"तब मैं अपना मुख प्रभु परमेश्वर की ओर करके गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करने लगा, और उपवास कर, टाट पहिन, राख में बैठकर वरदान माँगने लगा।" दानिय्येल 9:3
1. मध्यस्थता की प्रार्थना
2. मसीह व पवित्र आत्मा की मध्यस्थता
◦ यीशु की पार्थिव सेवकाई में मध्यस्थता
◦ मसीह की वर्तमान मध्यस्थता
◦ पवित्र आत्मा की मध्यस्थता
3. विश्वासी की मध्यस्थता की प्रार्थना
◦ पुराने नियम के उदाहरण
◦ नए नियम के उदाहरण
◦ प्रारम्भिक कलीसिया की मध्यस्थता
◦ प्रेरित पौलुस की मध्यस्थता
4. मध्यस्थता की प्रार्थना का अभिप्राय
5. निष्कर्ष
मध्यस्थता की प्रार्थना
मध्यस्थता की परिभाषा को पवित्र, विश्वासपूर्ण, धीरज भरी प्रार्थना कह सकते हैं जिसके द्वारा कोई किसी दूसरे या दूसरों के लिए परमेश्वर से निवेदन करता है जिसको परमेश्वर के हस्तक्षेप की अत्याधिक आवश्यकता है। दान 9 में दानिय्येल की प्रार्थना एक मध्यस्थता की प्रार्थना है, जबकि वह गंभीरता पूर्वक यरूशलेम के पुनःस्थापन के लिए तथा सम्पूर्ण जाति के लिए प्रार्थना करता है। बाइबल में मसीह की बहुत से धर्मी पुरुष व स्त्रियों की तथा पवित्र आत्मा की व नए व पुराने दोनों नियमों में मध्यस्थता की प्रार्थना लिखी है।
मसीह व पवित्र आत्मा की मध्यस्थता
(1) अपनी पार्थिव सेवकाई में, यीशु ने उन खोये हुओं के लिए प्रार्थना किया जिनको वह ढूंढ़ने व उद्धार करने आया (लूक 19:10)। वह टूटे हृदय से यरूशलेम नगर पर रोया (लूक 19:41)। उसने शिष्यों के लिए प्रार्थना किया, व्यक्तिगत (लूक 22:32) तथा सामूहिक (यूह 17:6-26) दोनों। उसने अपने शत्रुओं तक के लिए प्रार्थना की जब कि वह क्रूस पर लटका था (लूक 23:34)।
📖 संदर्भ वचन:
▪ लूका 19:10: "क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उनका उद्धार करने आया है।"
▪ लूका 19:41: "जब वह निकट आया, तो नगर को देखकर उस पर रोया।"
▪ लूका 22:32: "परन्तु मैं ने तेरे लिये विनती की है कि तेरा विश्वास जाता न रहे: और जब तू फिरे, तो अपने भाइयों को स्थिर करना।"
▪ यूहन्ना 17:9, 20: "मैं उनके लिये विनती करता हूँ... मैं केवल इन्हीं के लिये विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिये भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे।"
▪ लूका 23:34: "तब यीशु ने कहा; हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।"
(2) मसीह की वर्तमान सेवकाई का एक पहलू हमारी ओर से परमेश्वर के सिंहासन के सामने मध्यस्थता करना है (रो 8:34; इब्र 7:25; 9:24; देखें 7:25, टिप्पणी); यूहन्ना यीशु के लिए बताता है कि "पिता के पास हमारा एक सहायक है" (देखें 1 यूह 2:1, टिप्पणी)। मसीह की मध्यस्थता हमारे उद्धार के लिए आवश्यक है (तुलना करें यश 53:12); उसके अनुग्रह, दया और सहायता के बिना जो मध्यस्थता के द्वारा हमें मिलती है, हम तो परमेश्वर से दूर पतित हो जाएँगे और दूसरी बार पाप के दासत्व में आ जाएँगे।
📖 संदर्भ वचन:
▪ रोमियों 8:34: "मसीह यीशु वह है जो मर गया, वरन् मुर्दों में से जी भी उठा, और परमेश्वर की दाहिनी ओर है, और हमारे लिये निवेदन भी करता है।"
▪ इब्रानियों 7:25: "इसलिये जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, वह उनका पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिये विनती करने को सर्वदा जीवित है।"
▪ इब्रानियों 9:24: "...मसीह ने... स्वर्ग ही में प्रवेश किया है, ताकि अब हमारे लिये परमेश्वर के सामने दिखाई दे।"
▪ 1 यूहन्ना 2:1: "...और यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् धर्मी यीशु मसीह।"
