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सेवक से बाइबल क्या कहती है | अध्याय 7

एक सेवक के रूप में झूठी शिक्षा के प्रति आप का क्या कर्त्तव्य होना चाहिए
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अ) आप और झूठे शिक्षक या धर्म - भ्रष्ट

 
1. आप को निश्चित करना हैं कि आप सच्चे हैं, यह कि आप स्वयं एक झूठे शिक्षक नहीं हैं - भेड़ की खाल में एक फाड़ खानेवाले भेड़िए नहीं हैं।

"झूठे भविष्यवक्ताओं से सावधान रहो, जो भेड़ों के भेष में तुम्हारे पास आते हैं परन्तु अंतर में फाड़नेवाले भेड़िए हैं" (मत्ती 7:15)।

विचार
कुछ सेवकों के लिए यह विचार आपत्तिजनक हो सकता है, परन्तु हमें लगातार अपनी जांच करना हैं। हम में से प्रत्येक को, आपको, मुझे और अन्य सब सेवकों को - निश्चित करना अनिवार्य हैं कि हम सच्चे हैं, यह कि हम झूठे शिक्षक नहीं हैं - भेड़ के भेष में फाड़ खानेवाले भेड़ियों नहीं हैं। स्वयं हमारे प्रभु के ये वचन हैं (मत्ती 7:15)।

    अब इसे व्यक्तिगत बनाने के लिए, हम में से प्रत्येक स्वयं से यह पूछे: "क्या मुझे निश्चय हैं कि मैं मसीह का एक सच्चा सेवक हूं? क्या मुझे निश्चय हैं कि मैं एक झूठा शिक्षक नहीं हूं, भेड़ के भेष में एक फाड़ खाने वाला भेड़िया नहीं हूं? हमें सदा यह स्मरण रखना है: प्रत्येक झूठा भविष्यवक्ता या शिक्षक एक सेवक होने का दावा करता हैं और सत्य के प्रतिनिधित्व करने और सिखाने का। परन्तु वह एक सच्चा सेवक नहीं हैं और न वह परमेश्वर का सत्य सिखाता हैं, एक मात्र जीवित और सत्य परमेश्वर का सत्य नहीं, वह सत्य नहीं जिसे परमेश्वर ने उसके पुत्र में और उसके पवित्र वचन में प्रगट किया हैं। यही हैं जो उसे एक झूठा शिक्षक बनाता हैं। ध्यान दें कि मसीह क्या कहता हैं:

   "झूठे भविष्यवक्ताओं... जो भेड़ों के भेष में तुम्हारे पास (परमेश्वर के लोगों) आते हैं परन्तु अंतर में फाड़नेवाले भेड़िए हैं" (मत्ती 7:15)।

अ)         झूठे शिक्षक भेड़ को भेष में दिखते हैं, अर्थात्, वे मसीह के प्रति समर्पित प्रतीत होते हैं ठीक सच्चे सेवकों और विश्वासियों के समान। वे कहते हैं कि मसीह को जानते हैं और मसीहियों जैसा व्यवहार करते हैं। वे सेवक कहे जाने का दावा करते हैं; और कलीसियाओं में वे सेवकों के पद पर हैं और उनके संदेशों के लिए वे बाइबिल पाठों या वचनों का उपयोग करते हैं। वे ज्योंति के दूतों के समान लगते हैं (2 कुरि. 11:13-15)। वे अहिंसक, अबोध, और अच्छे लगते हैं। आरम्भ में तो समाज के श्रेष्ठ नमूने होते हैं, परन्तु उन में दो बातों का अभाव हैं: एक जीवन और एक गवाही जो परमेश्वर के वचन व्दारा परिवर्तित हो।
"क्योंकि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, और छल से काम करनेवाले, और मसीह के प्रेरितों का रूप धरनेवाले हैं। और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता हैं। सो यदि उसके सेवक भी धर्म के सेवकों का सा रूप धरें, तो कुछ बड़ी बात नहीं परन्तु उनका अन्त उनके कामों के अनुसार होगा" (2 कुरि. 11:13-15)।

ब)     झूठे शिक्षक फाड़रखानेवाले भेड़िए हैं: वे भेड़ तो बिलकुल नहीं हैं।
 *     कुछ झूठे शिक्षक भेड़ियों के समान हैं इस बात में कि उन को यह अहसास न भी हो कि वे वह नहीं हैं जो उन्हें होना चाहिए। जो करना उन्हें आता हैं, वहीं वे करते रहते हैं, नहीं जानते हुए कि जो वे करते हैं वह विनाशी और बुरा हैं (मत्ती 7:17)। वे भेड़ों जैसे दिखते हैं, परन्तु जितना उपभोग वे कर सकते हैं वे करते हैं जिस से कि जो भी उनकी भूख हैं - व्यक्तिगत निश्चय या सिध्दान्त - उसकी पूर्ति करें।
 
*        कुछ झूठे शिक्षक भेड़ियों के स्थान हैं इस बात में कि वे स्वयं के लिए और व्यक्तिगत लाभ के लिए निकले हैं: अहं, मान्यता, प्रसिध्दि, सम्मन, पद, जीविका, जीवन -कार्य, और सुख। वे प्राथमिक रूप से चिंतित हैं अपने स्वयं के प्रेरकों और उध्देश्यों की प्राप्ति के लिए और उन के अपने विचारों और नुस्खों को आगे बढ़ाने के लिए जीवन में सफल होने के लिए।
 
*    कुछ झूठे शिक्षक भेड़ियों के समान हैं क्योंकि वे एक ऐसे झुंड में चलना चाहते हैं जिस के साथ वे अपनी पहचान बनाएं। वे चाहते हैं कि उनके अनुयायी बुद्धिमानी और रचनात्मकता या ज्ञान और योग्यता में उनकी अगुवाई की मानें। वे भेड़ के समान लगते हैं, परन्तु वे अपने ही नुस्खे (झूठे सुसमाचार) फैलाते हैं, जोर से पुकारते हुए: "मार्ग यही है; इस में चलो।" जब संभव हो, वे सब संभव माध्यमों का उपयोग करते हैं: पर्दा, रेडियो, पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तके, समाचार - पत्र, और पर्चे।

