदी महासभा के समस्त सदस्य उस पर मुकदमा चलने के लिए एकत्रित हुए । उनका एकमात्र उद्देश्य यही था कि वे उसे मार डालें । यद्यपि, यीशु के विरुद्ध उन्होंने अनेक झूठी गवाहियाँ एकत्रित कर ली थी, फिर भी उनसे कहीं अधिक साक्षी यीशु के पक्ष में थी । उनकी झूठी गवाहियों में इतना विरोधाभास था कि वे किसी ठोस परिणाम पर नहीं पहुंच सके कि यीशु पर क्या दोष लगाएं। इस पूरे मुकदमे में यीशु ने एक भी शब्द नहीं कहा।

    अंत में मुख्य पुरोहित खड़ा हुआ और उसने पूछा, " तुझे अपने विष्य में वया कहना है? क्या तू वास्तव में परमेश्वर का पुत्र होने का दावा करता है? क्या तू मसीह अर्थात् जगत का उद्धारकर्ता है ? स्पष्ट उत्तर दे।”

    यीशु ने उत्तर दिया, “ हाँ, तू बिल्कुल ठीक कहता है । सुनो, शीघ्र ही तुम मुझे सामर्थ्य और परमेश्वर के सम्पुर्ण अधिकार के साथ बादलों पर आते हुए देखोगे।

    जैसे ही मुख्य पुरोहित ने यह सुना, वह क्रोध के मारे चिल्ला उठा, "निन्दा । यह तो सरासर परमेश्वर की निन्दा है ! अब तुम सब इस मनुष्य के लिए क्या कहते हो ? "

    "मृत्यु !" वे सब एक स्वर में चिल्लाए : " इसे मार डालो !” वे यीशु को राज्यपाल पीलातुस के पास ले गए। पीलातुस ने यीशु से पुछा, " क्या तू यहूदियों का राजा है ? "

    यीशु ने उत्तर दिया, "हां, मैं राजा हूँ । परन्तु मेरा राज्य इस संसार का नहीं । यदि मैं इस संसार का राजा होता, तो मेरे अनुयायी मुझे बचाने के लिए लड़ते । मैं इसलिए संसार में आया हूं कि सत्य की गवाही दूं । जो सत्य के प्रेमी हैं, वे सब मेरी सुनेंगे।"

    तब पीलातुस ने लोगों के सामने आकर कहा, " मैं तो उसमें कोई दोष नहीं पाता । ” परन्तु लोगों ने उसकी एक न सुनी । पीलातुस ने यीशु पर कोड़े लगवाने का आदेश दे दिया । सिपाहियों ने कांटों का एक मुकुट बनाकर यीशु के सिर पर जड़ दिया और उसे एक बनी वस्त्र पहिनाया । वे उसका ठट्ठा उडाने लगे, “अह हा... परमेश्वर के पुत्र, संसार के राजा ! प्रणाम ! प्रणाम ! “ वे उस पर खूब हंसे । उन्होंने उस पर थूका तथा उसके मुंह पर थप्पड़ भी मारे।


    पीलातुस यीशु को रिहा करना चाहता था । इसलिए उसने यीशु को लोगों के सामने लाकर कहा, “इस मनुष्य को देखो !” परन्तु पुरोहितों के बहकावे में आकर भीड़ क्रोध से चिल्लाने लगी, " उसे मार डालो ! उसे क्रूस पर चढाओ ! क्रूस पर !”
    पीलातुस ने उत्तर दिया, "तुम ही उसे क्रूस पर चढ़ाओ। मैं उसमें कोई दोश नहीं पाता।"

    पीलातुस के इस उत्तर से वे और भी भड़क उठे । वे क्रोध से भरकर पुनः चिल्ला पड़े, "हभारी भी एक व्यवस्था है, और उस व्यवस्था के अनुसार यह मनुष्य मारे जाने के योग्य है । क्योंकि यह अपने आप को परमेश्वर का पुत्र होने का दावा करता है।"

    जब पीलातुस ने यह सुना, तो वह और भी घबरा गया । उसने यीशु को अन्दर ले जाकर उससे पूछा, "मुझे बता कि तू कहां का है ? क्या तू नहीं जानता कि तुझे छोड़ देने का अधिकार मुझे है और तुझे क्रूस पर चढ़ाने का भी मुझे अधिकार है ?"