▪ यशायाह 53:12: "...तौभी उसने बहुतों के पाप का बोझ उठा लिया, और अपराधियों के लिये विनती की।"
(3) पवित्र आत्मा भी मध्यस्थता से सम्बद्ध है। पौलुस कहता है, "क्योंकि हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करनी चाहिए, परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिए विनती करता है" (रो 8:26 देखें टिप्पणी)। पवित्र आत्मा विश्वासी के मानविक आत्मा द्वारा मध्यस्थता करता है "कि परमेश्वर की इच्छा हो" (रो 8:27)। इस प्रकार मसीह स्वर्ग में विश्वासी के लिए मध्यस्थता करता है, तथा पवित्र आत्मा पृथ्वी पर विश्वासी के लिए मध्यस्थता करता है।
📖 संदर्भ वचन:
▪ रोमियों 8:26-27: "इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है... परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर हैं, हमारे लिये विनती करता है। और मनों का जाँचने वाला जानता है, कि आत्मा की मनसा क्या है क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार पवित्र लोगों के लिये विनती करता है।"
विश्वासी की मध्यस्थता की प्रार्थना
बाइबल कई बार विश्वासी की मध्यस्थता की प्रार्थना की बात करती है तथा बहुत सी आदर्श, शक्तिशाली प्रार्थनाओं के उदाहरण देती है।
(1) पुराने नियम में, परमेश्वर की प्रजा के अगुवे, जैसे राजा (1 इत 21:17; 2 इत 6:14-42); भविष्यद्वक्ता (1 रा 18:41-45; दान 9) तथा याजक (एज्रा 9:5-15; योए 1:13; 2:17-18), को जाति के लिए मध्यस्थता की प्रार्थना में अगुवाई करनी होती थी। पुराने नियम के मध्यस्थता के उत्तम उदाहरणों में अब्राहम की इश्माएल के लिए (उत 17:18) तथा सदोम व अमोरा के लिए प्रार्थना (उत 18:23-32), दाऊद की पुत्र के लिए प्रार्थना (2 शम 12:16; 1 इत 29:19), और अय्यूब की अपनी संतान के लिए (अय 1:5)।
मूसा के जीवन में हम पुराने नियम की उत्तम मध्यस्थता की प्रार्थना की सामर्थ्य देखते हैं। कई अवसरों पर उसने परमेश्वर से गूढ़ता से प्रार्थना किया कि वह अपनी घोषित इच्छा को बदल दे, जबकि परमेश्वर ने मूसा को अपना काम करने का तरीका बता दिया था। उदाहरण के लिए, जब इस्राएलियों ने परमेश्वर से विद्रोह किया और कनान में नहीं गए, परमेश्वर ने मूसा को बताया कि वह उन्हें नाश कर देगा तथा मूसा से एक महान् जाति बनाएगा (गिन 14:1-12)। मूसा इस विषय को प्रार्थना में परमेश्वर से विनती करता है (गिन 14:13-19); उसकी प्रार्थना के अन्त में परमेश्वर ने कहा, "तेरी विनती के अनुसार मैं क्षमा करता हूँ।" (गिन 14:20; देखें निर्ग 32:11-14 भी; गिन 11:2; 12:13; 21:7; 27:5; देखें लेख प्रभावशाली प्रार्थना, पृष्ठ 542)। दूसरी पुराने नियम की सामर्थी प्रार्थनाओं में एलिय्याह (1 रा 18:21-46; याक 5:16-18), दानिय्येल (दान 9:2-23) तथा नहेम्याह (नहे 1:3-11) हैं।
📖 संदर्भ वचन (मुख्य उदाहरण):
▪ 1 इतिहास 21:17 (राजा दाऊद): "...पाप तो मैं ही ने किया, और मैं ही ने बुरा काम किया है; परन्तु इन भेड़ों ने क्या किया है? हे मेरे परमेश्वर यहोवा तेरा हाथ मेरे... विरुद्ध हो, परन्तु तेरी प्रजा के लोगों पर यह मरी न पड़े।"
▪ उत्पत्ति 17:18 (अब्राहम): "और इब्राहीम ने परमेश्वर से कहा, इस्माएल तेरी दृष्टि में बना रहे, यही मेरी अभिलाषा है!"
▪ उत्पत्ति 18:32 (सदोम के लिए): "...कदाचित् वहां दस मिलें। उसने कहा, मैं उन दस के निमित्त भी उसका विनाश न करूंगा।"
▪ 2 शमूएल 12:16 (दाऊद की पुत्र के लिए): "तब दाऊद ने उस बालक के लिये परमेश्वर से बिनती की; और दाऊद ने उपवास किया..."