स)     झूठे शिक्षक भ्रष्ट धर्मों का प्रचार करते हैं। वे न्याय, नैतिकता, धार्मिकता और भलाई का प्रचार करते हैं। वे मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक बल की शिक्षा देते हैं; स्वयं - छवि, स्वयं - उन्नति, और सकारात्मक विचार करने की - मनुष्यों के सब उच्च आदर्शों और सराहनीय विचारों की। परन्तु वे जीवित प्रभु के सत्य सुसमाचार का प्रचार कभी नहीं करते।

   "मुझे आश्चर्य होता हैं कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उससे तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार हैं ही नहीं: पर बात यह हैं, कि कितने ऐसे हैं, जो तुम्हें घबरा देते, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं। परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हमने तुमको सुनाया हैं, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो। जैसा हम पहिले कह चुके हैं, वैसा हीं मैं अब फिर कहता हैं, कि उस सुसमाचार को छोड़ जिसे तुम ने ग्रहण किया हैं, यदि कोई और सुसमाचार सुनाता हैं, तो श्रापित हो, अब मैं क्या मनुष्यों को मानता हूं या परमेश्वर को? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूं? यदि मैं अब तक मनुष्यों की प्रसन्न करता रहता, तो मसीह का दास न होता" (गला 1:6-10; तुलना यशा 56:10-11; यिर्म 23:1-40; 50:6; यहे 34:2-3; यूह 10:12)।

ड)    अंदर से झूठे भविष्यवक्ता भेड़िए हैं, असली भेड़िये, जाने में या अनजाने में। वे भेड़ लग सकते हैं, परन्तु वे भेड़ियों हैं।

 * उन्होंने प्रभु यीशु का अंगीकार नहीं किया हैं: कि परमेश्वर ने उसे मृतकों में से जिलाया हैं।

"कि यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय ध्दार पाएगा। क्योंकि धार्मिकता के लिए मन से विश्वास किया जाता हैं, और उद्धार के लिए मुंह से अंगीकार किया जाता है" (रोमि. 10:9-10)।

 * उन्होंने संसार के "पुराने मनुष्यत्व को नहीं निकाला हैं"।
"कि तुम अगले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को जो भरमानेवाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता हैं, उतार डालों" (इफि. 4:22)।

 * वे न तो "उनकी मन की आत्मा में नए हुए हैं" और न "नए मनुष्यत्व को पहिना हैं।"
"और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओं। और नए मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धार्मिकता, और पवित्रता में सृजा गया हैं" (इफि 4:23-24)।
"और नए मनुष्यत्व को पहिन लिया हैं जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए नया बनता जाता हैं" (कुलु 3:10)।
"सो यदि कोई मसीह में हैं तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं: देखो, वे सब नई हो गई है" (2 कुरि. 5:17)।

 * वे परमेश्वर व्दारा सेवकाई में नहीं रखे गए हैं (विशेषकर ध्यान दें 1 तीमु 1:12; इस सत्य पर कि जिन मनुष्यों को परमेश्वर चुनता हैं, वह उन को विश्वासयोग्य गिनता हैं।)

"और मैं, अपने प्रभु मसीह यीशु का, जिसने मुझे सामर्थ दी हैं, धन्यवाद करता हूं; कि उसने मुझे विश्वासयोग्य समझकर अपनी सेवा के लिए ठहराया" (1 तीमु 1:12)।

ई)   एक झूठा भविष्यवक्ता कभी - कभी नहीं जानता कि वह झूठा हैं। वह धोखा दे रहा हैं क्योंकि उसे धोखा दिया जा रहा हैं।

   "और दुष्ट, और बहकानेवाले धोखा देते हुए, और धोखा खाते हुए, बिगड़ते चले जाएंगे" (2 तीमु. 3:13)।
"और उन अविश्वासियों के लिए, जिन की बुध्दि को इस संसार के ईश्वर ने अंधी कर दी हैं, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप हैं, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके" (2 कुरि. 4:4; तुलना 2 तीमु 3:1-15)।

मसीह के एक सेवक के रूप में, आप को लगातार यह निश्चित करना हैं कि आप सच्चे हैं और मसीह के प्रति सच्चे बने रहेंगे। आप को कभी भी एक झूठा भविष्यवक्ता, एक फाड़खानेवाला भेड़िया, स्वयं का शुभचिंतक नहीं बनना हैं।

2. आप को स्वयं की जांच करना हैं: क्या आप विश्वास करते हैं - वास्तव में अंगीकार और प्रचार करते हैं - कि यीशु ने देह धारण किया: कि परमेश्वर ने जगत का उद्धार करने के लिए वास्तव में उसके पुत्र को पृथ्वी पर भेजा?

“हे प्रियों, हर एक आत्मा की प्रतीति न करो: वरन आत्माओं को परखो, कि वे परमेश्वर की ओर से हैं कि नहीं, क्योंकि बहुत से झूठे भविष्यवक्ता जगत में निकल खड़े हुए हैं। परमेश्वर का आत्मा तुम इसी रीति से पहचान सकते हो, कि जो कोई आत्मा मान लेती हैं कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया हैं वह परमेश्वर की ओर से हैं। और जो कोई आत्मा यीशु को नहीं मानती, वह परमेश्वर की ओर से नहीं, और वही तो मसीह के विरोधी की आत्मा हैं; जिस की चर्चा तुम सुन चुके हो, कि वह आनेवाला हैं: और अब भी जगत में हैं” (1 यूह 4:1-3)।

“क्योंकि बहुत से ऐसे भरमानेवाले, जगत में निकल आए हैं, जो यह नहीं मानते, कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया भरमानेवाला और मसीह का विरोधी यही हैं” (2 यूह 7)।

विचार
एक सेवक के रूप में, आपके अंगीकार और प्रचार की जांच और परीक्षण विश्वासियों द्वारा किया जाना हैं। हमारे लिए यह पर्याप्त कारण हैं कि हम स्वयं की जांच और परीक्षण करें।

क्या हैं जो एक शिक्षक को सच्चा या झूठा बनाता हैं? यीशु मसीह। एक मनुष्य का विश्वास यीशु मसीह के विषय में में करता हैं वही शिक्षक को सच्चा या झूठा बनाता हैं। यीशु मसीह के विषय में जो अंगीकार एक मनुष्य करता हैं, वही उस के आत्मा को प्रगट करता हैं, सच्चाई के आत्मा या गलत आत्मा को। और ध्यान दें कि यीशु मसीह के विषय में क्या हैं जो एक शिक्षक को प्रगट करता हैं: अवतरण। अर्थात्, क्या परमेश्वर का पुत्र - यीशु मसीह - शरीर में आया या नहीं?