    यीशु ने उत्तर दिया, “ यदि परमेश्वर तुझे अधिकार न देता तो मेरे ऊपर तेरा कोई अधिकार नहीं होता । इसलिए जिन्होंने मुझे तेरे हाथों में सौंपा है, वे अधिक दोषी हैं।”

    पीलातुस ने फिर यीशु को छाड़ देने का प्रयत्न किया, क्योंकि वह जानता था किं यहूदी अगुवों ने उसे ईर्ष्या तथा घृणा के कारण पकड़वाया है । एक बार फिर उसने भीड़ की ओर मुड़कर कहा, " मैंने इस मनुष्य की भली भाँति जांच की है और मैंने इसमें कोई दोष नहीं पाया ।” परन्तु भीड़ के लोग जोर-जोर से चिल्लाने लगे, " उसे क्रूस पर चढाओ, क्रूस पर !"

जब पीलातुस ने देखा कि अब कुछ बन नहीं सकता, बल्कि हुल्लड़ बढ़ता ही जा रहा है, तो उसने यीशु को उनके हाथों में सौप दिया कि वे उसे ले जाकर क्रूस पर चढाएं ।

प्रभू यीशु का लहू पापों को शुद्ध करता है

   वे यीशु को पकड़कर बाहर ले गए और उसके कंधे पर लकड़ी का भारी क्रूस लाद दिया । फिर उसे सड़कों से खींचकर शहर के बाहर एक पहाड़ी पर ले आए जिसे इब्रानी भाषा में गुलगुता कहते हैं (जिसका अर्थ खोपडी है)। वहाँ उन्होंने यीशु के साथ उसकी दाई और बाई ओर दो डाकुओं को भी क्रूस पर चढ़ाया।


    जब उन्होंने यीशु को क्रूस पर चढाया, तब यीशु ने यह प्रार्थना की, "हे स्वर्गिक पिता, इन्हें तू क्षमा कर; क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे है।

    जब लोग खड़े हुए यह सब देख रहे थे, कि सिपाहियों ने यीशु के वस्त्र के लिए चिट्ठियां डाली कि यह किसका होगा? यहूदी अगुवे भी वहाँ खडे होकर यीशु का उपहास कर रहे थे, “इस मनुष्य ने औरों को तो बचाया; परन्तु अब देखें कि यदि यह वास्तव में परमेश्वर का चुना हुआ उद्धारकर्ता है, तो अपने आपको बचा पाता है या नही ?"

"हे दूसरों को बचाने वाले, पहिले अपने आपको बचाकर हमें दिखा ! यदि तू क्रूस पर से उतर आए तो हम सब तुम पर विश्वास कर लेंगे।"

    यरूशलेम की सड़कों पर चलने वाले लोग भी उसकी हंसी उड़ाते हुए उसका ठट्ठा कर रहे थे, "अरे ! इस उद्धारकर्ता को तो देखो !" वे ठहाके मारकर कह रहे थे, " हे परमेश्वर के पुत्र, देख, यदि तू इतना ही चमत्कारी है, तो क्रूस पर से नीचे उतर आ और स्वयं को बचा ले।

    यहाँ तक कि यीशु के बगल के क्रूस पर लटका हुआ एक डाकू भी यीशु का ठट्ठा करके उससे कहने लगा, “ क्या तू मसीह नहीं है ? तो फिर हमें और अपने आपको भी बचा ले।"

     परन्तु दुसरे डाकू ने उसका विरोध करते हुए कहा, "तू मरते समय भी परमेश्वर से नहीं डरता ? हम तो अपने किए का सही दण्ड भोग रहे है परन्तु इस मनुष्य ने तो कोई भी पाप नहीं किया । " तब उसने यीशु की ओर मुड़कर कहा, "हे यीशु जब तू अपने राज्य में आए तो मेरी भी सुधि लेना।"

यीशु ने उत्तर दिया, “ मैं तुझे वचन देता हूं कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।"

दोपहर के लगभग बारह बजे एकाएक सारी पृथ्वी पर अंधकार छा गया, और लगभग तीन घंटे तल छाया रहा।

लगभग तीन बजे यीशु ऊचे स्वर से पुकार उठा, “ हे मेरे परमेश्वर है मेरे परमेश्वर ! तूने मुझे क्यों छाड़ दिया ?"

    जो वहाँ पास खड़े थे, इस आवाज से डर गए । यीशु ने फिर जोर से कहा, " पूरा हुआ !" और ऐसा कहकर उसने अपना प्राण त्याग दिया । तब एक बड़ा भूकम्प आया, पृथ्वी डोल उठी और चट्टानें फट गई । पास में खड़े सिपाही इस भूकम्प तथा जो कुछ वहीं हुआ था, उस सबसे अत्यन्त भयभीत हो उठे । वे विस्मित होकर कहने लगे, " सचमुच यह परमेश्वर का पुत्र था!" 


