प्रार्थना जीवन का परिचय
प्रार्थना का जीवन: परमेश्वर में बने रहना (Abiding)
"प्रार्थना एक जीवित आत्मा का परमेश्वर के साथ जीवित संबंध है। प्रार्थना में मनुष्य अपनी निर्बलता, आवश्यकताओं और चिंताओं को परमेश्वर के सामने रखता है, और परमेश्वर अपनी कृपा, शांति तथा सामर्थ्य के द्वारा उसे संभालता है।"
क्या कभी आपको ऐसा लगा है कि आपकी प्रार्थनाएँ पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं? आप प्रार्थना तो करते हैं, परन्तु भीतर उत्साह, जीवन, आशा या आत्मिक ताजगी का अनुभव नहीं होता। आप किसी व्यक्ति या परिस्थिति के लिए चिन्तित रहते हैं, फिर भी प्रार्थना करते समय ऐसा लगता है कि शब्द तो निकल रहे हैं, पर हृदय में पहले जैसी आग नहीं है।
यदि आपने कभी ऐसा अनुभव किया है, तो निराश न हों। परमेश्वर आपको अपने और निकट बुलाता है।
इसी उद्देश्य से Pastor Bablu Kumar ने यह प्रार्थना-श्रृंखला तैयार की है, ताकि प्रत्येक विश्वासी प्रार्थना के जीवन में आत्मीयता, विश्वास और आत्मिक दृढ़ता में आगे बढ़ सके।
प्रभावशाली प्रार्थना के तीन आधार
पिछले वर्षों में परमेश्वर ने हमें प्रार्थना के तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझने में सहायता की है। ये तीनों एक मजबूत रस्सी की तीन लड़ियों के समान हैं। यदि इनमें से किसी एक की उपेक्षा हो जाए, तो हमारा प्रार्थना जीवन कमजोर पड़ सकता है।
1. बने रहना (Abiding)
परमेश्वर के साथ निरन्तर संगति में रहना, ताकि हम उसके प्रेम, उसकी उपस्थिति और उसकी इच्छा को जान सकें।
2. विश्वास करना (Believing)
परमेश्वर के वचन, उसकी प्रतिज्ञाओं और उसकी विश्वासयोग्यता पर भरोसा रखना।
3. सामना करना (Confronting)
विश्वास के साथ परमेश्वर के वचन के अनुसार प्रार्थना करना, बुराई का विरोध करना और परमेश्वर के राज्य की इच्छा के लिए प्रार्थना करना।
जब ये तीनों बातें हमारे जीवन में संतुलित होती हैं, तब हम परमेश्वर के हृदय, उसके वचन और उसके अधिकार के अनुसार प्रार्थना करना सीखते हैं।
31 दिनों की आत्मिक यात्रा
यह अध्ययन 31 दिनों की आत्मिक यात्रा के रूप में तैयार किया गया है।
- पहले 10 दिन — परमेश्वर में बने रहना (Abiding)
- अगले 10 दिन — विश्वास में बढ़ना (Believing)
- अंतिम 11 दिन — मसीह के अधिकार में दृढ़ होकर प्रार्थना करना (Confronting)
प्रत्येक दिन में बाइबल के वचन, मनन और प्रार्थना के व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं। इन नमूना प्रार्थनाओं को केवल आरम्भिक मार्गदर्शन समझें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपने स्वर्गीय पिता के साथ व्यक्तिगत बातचीत करें।
बने रहना (Abiding)
यूहन्ना 15:5
"मैं दाखलता हूँ; तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है; क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।"
"बने रहना" का अर्थ केवल किसी धार्मिक गतिविधि में लगे रहना नहीं, बल्कि प्रभु यीशु के साथ निरन्तर जीवित संगति में रहना है।
सृष्टि के आरम्भ से ही परमेश्वर की इच्छा थी कि मनुष्य उसके साथ निकट संबंध में रहे। अदन की वाटिका में परमेश्वर आदम और हव्वा के साथ संगति रखता था (उत्पत्ति 3)। पाप के कारण यह संबंध टूट गया, परन्तु प्रभु यीशु मसीह ने अपने क्रूस के बलिदान के द्वारा हमें फिर से परमेश्वर के निकट आने का मार्ग प्रदान किया।
इसीलिए यीशु ने दाखलता और डालियों का उदाहरण दिया। जैसे डाली दाखलता से अलग होकर फल नहीं ला सकती, वैसे ही हम भी मसीह से जुड़े बिना आत्मिक फल नहीं ला सकते।
प्रभावशाली प्रार्थना का आरम्भ किसी विशेष विधि से नहीं, बल्कि यीशु मसीह के साथ जीवित संबंध से होता है।
बने रहना कैसे प्राप्त होता है?