अ)       सच्चा आत्मा, स्वयं परमेश्वर का आत्मा अंगीकार करता हैं कि यीशु मसीह शरीर में आया, यह कि अवतरण सत्य हैं। यदि एक सेवक या शिक्षक के पास परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर वास कर रहा हैं, तब वह अवतरण का अंगीकार करेगा, उस अद्भुत सत्य का कि परमेश्वर मनुष्य बना और मनुष्य का उद्धार करने के लिए पृथ्वी पर आया। परमेश्वर का आत्मा, सत्य के अतिरिक्त कुछ और बात का अंगीकार नहीं कर सकता; इसलिए, प्रत्येक शिक्षक जिसके पास परमेश्वर का आत्मा हैं इसी सत्य का अंगीकार करेगा। वह किसी और बात का अंगीकार नहीं कर सकता क्योंकि परमेश्वर का आत्मा स्वयं उसके भीतर वास करता हैं। यदि वह किसी और बात का अंगीकार करे, तब उसके भीतर का आत्मा परमेश्वर का आत्मा नहीं हैं। अब अंगीकार पर सूक्षमता से ध्यान दें, ठीक क्या हैं जो एक सच्चा शिक्षक अंगीकार करता हैं: “यीशु मसीह शरीर में होकर आया।”

* सच्चा शिक्षक “यीशु” का अंगीकार करता हैं। “यीशु” नाम का अर्थ हैं “उद्धारकर्ता।” यह विश्वास करना हैं कि यीशु मसीह मानव को बचाने के लिए, जगत का उद्धार करने के लिए परमेश्वर से आया।

* सच्चा शिक्षक मसीह का अंगीकार करता हैं। “क्राइस्ट” का अर्थ हैं “मसीहा”, परमेश्वर का अभिषिक्त जन। यह विश्वास करना हैं कि यीशु मसीह पवित्रशास्त्र का प्रतिज्ञा किया गया मसीहा हैं; कि वह पवित्रशास्त्र की सब भविष्यवाणियों का पूरा किया जाना हैं; कि वह परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर भेजा गया अभिषिक्त मुक्तिदाता हैं।

सच्चा शिक्षक अंगीकार करता हैं कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र हैं; कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को स्वर्ग से, आत्मिक जगत और आयाम से इस संसार में भेजा; कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को पवित्रशास्त्र को पूरा करने के लिए मनुष्य का उद्धार करने के लिए मानव शरीर में भेजा। इसका अर्थ हैं यीशु मसीह ने पवित्रशास्त्र के पूर्व कथनों को पूरा किया जो उसकी होनेवाली मृत्यु, पुनरुत्थान, और मसीहा के महिमा में प्रवेश के थे। सरलता से कहा जाए, तो इसका अर्थ हैं कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र हैं जो मनुष्य को बचाने के लिए पृथ्वी पर आया।

यह अंगीकार हैं सच्चे सेवक, सच्चे शिक्षक, और प्रत्येक सच्चे विश्वासी का। हमें सदा स्मरण रखना हैं कि एक सच्चे सेवक और एक सच्चे शिक्षक में स्वयं परमेश्वर का आत्मा वास करता हैं। इसलिए, सच्चा सेवक और सच्चा शिक्षक सदा अंगीकार करेगा अवतरण का, उस अद्भुत सत्य का कि “यीशु मसीह शरीर में आया।”

“इस कारण प्रभु आप ही तुम को एक चिन्ह देगा। सुनो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उस का नाम इम्मानुएल रखेगी” (यशा. 7:14)।

“क्योंकि हमारे लिए एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके कंधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत, युक्तिकर्ता, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शांति का राजकुमार रखा जाएगा” (यशा. 9:6)।

“और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना” (लूका. 1:31)।

“और वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की, अनुग्रह और सच्चाई से भरपूर” (यूह. 1:14)।

“और इस में सन्देह नहीं, कि भक्ति का भेद गम्भीर हैं; अर्थात् वह” जो शरीर में प्रगट हुआ, आत्मा में धर्मी ठहरा, स्वर्गदूतों को दिखाई दिया, अन्यजातियों में उसका प्रचार हुआ, जगत में उस पर विश्वास किया गया, और महिमा में ऊपर उठाया गया” (1 तीमु. 3:16)।

“इसलिए जबकि लड़के मांस और लोहू के भागी हैं तो आप भी उनके समान उन का सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात् शैतान को निकम्मा कर दे। और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले” (इब्रा. 2:14-15)।

ब)    झूठा आत्मा इंकार करता हैं कि यीशु मसीह शरीर में आया। वह अवतरण का इंकार करता हैं। वह विश्वास नहीं करता कि परमेश्वर ने मानव शरीर धारण किया और एक मनुष्य बन गया।

*    झूठा शिक्षक विश्वास नहीं करता कि यीशु मसीह जगत का उद्धारकर्ता हैं। यीशु मसीह को एक महान गुरु और एक महान धार्मिक अगुवे, कदाचित सबसे महान, के रूप में वह ग्रहण कर सकता हैं, परंतु वह विश्वास नहीं करता कि वही उद्धारकर्ता हैं। वह विश्वास करता हैं कि परमेश्वर तक पहुंचने के अन्य मार्ग हैं, यह कि दूसरे लोग जिनका विश्वास परमेश्वर में हैं, वे परमेश्वर को स्वीकार्य होंगे, जैसे कि यीशु मसीह का एक अनुयायी होता हैं।