    जब संध्या हुई तो एक सज्जन व्यक्ति ने पीलातुस के पास जाकर यीशु का शव मांगा । उसने यीशु के मृत शरीर को क्रूस पर से उतारकर मलमल के में लपेटा और पास की एक गुफा में जो कब्र के रूप में चट्टान में काटकर बनाई थी, रखकर उसके मुंह पर एक बड़ा पत्थर लुढ़का दिया।

यीशु मृतको मे से जी उठा

    तीसरे दिन अति भोर को कुछ स्त्रियां यीशु की कब्र पर गई तो क्या देखा कि कब्र खाली है ! और वहाँ दो स्वर्गदूत प्रकट हुए। जब स्त्रियाँ भयभीत होकर मुंह झुकाए खडी हुई थी तो उन्होंने कहा, " तुम जीवित को मरे हुओं में क्यों ढूंढती हो ? वह यहां नहीं है, पर जी उठा है । " उन स्त्रियों ने तुरन्त वापस जाकर यीशु के शिष्यों को यह समाचार सुनाया। उनकी ये अनोखी बातें सुनकर शिष्य विश्वास नही कर पा रहे थे । शिष्यों में से एक का नाम | में थोमा था। उसने तो यहां तक कहा था, "जब तक मैं उसके हाथों के छेद में अपनी अंगुली न डाल लूं, तब तक मैं विश्वास न करूंगा । “ परन्तु जब शिष्य डर के मारे घर के भीतर बन्द थे कि यीशु ने उनके मध्य अचानक प्रकट होकर कहा, " तुम्हें शान्ति मिले ।" उसने थोमा से कहा, "अपनी अंगुली यहां ला और मेरे हाथ को छूकर देख और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो। “थोमा यह सुनकर यीशु के चरणों पर गिर पड़ा और बोल उठा, " हे मेरे प्रभु हे मेरे परमेश्वर इसके बाद-यीशु चालीस दिन तक भिन्न स्थानों पर बहुत से लोगों को दर्शन दिया और उन्हें परमेश्वर के राज्य के बारे में बताया।


    अन्त में यीशु ने अपने शिष्यों को जैतून पहाड़ पर बुलाया और कहा, " तुम सारे जगत में जाओं और सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करों । जो मुझ पर विश्वास करेगा वह उद्धार पाएगा, परन्तु जो विश्वास नहीं करेगा वह दोषी ठहराया जाएग। तब वह उनके देखते ही देखते स्वर्ग पर उठा लिया गया।


    यीशु आज स्वर्ग में परमेश्वर पिता की दाहिनी ओर विराजमान है वह न्यायाधीश बनकर फिर से जगत में आएगा । वह अपने महिमामय सिंहासन पर विराजमान होगा और सब जातियां उसके सम्मुख न्याय के लिए एकत्रित की जाएंगी। उसका आना ठीक नूह के दिनों के समान अचानक होगा । जल प्रलय के पूर्व के दिनों में जब लोग खाते-पीते, शादी-व्याह करते और भोग-विलास में लिप्त थे तभी अचानक जल प्रलय उन पर आ गया था। इसी प्रकार यीशु का भी आना होगा । उस समय और उस दिन के बारे में कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर ही जानता है। इसलिए जागते और तैयार रहो, क्योंकि जिस समय तुम कल्पना भी नहीं करते, उसी समय वह आ जाएगा। उस समय सूर्य अंधकारमय हो जाएगा, तारे गिर पड़ेगे । पृथ्वी आग से नष्ट की जाएगी और प्रत्येक मनुष्य यीशु को अधिकार और महिमा सहित स्वर्गदूतों के साथ बादलों पर स्वर्ग से आतेहुए देखेगा उस समय सब मुरदे जगाऐं जाएंगे य जितनों ने प्रभु यीशु पर विश्वास करके परमेश्वर की आज्ञा का पालन क्रिया है वे सब अनन्त स्वर्ग के राज्य में प्रवेश और जितनों ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है वे सव अनन्त नरक में डाले जाने के लिए जी उठेंगे 


    यीशु ने कहा, “ उस दिन प्रत्येक मनुष्य को परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने खड़ा होना पड़ेगा । जिस प्रकार चरवाहा भेडों को बकरियों से अलग करता है उसी प्रकार मैं उन्हें अलग करके भेडों को अपनी दाहिनी ओर और बकरियों को अपनी बाई और खडा करूंगा और दाहिनी ओर के लोगों से कहूंगा, हे मेरे पिता के धन्य लोगो, आओ, स्वर्ग के राज्य के अधिकारी बनो । क्योंकि मैं भूखा था बीर तुमने मुझे खाने को दिया, मैं नंगा था, तुमने मुझे कपड़े पहिनाए, बीमार था, तुमने मेरी सुधी ली । तव धर्मी मुझे उत्तर देंगे, प्रभु हमने कब यह सब किया? तब मैं उत्तर हैगा, जो कुछ तुमने मेरे इन छोटे से छोटे भाईयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे साथ किया ।