▪ अय्यूब 1:5 (संतान के लिए): "...अय्यूब सोचता था, कि कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्वर को छोड़ दिया हो। इसी प्रकार अय्यूब सदैव किया करता था।"
▪ गिनती 14:19-20 (मूसा की प्रार्थना): "अपनी बड़ी करुणा के अनुसार इस प्रजा के अधर्म को क्षमा कर... यहोवा ने कहा, तेरे वचन के अनुसार मैं ने क्षमा किया है।"
▪ याकूब 5:16 (एलिय्याह का उदाहरण): "धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है। एलिय्याह भी तो हमारे समान दु:ख-सुख भोगी मनुष्य था; और उसने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की कि मेंह न बरसे..."
(2) नया नियम मध्यस्थता की और भी प्रार्थनाओं की प्रस्तुती करता है। सुसमाचार में लिखा है कि माता पिता तथा दूसरों ने अपने प्रिय जनों के लिए यीशु से विनती की। माता पिता ने यीशु से विनती किया कि वह उनके बच्चों को चंगा करे (मर 5:22-43; यूह 4:47-53); माताओं के एक समूह ने यीशु से अपने बच्चों को आशीष देने को कहा (मर 10:13); एक व्यक्ति ने अपने सेवक की चंगाई के लिए प्रार्थना की (मत 8:6-13); तथा यूहन्ना व याकूब की मां ने उनके लिए यीशु से विनती किया (मत 20:20-21)।
📖 संदर्भ वचन:
▪ मरकुस 5:23 (याईर): "और उस से बहुत विनती करके कहा, मेरी छोटी बेटी मरने पर है; तू आकर उस पर हाथ रख कि वह चंगी हो जाए और जीवित रहे।"
▪ मत्ती 8:6 (सूबेदार): "हे प्रभु, मेरा सेवक झोले का मारा घर में पड़ा है और बहुत दुखी है।"
▪ मत्ती 20:21 (माता की विनती): "...मेरी इन दोनों पुत्रों में से एक तेरे राज्य में तेरी दाहिनी ओर, और दूसरा तेरी बाईं ओर बैठे।"
(3) नए नियम की कलीसिया ने बहुत बार विभिन्न व्यक्तियों के लिए प्रार्थना किया। जैसे, यरूशलेम की कलीसिया एकत्रित हुई कि पतरस को बन्दीगृह से छुड़ाये जाये (प्रे 12:5,12)। अन्ताकिया की कलीसिया ने बरनबास व पौलुस की सेवकाई की सफलता के लिए प्रार्थना किया (प्रे 13:3)। याकूब विशिष्ट रूप से कलीसिया के प्राचीनों को निर्देश देता है कि बीमारों के लिए प्रार्थना करें (याक 5:14) तथा सभी मसीहियों से कि "एक दूसरे के लिए प्रार्थना करें" (याक 5:16; तुलना करें इब्र 13:18-19)। पौलुस एक कदम और आगे जाता है और कहता है कि प्रार्थना सब लोगों के लिए की जाएँ (1 तीम 2:1-3)।
📖 संदर्भ वचन:
▪ प्रेरितों के काम 12:5: "सो पतरस बन्दीगृह में था, परन्तु कलीसिया उसके लिये लौलीन होकर परमेश्वर से प्रार्थना कर रही थी।"
▪ प्रेरितों के काम 13:3: "तब उन्होंने उपवास और प्रार्थना करके और उन पर हाथ रखकर उन्हें विदा किया।"
▪ याकूब 5:14-16: "यदि तुम में कोई बीमार हो, तो कलीसिया के प्राचीनों को बुलाए... और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिस से चंगे हो जाओ।"
▪ 1 तीमुथियुस 2:1-2: "मैं सब से पहिले यह उपदेश देता हूँ, कि बिनती, और प्रार्थना, और निवेदन, और धन्यवाद, सब मनुष्यों के लिये किए जाएं। राजाओं और सब ऊंचे पद वालों के निमित्त..."