*    झूठा शिक्षक विश्वास नहीं करता कि यीशु ही मसीह हैं, प्रतिज्ञा किया हुआ मसीहा और परमेश्वर का अभिषिक्त जन। वह विश्वास नहीं करता कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से लिखा गया। भूतकाल के महान धर्मी लोगों के लेखों के रूप में ही वह उन्हें स्वीकार करता हैं, इसलिए, एक मसीहा की भविष्यवाणियों की कोई प्रतिज्ञाएं नहीं हैं, आनेवाले उद्धारकर्ता की कोई प्रतिज्ञा नहीं हैं। एक झूठे शिक्षक के लिए, यीशु मसीह केवल एक महान धर्मगुरु हैं, परमेश्वर तक पहुंचने का केवल एक मार्ग हैं। सब मनुष्यों को बचाने के लिए परमेश्वर द्वारा भेजा गया अभिषिक्त जन वह नहीं हैं। परमेश्वर तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग वह नहीं हैं।

* झूठा शिक्षक विश्वास नहीं करता कि यीशु मसीह को परमेश्वर ने भेजा।

वह विश्वास नहीं करता कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र हैं, कि यीशु मसीह स्वर्ग से आया, आत्मिक जगत और आयाम से। वह विश्वास नहीं करता कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में मानव शरीर में एक मनुष्य के रूप में भेजा फिर झूठा शिक्षक विश्वास करता है कि यीशु मसीह अन्य सब मनुष्यों के समान ही केवल एक मनुष्य हैं - एक महापुरूष कदाचित सबसे महान, कदाचित वह मनुष्य जो किसी भी अन्य मनुष्य की अपेक्षा परमेश्वर के अधिक निकट पहुंचा। तथापि, एक झूठे शिक्षक के लिए यीशु मसीह केवल एक मनुष्य था जिसने हमें सिखाया कि परमेश्वर की आराधना और सेवा कैसे करें। झूठा शिक्षक कहेगा...

* कि यीशु मसीह निष्पाप नहीं था वह परमेश्वर के निकट जीता था, परन्तु कोई भी मनुष्य निष्पाप नहीं हो सकता।

* कि यीशु मसीह मरा, परन्तु मनुष्य के पापों के बदले में नहीं। वह एक महान शहीद के रूप में मरा हमें दर्शाते हुए कि हमें मृत्यु का सामना कैसे करना चाहिए और कैसे हमें धार्मिकता के महान कार्य के लिए मरने के लिए तैयार रहना चाहिए।

* कि यीशु मसीह का पुनरूत्थान नहीं हुआ। यह केवल एक चित्र हैं उस आत्मिक सत्य का कि मनुष्य परमेश्वर की उपस्थिति में रह सकता हैं।

अब ध्यान दें झूठे शिक्षक की जानलेवा गलती पर: यह इंकार करना कि यीशु मसीह शरीर में आया, यह इंकार करना हैं कि कभी भी इस जगत से मनुष्य का उद्धार हो सकता हैं। क्यों? क्योंकि मनुष्य कभी भी निश्चित रूप में नहीं जान सकता कि परमेश्वर हैं और न वह यह जान सकता हैं कि परमेश्वर तक कैसे पहुंचे यदि वह नहीं हैं। किसी भी मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर को या स्वर्ग को नहीं देखा, और कोई भी कभी भी नहीं देखेगा, शारीरिक और भौतिक तकनीकी से नहीं। यह भौतिक जगत आत्मिक जगत और आयाम में घुस नहीं सकता चाहे कुछ व्यक्ति कुछ भी दावा करें। यदि मनुष्य को कभी भी परमेश्वर और आत्मिक जगत को जानना हैं, तो परमेश्वर को पृथ्वी पर आना है और सत्य को हम पर प्रगट करना है। कोई और मार्ग नहीं है। ने अपने पुत्र को जगत में भेजा, यह इंकार करना हैं कि हम कभी बच सकते हैं।

एक और सत्य हैं जिस पर ध्यान देना हैं, जो हैं सिध्दता। परमेश्वर सिध्द हैं और मनुष्य असिध्द है। इसलिए, परमेश्वर कभी भी मनुष्य को सिध्दता में घुसने नहीं दे सकता। क्यों? क्योंकि मनुष्य की असिध्दता परमेश्वर के सिध्द जगत को प्रभावित करेगी। स्वर्ग तब स्वर्ग नहीं होगे; तब वह सिध्द नहीं होगा यदि परमेश्वर असिध्द जीवों को उसमें प्रवेश करने दे। स्वर्ग में घुसने के विषय में कुछ लोग चाहे जो भी दावा करें, उन्होंने प्रवेश नहीं किया हैं। असिध्दता कभी भी सिध्दता में नहीं घुस सकती झूठे शिक्षकों की जानलेवा गलती यही हैं, जानलेवा और अनन्तकाल तक विनाशकारी। यीशु मसीह के अवतरण का इंकार करने के परिणाम भयानक हैं। यदि यीशु मसीह देहधारी नहीं हुआ, तब इसका अर्थ हैं...

* कि परमेश्वर ने हम से पर्याप्त प्रेम नहीं किया कि स्वयं को हम पर प्रगट करे (1 यूह 1:2)।

* कि परमेश्वर ने हम से पर्याप्त प्रेम नहीं किया कि हमें जीवन का वचन दे (1 यूह 1:1)।

* कि परमेश्वर ने हम से पर्याप्त प्रेम नहीं किया कि हमें अनन्त जीवन दर्शाए (1 यूह 1:2)।

* कि कोई अनन्त जीवन नहीं है (1 यूह 1:2)।

* कि परमेश्वर के साथ कोई संगति नहीं है, निश्चित रूप से नहीं है (1 यूह 1:3)।

* कि आशा के और पवित्रशास्त्र के संदेश सत्य नहीं हैं, निश्चित रूप से नहीं है (1 यूह 1:3)।

* कि इस जीवन के बाद कोई आनन्द नहीं है, निश्चित रूप से नहीं है, आनन्द की भरपूरी नहीं है (1 यूह 1:4)।