1. मसीह पर विश्वास के द्वारा
इब्रानियों 10:10
"उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।"
जब हम अपनी पापमय अवस्था स्वीकार करते हैं और मसीह के क्रूस पर किए गए कार्य पर विश्वास करते हैं, तब हम परमेश्वर के परिवार का भाग बनते हैं।
2. परमेश्वर के प्रेम को स्वीकार करना
रोमियों 8:15
"तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली... परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम 'हे अब्बा, हे पिता' कहकर पुकारते हैं।"
हम परमेश्वर के सामने दास की तरह नहीं, बल्कि उसके प्रिय पुत्र और पुत्री के समान आते हैं।
3. मसीह की संगति में बने रहना
1 कुरिन्थियों 1:9
"परमेश्वर विश्वासयोग्य है; जिसने तुम को अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह की संगति में बुलाया है।"
परमेश्वर ने हमें केवल उद्धार के लिए नहीं, बल्कि अपने पुत्र के साथ निरन्तर संगति के लिए बुलाया है।
बने रहने का अनुभव कैसा होता है?
जब कोई विश्वासी प्रभु में बना रहता है, तो उसके जीवन में धीरे-धीरे ये बातें दिखाई देने लगती हैं—
- परमेश्वर की शांति।
- उसके प्रेम का अनुभव।
- आत्मिक सुरक्षा।
- प्रार्थना में आत्मीयता।
- परमेश्वर की इच्छा को समझने की लालसा।
- उसके वचन में आनंद।
यह वह स्थान है जहाँ विश्वासी निडर होकर अपने स्वर्गीय पिता के सामने अपना हृदय खोलता है और परमेश्वर अपने वचन तथा पवित्र आत्मा की अगुवाई के द्वारा उसका मार्गदर्शन करता है।
बने रहने के परिणाम
जब हम प्रभु में बने रहते हैं—
- हम आत्मिक रूप से मजबूत होते जाते हैं।
- पाप और प्रलोभनों का सामना करने की शक्ति पाते हैं।
- परमेश्वर की इच्छा को बेहतर समझने लगते हैं।
- हमारा जीवन पवित्र आत्मा का फल उत्पन्न करता है।
- हमारा चरित्र दूसरों के लिए मसीह की सुगंध बन जाता है।
- हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अधिक परिपक्व होती जाती हैं।
बने रहने में बाधाएँ
कुछ बातें हमारे और परमेश्वर के बीच निकटता को कमजोर कर सकती हैं—
- आत्मनिर्भरता (परमेश्वर पर निर्भर न रहना)
- पाप में बने रहना
- अनाज्ञाकारिता
- घमण्ड
- अविश्वास
इब्रानियों 11:6
"विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है; क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।"
विश्वास के बिना परमेश्वर के साथ गहरा संबंध संभव नहीं। इसलिए प्रतिदिन विश्वास के साथ उसके निकट आएँ और उसके वचन पर भरोसा रखें।
निष्कर्ष
प्रार्थना का सबसे मजबूत आधार परमेश्वर के साथ जीवित संगति है। जब हम प्रभु यीशु में बने रहते हैं, तब हमारी प्रार्थनाएँ केवल शब्द नहीं रहतीं, बल्कि परमेश्वर के साथ प्रेमपूर्ण संवाद बन जाती हैं।
याद रखें—प्रभावशाली प्रार्थना की शुरुआत किसी विशेष तकनीक से नहीं, बल्कि प्रभु यीशु के साथ निकट, जीवित और विश्वासपूर्ण संबंध से होती है। जब हम उसमें बने रहते हैं, तब वही हमें फलवन्त बनाता है, हमारी प्रार्थनाओं को परिपक्व करता है और अपने उद्देश्य के लिए हमारा उपयोग करता है।

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