(4) प्रेरित पौलुस का विशेष वर्णन आवश्यक है। उसकी बहुत सी पत्रियों में वह विभिन्न कलीसियाओं व व्यक्तियों के लिए अपनी प्रार्थना का वर्णन करता है (जैसे रो 1:9-10; 2 कुर 13:7; फिलि 1:4-11; कुल 1:3,9-12; 1 थिस 1:2-3; 2 थिस 1:11-12; 2 तीम 1:3; फिले 4-6)। कई बार वह अपनी प्रार्थनाएं लिखता है (जैसे इफ 1:15-19; 3:14-19; 1 थिस 3:11-13)। उसी समय, पौलुस बार बार कलीसियाओं से विनती करता है कि उसके लिए प्रार्थना करें, यह जानते हुए कि उनकी प्रार्थनाओं के द्वारा ही उसकी सेवकाई का पूर्ण प्रभाव होगा (रो 15:30-32; 2 कुर 1:11; इफ 6:18-20; फिलि 1:19; कुल 4:3-4; 1 थिस 5:25; 2 थिस 3:1-2)।
📖 संदर्भ वचन (पौलुस की प्रार्थनाएँ):
▪ रोमियों 1:9: "...मैं अपनी प्रार्थनाओं में लगातार तुम्हें स्मरण करता हूँ।"
▪ इफिसियों 1:16: "...तुम्हारे लिये धन्यवाद करना नहीं छोड़ता, और अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हें स्मरण किया करता हूँ।"
▪ रोमियों 15:30: "हे भाइयो, मैं... तुम से विनती करता हूँ, कि मेरे लिये परमेश्वर से प्रार्थना करने में मेरे साथ मिलकर यत्न करो।"
▪ इफिसियों 6:19: "और मेरे लिये भी (प्रार्थना करो), कि मुझे बोलने के समय ऐसा प्रवचन दिया जाए, कि मैं हियाव से सुसमाचार का भेद बता सकूं।"
मध्यस्थता की प्रार्थना का अभिप्राय
बाइबल की बहुत सी मध्यस्थता की प्रार्थनाओं में, परमेश्वर का भय मानने वाले प्रेरित परमेश्वर से प्रार्थना करते थे कि वह अपने निर्णय को टाल दे (उत 18:23-32; गिन 14:13-19; योए 2:17), अपने लोगों के पुनःस्थापन दे (नहे 1; दान 9), व्यक्तिगत लोगों को खतरे से बचाए (प्रे 12:5,12; रो 15:31) और अपने लोगों को आशीष दे (गिन 6:24-26; 1 रा 18:41-45; भज 122:6-8)।
मध्यस्थता की प्रार्थना पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के पाने के लिए भी प्रार्थना करते थे (प्रे 8:15-17; इफ 3:14-17), किसी की चंगाई के लिए (1 रा 17:20-21; प्रे 28:8; यश 5:14-16), पापों की क्षमा के लिए (एज्रा 9:5-15; दान 9; प्रे 7:60), अधिकारियों को भली प्रकार शासन करने की योग्यता के लिए (1 इत 29:19; 1 तीम 2:1-2), मसीही उन्नति के लिए (फिलि 1:9-11; कुल 1:10-11), प्रभावी पास्टरों के लिए (2 तीम 1:3-7), प्रभावी मिशन कार्य के लिए (मत 9:38; इफ 6:19-20), दूसरों के उद्धार के लिए (रो 10:1) और लोगों के लिए कि वे परमेश्वर की स्तुति करें (भज 67:3-5)। कुछ भी जो बाइबल प्रगट करता है जो परमेश्वर की सिद्ध इच्छा के अनुसार ही अपने लोगों के लिए (देखें लेख परमेश्वर की इच्छा, पृष्ठ 1078) उचित रूप से मध्यस्थता की प्रार्थना के केन्द्र हो।
📖 संदर्भ वचन (विभिन्न अभिप्राय):
▪ निर्णय टालने के लिए (योएल 2:17): "...हे यहोवा, अपनी प्रजा पर तरस खा, और अपने निज भाग की नामधराई न होने दे..."
▪ आशीष के लिए (गिनती 6:24-25): "यहोवा तुझे आशीष दे और तेरी रक्षा करे; यहोवा तुझ पर अपने मुख का प्रकाश चमकाए, और तुझ पर अनुग्रह करे।"
▪ पवित्र आत्मा पाने के लिए (प्रेरितों 8:15): "उन्होंने नीचे जाकर उनके लिये प्रार्थना की, कि वे पवित्र आत्मा पाएं।"
▪ पापों की क्षमा के लिए (प्रेरितों 7:60): "फिर घुटने टेककर ऊंचे शब्द से पुकारा, हे प्रभु, यह पाप उन पर मत लगा।"
▪ मिशन कार्य के लिए (मत्ती 9:38): "इसलिये खेत के स्वामी से बिनती करो कि वह अपने खेत काटने के लिये मजदूर भेज दे।"
▪ दूसरों के उद्धार के लिए (रोमियों 10:1): "हे भाइयो, मेरे मन की अभिलाषा और उनके लिये परमेश्वर से मेरी प्रार्थना यह है, कि वे उद्धार पाएं।"
▪ परमेश्वर की स्तुति के लिए (भजन 67:3): "हे परमेश्वर, राज्य राज्य के लोग तेरा धन्यवाद करें; वरन् देश देश के सब लोग तेरा धन्यवाद करें!"

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