* कि यीशु मसीह हमारा वकील नहीं हैं (1 यूह 2:2)।

* कि पापों की क्षमा नहीं हैं (1 यूह 1:9; 2:2)।

* कि पाप के लिए कोई सिध्द बलिदान नहीं हैं (1 यूह 2:2)।

आगे और आगे यह सूची जा सकती हैं, परन्तु बिन्दु स्पष्ट हैं। झूठा शिक्षक उद्धार की आशा को और परमेश्वर के साथ अनन्तकाल को नष्ट करता हैं। इस जगत में हमारे लिए कोई आशा और कोई परमेश्वर नहीं रह जाता जब तक कि परमेश्वर ने हम से प्रेम न किया होता, हम से इतना प्रेम कि उसने इस जगत में अपने पुत्र यीशु मसीह को भेज दिया। यीशु मसीह सुसमाचार का मुख्य बिन्दु हैं। ध्यान दें कि झूठे शिक्षक का आत्मा ख्रीष्टविरोधी का आत्मा है (देखें प्रचारक की रूपरेखा और उपदेश बाईबिल, रूपरेखा और लेख, 1 यूह 2:18-23)। यदि एक शिक्षक अंगीकार करता हैं कि यीशु मसीह देहधारी हुआ, तो वह एक सच्चा शिक्षक हैं। यदि नहीं, तो वह एक झूठा शिक्षक हैं जो कि ख्रीष्ट विरोधी के आत्मा को उन्नत करता हैं।

"हे प्रियों, हर एक आत्मा की प्रतीति न करो: वरन आत्माओं को परखो" (1 यूह 4:1)।

"पर जो कोई मनुष्यों के सामने मेरा इंकार करेगा उससे मैं भी अपने स्वर्गीय पिता के सामने इंकार करूंगा" (मत्ती 10:33)।

"जो कोई इस व्यभिचारी और पापी जाति के बीच मुझसे और मेरी बातों से लजाएगा, मनुष्य का पुत्र भी जब वह पवित्र दूतों के साथ अपने पिता की महिमा सहित आएगा, तब उससे भी लजाएगा" (मर 8:33)।

3. आप को स्वयं से प्रश्न करना है: क्या मैं यथार्थ में सच्चा हूं? क्या मैं सच्चाई से विश्वास और अंगीकार करता हूं कि यीशु ही ख्रीष्ट, मसीहा, परमेश्वर का पुत्र हैं?

"झूठा कौन है? केवल वह, जो यीशु के मसीह होने से इंकार करता हैं; और मसीह का विरोधी वही हैं, जो पिता का और पुत्र का इंकार करता हैं। जो कोई पुत्र का इंकार करता हैं उसके पास पिता भी नहीं: जो पुत्र को मान लेता हैं, उसके पास पिता भी हैं" (1 यूह 2:22-23)।

विचार
मसीह के एक सेवक के रूप में आपको स्वयं के और लोगों के प्रति सच्चे होना हैं। क्या आप सच्चाई से विश्वास करते और अंगीकार करते हैं कि यीशु ही ख्रीष्ट, मसीहा, परमेश्वर का पुत्र हैं?

झूठा शिक्षक ख्रीष्ट विरोधी है: वह मसीह के विरूध्द हैं। वह एक व्यक्ति हैं जो इंकार करता हैं कि यीशु ही मसीहा परमेश्वर का पुत्र हैं जिसे जगत के उद्धारकर्त्ता के रूप में भेजने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की थी। दो भयानक बातें इस व्यक्ति के विषय में कही गई हैं (उपरोक्त वचन पर ध्यान दें): प्रथम, वह झूठा हैं; और व्दितीय, वह पिता का इंकार करता हैं यदि वह पुत्र का इंकार करे जो प्रभु यीशु मसीह हैं। ऐसा क्यों हैं? यह कैसे होता हैं कि यदि एक व्यक्ति मसीह का इंकार करे तो वह परमेश्वर का इंकार करता हैं? उत्तर दुगुना हैं।

प्रथम, यदि एक व्यक्ति इंकार करे कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में भेजा, तब उसका परमेश्वर का स्वरूप, पूर्णतः उस परमेश्वर से भिन्न हैं जो यीशु मसीह का पिता हैं। परमेश्वर ने उसके पुत्र को जगत में भेजा हैं। इसलिए, यदि हम हमारे मनों में एक ईश्वर का चित्रण करें जिस ने अपने पुत्र को नहीं भेजा, तब हमारा परमेश्वर का स्वरूप सच्चे और जीवते परमेश्वर से पूर्णतः भिन्न हैं। सच्चा और जीवित परमेश्वर प्रेम हैं, सिध्द प्रेम। इसलिए, उसने मनुष्य से सिध्द प्रेम किया। मनुष्य के लिए जो सबसे महान बात की जा सकती हैं, उसे परमेश्वर ने किया: उसने अपने एकलौते पुत्र को मनुष्य का उध्दार करने के लिए जगत में भेज दिया मनुष्य के पापों के लिए मरने के व्दारा। मनुष्य के लिए इससे अधिक महान प्रेम कभी भी प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। इसलिए, यदि एक मनुष्य कहता हैं कि परमेश्वर ने अपने पुत्र की जगत में नहीं भेजा - कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र नहीं हैं - तब वह मनुष्य प्रभु यीशु मसीह के पिता के अतिरिक्त किसी अन्य ईश्वर की सोच रहा हैं।

* यीशु मसीह का इंकार करने के व्दारा, वह मनुष्य पिता का इंकार करता हैं।

* पुत्र का इंकार करने के व्दारा, उस मनुष्य के पास पिता नहीं हैं, प्रभु यीशु मसीह का पिता नहीं हैं। वह पिता से अलग हैं, परमेश्वर और उसके पुत्र प्रभु यीशु मसीह के विरोध में खड़ा हैं। वह मनुष्य नाश हो जाएगा, क्योंकि उसने इंकार किया हैं कि परमेश्वर ने जगत से इतना प्रेम किया कि जगत को बचने के लिए अपने पुत्र को भेज दिया।