इसके बाद मैं बाई ओर वालों से कहूँगा, हे शापित लोगो तुम मुझ से होकर उस अनन्त अग्नि में जा पड़ो जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है, क्योंकि जब मैं भूखा, नंगा और बीमार था तो तुम ने न तो मेरी सुधि ली और न मेरे लिए कुछ किया । इस पर वे मुझ से पूछेंगे, प्रभु, 1 हमने कब तुझे दृःखी देखकर तेरी सेवा न की? तब मैं उत्तर दुंगा, मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो तुमने इन छोटों में से किसी एक के साथ नहीं किया, वह मेरे साथ भी नहीं किया।


मृत्यु और जीवन

   आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व यीष मसीह मनुष्य जाति का उद्धारकर्ता होकर इस संसार में आया और उसने हमारे पापों के लिए स्वयं प्रायश्चित बनकर क्रूस की मृत्यु सह ली । परंतु जब वह दुबारा इस संसार में आएगा, तो वह राजाओं का राजा, प्रभुओं का प्रभु और न्यायाधीश बनकर सब मनुष्यों का न्याय करेगा।


    उस दिन, सत्य को जानने पर भी लोगों के डर से सत्य पर न चलनेवाले, हत्यारे, व्यभिचारी, जादू-टोना करनेवाले, मनुष्य के हाथ की बनाई वस्तुओं क्री पूजा करनेवाले और सब झुठे तथा परमेश्वर की आज्ञा न माननेवालों का भाग उस आग की झील में होगा जो रात और दिन आग और गन्धक से धधकती रहती है । यह दुसरी मृत्यु है।


    परन्तु जो बुरे एवं गन्दे कामों से मन फिराकर अपने पापों से पश्चात्ताप करके हमारे लिए बहुमूल्य लहू बहानेवाले प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं और उसे उद्धारकर्ता मानकर अपने हृदयों में ग्रहण कर लेते हैं,
वे दुसरी मृत्यु के दण्ड से बच जाएंगे और अपने सारे दुःख-कष्टो से छुटकारा पाकर अनन्तकाल के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे । वहाँ फिर न मृत्यु होगी, न पाप, न पीडा और न शोक-विलाप होगा । वहीं सूर्य का प्रकाश न होगा क्योंकि वहाँ स्वयं परमेश्वर सब को ज्योति देनेवाला अनन्त अगम्य प्रकाश होगा।

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[X] इस पुस्तक में बाइबल की घटनाओं को प्रस्तुत किया गया है।

[X] इस पुस्तक का उद्देश्य किसी को किसी धर्म संस्था का सदस्य बनाना नहीं है। परन्तु इसका उद्देश्य पाप के अंधकार में भटके हुए मनुष्यों को सच्चे परमेश्वर का मार्ग बताना है।

एक जवाब

क्या आपकी जिन्दगी क्या समाधान व संतोश की जिंदगी है? 

क्या निराशा, दुःख व तनाव तुम्हें निरंतर परेशान कर रहे है? 

क्या आप हमेशा ही बीमार रहते है?  क्या ऐसी बीमारी है जिससे आप बाहर नहीं आ सकते?

क्या आपको ऐसी परेशानी है जिसे आप सुलझा नहीं सकते. 

क्या आपकी पारिवारिक जिंदगी में मनमुटाव है? 

क्या आप तबाही के कगार पर है?

क्या आप बच्चों के भविश्य को लकर दुःखी है? 

क्या आप कर्ज के बोझ से दबे हैं? 

क्या आप नौकरी को लेकर परेशान हैं? 

क्या आपकी सोच, प्रतीक्षा आदि का सब्र टूट गया है ? 

क्या आप नशे की आदत छोड़ना चाहते हैं?  परन्तु सफल नहीं हो पा रहे हैं?

क्या आप अपनी सभी कोशिशों के बावजूद असफल रहे हैं इसलिए आत्महत्या ही रास्ता दिखाई देता है?

नशा या आत्महत्या इसका इलाज नहीं है, पराज्य है? ऐसे कई सवाल है जिसका जवाब नहीं मिल रहा है? ऐसे सवालों का एक ही जवाब है प्रभु यीशु मसीह


Delhi Eval Evangelism Team
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PASTOR. BABLU KUMAR