व्दितीय, कोई भी व्यक्ति जो यीशु मसीह का इंकार करता हैं, वह नए नियम का इंकार करता हैं। क्यों? क्योंकि नया नियम बार - बार कहता हैं कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र हैं, एकमात्र व्यक्ति जो जगत पर परमेश्वर पिता को प्रकाशित करता हैं। इन में से कुछ वचन ये हैं (यूहन्ना का संपूर्ण सुसमाचार जगत पर परमेश्वर के पुत्र को प्रगट करने के उध्देश्य से ही लिखा गया था):

"मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा हैं, और कोई पुत्र को नहीं जानता, केवल पिता; और कोई पिता को नहीं जानता, केवल पुत्र, और वह जिस पर पुत्र उसे प्रगट करना चाहे" (मत्ती 11:27)।

"यीशु ने पुकारकर कहा, जो मुझ पर विश्वास करता हैं, वह मुझ पर नहीं वरन मेरे भेजनेवाले पर विश्वास करता हैं। और जो मुझे देखता हैं, वह मेरे भेजनेवाले को देखता हैं" (यूह 12:44-45)।

"यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे व्दारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता" (यूह 14:6)।

"यीशु ने उस से कहा; हे फिलिप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूं, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा हैं उसने पिता को देखा हैं: तू क्यों कहता हैं कि पिता को हमें दिखा। क्या तू प्रतीति नहीं करता, कि मैं पिता में हूं और पिता मुझ में हैं? ये बातें जो मैं तुमसे कहता हूं, अपनी ओर से नहीं करता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता हैं" (यूह 14:9-11)।

बिन्दु स्पष्ट है: कोई भी व्यक्ति जो यीशु मसीह का इंकार करता हैं, वह यीशु मसीह के पिता, स्वयं परमेश्वर का इंकार कर रहा हैं, जो कि एकमात्र जीवित और सच्चा परमेश्वर हैं। कोई भी व्यक्ति जो इंकार करता हैं कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र हैं, एक झूठा शिक्षक हैं, ख्रीष्ट विरोधी का एक अग्रदूत हैं।

4. आप को सत्य से नहीं हटना हैं।

"परन्तु आत्मा स्पष्टता से कहता हैं, कि आनेवाले समयों में कितने लोग भरमानेवाली आत्माओं, और दुष्टात्माओं की शिक्षाओं पर मन लगाकर विश्वास से बहक जाएंगे; कपट से झूठ बोलेंगे और जिनके विवेक मानों जलते हुए लोह से दागे गए हों" (1 तीमु. 4:1-2)।

विचार
   एक सेवक के रूप में आप को विश्वास से नहीं हटना हैं। परमेश्वर ने आपको उसके प्रिय पुत्र के महिमामय सुसमाचार का प्रचार करने और शिक्षा देने के लिए बुलाया हैं। यह आपको अवश्य करना हैं; आपको कभी भी अपनी बुलाहट से नहीं हटना हैं। आप को कभी भी धर्म - च्युत नहीं बनना हैं; आप को धर्म त्याग नहीं करना हैं। परन्तु उपरोक्त पवित्रशास्त्र पर ध्यान दें: पवित्र आत्मा स्पष्ट चेतावनी देता हैं कि कुछ सेवक बहक जाएंगे। और ध्यान दें कि वे कहां से आते हैं: कलीसिया के भीतर से। एक समय था जब वे विश्वास में बने हुए थे, एक समय जब वे परमेश्वर के वचन पर विश्वास करते और शिक्षा देते थे। परन्तु वे परमेश्वर के वचन से और परमेश्वर के पुत्र, प्रभु यीशु मसीह से बहक गए, जो कि एक मात्र हैं जो हमारा उद्धार कर सकता हैं।

जैसा कि इस वचन में लिखा हैं, यह स्वयं परमेश्वर के आत्मा व्दारा एक चेतावनी हैं। इसलिए, यह एक चेतावनी हैं जिस पर प्रत्येक सेवक को ध्यान देना हैं। परमेश्वर का आत्मा तीन चेतावनियां देता हैं।

अ) एक सेवक के रूप में आप को भरमानेवाली आत्माओं और दुष्टात्माओं की शिक्षाओं पर ध्यान नहीं देना हैं। संपूर्ण जगत में सब प्रकार की दुष्टआत्माएं हैं, आत्माएं जिन्होंने आप को भरमाने और बहकाने की ठन रखी हैं। उन्होंने निश्चय कर लिया हैं आप को उनके विचारों और शिक्षाओं में अगुवाई करने का कि आप उनके पीछे चलें। वे भरसक प्रयत्न करते हैं आप को मसीह की शिक्षा और विश्वास से बहकाने का। और ध्यान दे: जिस तरीके का प्रयोग वे करते हैं वह सामने से आक्रमण नहीं हैं, सत्य के विरोध में एक स्पष्ट या बड़ी घोषणा नहीं हैं। वे कुछ सत्य को भ्रम में मिला देते हैं। उनका तरीका हैं कि...

* बहकाएं
* फुसलाएं
* फंसाएं
* धोखा दें
* प्रकाश और सत्य के रूप में दिखें
* प्रलोभित करें
* भ्रमित करें
* वशीभूत करें
* आकर्षित करें

"क्योंकि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, और छल से काम करनेवाले, और मसीह के प्रेरितों का रूप धरनेवाले हैं। और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं हैं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता हैं। सो यदि उसके सेवक भी धर्म के सेवकों जैसा रूप धरें, तो कुछ बड़ी बात नहीं परन्तु उनका अन्त उनके कामों के अनुसार होगा" (2 कुरि. 11:13-15)।

"क्योंकि बहुत से लोग निरंकुश, बकवादी और धोखा देनेवाले हैं; विशेषकर खतनावालों में से। इनके मुंह बंद करना चाहिए ये लोग नीच कमाई के लिए अनुचित बातें सिरवाकर घर के घर बिगाड़ देते हैं" (तीतु 1:10-11)।

ब) आप को कपट में झूठ नहीं बोलना हैं। सरलता से कहें, तो जो पवित्रशास्त्र कहता हैं उससे कुछ भिन्न आपको नहीं सिखाना हैं। कुछ लोग हैं जो जानते हैं कि जो पवित्रशास्त्र कहता हैं उसकी शिक्षा वे नहीं दे रहे हैं। यथार्थ में, वे घमण्ड करते हैं अपनी धारणा में जिसे वे कहते हैं कि पवित्रशास्त्र की "एक अक्षरक्षः व्याख्या" के विरोध में हैं। वे उनकी हंसी तक उड़ाते और उपहास करते हैं जो पवित्रशास्त्र पर विश्वास करते और सत्य को थामे रहते हैं। परन्तु ध्यान दें उसपर जो बहुधा अनदेखा किया जाता है:

* "झूठ बोलने" का अर्थ हैं उसे कहना और सिखाना जो पवित्रशास्त्र के विपरीत हैं। ठीक इसी बात की घोषणा पवित्रशास्त्र कर रहा है: पवित्रशास्त्र की दृष्टि में, एक झूठ वह शिक्षा हैं जो पवित्रशास्त्र की शिक्षा के विपरीत हैं।

* "कपट में" का अर्थ हैं कि शिक्षक जानता हैं कि जो वह सिखा रहा हैं वह पवित्रशास्त्र के विपरीत हैं। परमेश्वर, मसीह और वचन (पवित्रशास्त्र) के एक शिक्षक या सेवक होने का वह दावा करता है; तथापि जो वचन कहता हैं उसके विपरीत वह कुछ सिखाता हैं। एक कपटी वह व्यक्ति हैं जो दावा तो कुछ होने का करता हैं परन्तु हैं वह कुछ और ही, बिन्दु यह है: आप को ऐसा व्यक्ति नहीं होना हैं जो कपट में झूठ बोले। जो पवित्रशास्त्र कहता हैं, झूठा शिक्षक उसका इंकार, विरोध, या उसे अनदेखा करता हैं और वह यह जानता हैं; तथापि वह मसीह और सुसमाचार का एक सेवक या शिक्षक होने का दावा करता हैं। यही वह सेवक हैं जो किसी भरमानेवाली और बहकानेवाली आत्मा का एक औजार हैं, एक सेवक हैं जो दुष्टात्माओं की शिक्षाएं सिखाता हैं। मसीह के सेवक के रूप में, आप को कभी भी कपटी नहीं होना हैं। आप को कपट में झूट नहीं बोलना हैं। आप को कभी भी स्वयं को विश्वास से बहकने नहीं देना चाहिए।

"अब हे भाइयों, मैं तुमसे विनती करता हूं, कि जो लोग उस शिक्षा के विपरीत जो तुमने पाई हैं, फूट पड़ने, और ठोकर खाने के कारण होते हैं, उन्हें ताड़ लिया करो, और उनसे दूर रहो। क्योंकि ऐसे लोग हमारे प्रभु यीशु की नहीं, परन्तु अपने पेट की सेवा करते हैं; और चिकनी चुपड़ी बातों से सीधे सादे मन के लोगों को बहका देते हैं" (रोमि. 16:17-18)।

"चौकस रहो कि कोई तुम्हें उस तत्व ज्ञान और व्यर्थ धोखे के व्दारा अहेर न कर ले, जो मनुष्य के परम्पराई मत और संसार की आदि शिक्षा के अनुसार हैं, पर मसीह के अनुसार नहीं" (कुलु. 2:8)।

"वे कहते हैं, कि हम परमेश्वर को जानते हैं: पर अपने कामों से उसका इंकार करते हैं, क्योंकि वे घृणित और आज्ञा न माननेवाले हैं; और किसी अच्छे काम के योग्य नहीं" (तीतु 1:16)।

विलियम बार्क्लि के पास मनुष्यों के शैतान और दुष्टात्माओं के औजार बनने पर एक श्रेष्ठतम कथन हैं।
"इन दुष्टात्माओं से ही यह झूठी शिक्षा आई हैं। परन्तु यह दुष्टात्माओं से आई हैं मनुष्यों के व्दारा। अब यहां पर एक खतरनाक और भयानक बात हैं। हम जानते हैं कि परमेश्वर और परमेश्वर का आत्मा सर्वत्र हैं उपयोग करने के लिए मनुष्यों की खोज में। परमेश्वर सदा ऐसे मनुष्यों की खोज कर रहा हैं जो उसके औजार, उसके हथियार, उसके उपकरण होंगे जगत में। परन्तु यहां पर हमारा सामना इस भयंकर सत्य से होता हैं कि दुष्ट शक्तियाँ भी मनुष्यों को उपयोग करने की खोज में हैं। जैसे परमेश्वर अपने उद्देश्यों के लिए मनुष्यों को खोजता हैं वैसे ही दुष्ट शक्तियां अपने उद्देश्यों के लिए मनुष्यों को खोजती हैं। यहां हैं मानवता का भयानक उत्तरदायित्व। मनुष्य परमेश्वर की सेवा स्वीकार कर सकता हैं या शैतान की सेवा। मनुष्य सर्वोच्च भले या सर्वोच्च बुरे का एक औजार बन सकता हैं। मनुष्यों के सामने अनन्त चुनाव हैं - हमें अपने जीवनों को किसे देना हैं, परमेश्वर को या परमेश्वर के शत्रु को? हमें निर्णय लेना हैं कि परमेश्वर व्दारा हमारा उपयोग हो या शैतान व्दारा हमारा उपयोग हो?" (तीमुथियुस, तीतुस, और फिलेमोन की पत्रियां, पु. 107)।

स) आप को अपने विवेक की रक्षा करना हैं कि कहीं वहजल न जाए, अर्थात, कठोर, और असंवेदनशील न हो जाए। अधिकांश झूठे शिक्षकों को पवित्रशास्त्र के सत्य के विपरीत सिखाने में उनका विवेक कोई आपत्ति नहीं करता। वे पवित्रशास्त्र को अनदेखा करके और इंकार करके स्वयं के विचारों को प्रस्तुत कर सकते हैं और उनका विवेक इसमें कोई आपत्ति नहीं करता हैं। परमेश्वर के आत्मा की टोच और दोषी ठहराए जाने के प्रति वे पूर्णतः असंवेदनशील हैं। मसीह के विषय के सत्य और पवित्रशास्त्र को मरोड़ने के विषय में वे विवेकहीन और पश्चातापरहित हैं। परमेश्वर के आत्मा से किसी भी प्रकार की गतिविधि का अहसास करने में वे पूर्णतः असमर्थ हैं।

आप को स्वयं के साथ ऐसा नहीं होने देना हैं। आप मसीह के सेवक हैं। आपको अपने जीवन में किसी ऐसी शिक्षा को नहीं आनेदेना हैं जो आपके विवेक को कठोर बना दें। आप को कभी भी विश्वास से नहीं मुड़ना हैं।

"क्योंकि इन लोगों का मन मोटा और उन के कान भारी हो गए, और उन्होंने अपनी आंखें बंद कर ली हैं, ऐसा न हो कि वे आंखों से देखें, और कानों से सुनें, और मन से समझें और फिरें, और मैं उन्हें चंगा करूं" (प्रेरि 28:27)। "और जब वे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की पहचान के व्दारा संसार की नाना प्रकार की अशुध्दता से बच निकले, और फिर उनमें फंस कर हार गए, तो उनकी पिछली दशा पहिली से भी बुरी हो गई हैं। क्योंकि धर्म के मार्ग का न जानना ही उनके लिए इससे भला होता, कि उसे जानकर, उस पवित्र आज्ञा से फिर जाते, जो उन्हें सौंपी गई थी। उन पर यह कहावत ठीक बैठती हैं, कि कुत्ता अपनी छांट की ओर और धोई हुई सुअरनी कीचड़ में लोटने के लिए फिर चली जाती हैं" (2 पत 2:20-22)।

"धन्य हैं वह मनुष्य जो सदा डरता है; परन्तु जो अपना मन कठोर करता हैं वह संकट में पड़ेगा" (नीति. 28:14)।

5. आपको उन से बचना हैं जो सत्य का विरोध करते हैं।

"और जैसे यन्नेस और यम्ब्रेस ने मूसा का विरोध किया था वैसे ही ये भी सत्य का विरोध करते हैं: ये तो ऐसे मनुष्य हैं, जिनकी बुध्दि भ्रष्ट हो गई हैं और वे विश्वास के विषय में निकम्मे हैं। पर वे इससे आगे नहीं बढ़ सकते, क्योंकि जैसे उनकी अज्ञानता तब मनुष्यों पर प्रगट हो गई थी, वैसे ही इनकी भी हो जाएगी" (2 तीमु. 3:8-9)।

विचार
   वे भ्रष्ट सेवक और शिक्षक हैं जो सत्य का विरोध करते हैं। क्यों? क्योंकि उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई हैं, अर्थात् सुसमाचार की उनकी समझ टेढ़ी, विकृत और नीच हैं। प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और पुनरूत्थान की सामर्थ और महिमामय समाचार के पीछे वे नहीं चलते हैं।

यन्नेस और यम्ब्रेस के संदर्भ पर ध्यान दें, जो मिस्र में दो धार्मिक अगुवे थे। उन्होंने मूसा का सामना किया जब गुलामी से इस्राएल को छुड़ाने के लिए वह फिरौन के पास गया था। वे मूसा से सटकर खड़े हुए और सत्य का विरोध किया, परन्तु अंत में वे नाश किए गए (तुलना निर्ग. 7:1; 8:7; 9:11)। पुराने नियम में इन दो व्यक्तियों का नाम नहीं हैं, परन्तु अन्य यहूदी धार्मिक लेखों में उनका वर्णन हैं। स्पष्ट हैं कि सब यहूदियों पर उनके नाम प्रगट थे।

विलियम बार्क्ले सुसमाचार के सत्य के विरोध का स्पष्टता से वर्णन करता है:
"मसीही अगुवे को कभी भी उसके विरोधियों का अभाव नहीं होगा। सदा ऐसे लोग जो परमेश्वर के विचारों से अधिक स्वयं के विचारों को पसंद करते हैं। सदा ऐसे लोग होंगे जो लोगों पर शक्ति और प्रभाव का प्रयोग करना चाहते हैं और ऐसा करने के लिए वे किसी भी नीच तरीके का प्रयोग करेंगे। सदा ऐसे लोग होंगे जो मसीही विश्वास के अपने टेढ़े विचार रखते हैं और जो दूसरों को अपने गलत विश्वास के लिए जीतना चाहते हैं। परन्तु एक बात पर पौलुस निश्चित था - धोखेबाजों के दिनों की गणना हो चुकी थी। उनका झूठ प्रदर्शित होगा; और वे अपने उचित स्थान और प्रतिफल को पाएंगे" (तीमुथियुस, तीतुस, और फिलेमोन के पत्रियां, पृ. 223)।

भ्रष्ट सेवकों के अन्त पर ध्यान दें। उनकी भ्रष्ट शिक्षा और धर्म प्रगट होगा। अन्त में सब झूठे शिक्षक और उनकी शिक्षा का सुराग लगाकर प्रकाश में लाए जाएंगे। परमेश्वर प्रत्येक भ्रष्ट सेवक को पकड़कर प्रगट कर देगा। प्रभु यीशु मसीह के आगमन पर यह होगा। भ्रष्ट सेवक और उनकी भ्रष्ट शिक्षा इसके आगे नहीं जाएंगी। परमेश्वर के बुलाए हुए सेवक के रूप में, आप को उन से बचना हैं जो सत्य का विरोध करते हैं। "और तुम्हें जो क्लेश पाते हो, हमारे साथ चैन दे, उस समय जब कि प्रभु यीशु अपने सामर्थी दूतों के साथ, धधकती हुई आग में स्वर्ग से प्रगट होगा। और जो परमेश्वर को नहीं जानते, और हमारे प्रभु यीशु के सुसमाचार को नहीं मानते उनसे पलटा लेगा। वे प्रभु के सामने से, और उसकी शक्ति के तेज से दूर होकर अनन्त विनाश का दण्ड पाएंगे" (2 थिस. 1:7-9)।

6. आप को उन से बचना हैं जो एक मात्र प्रभु परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह का इंकार करते हैं।

"क्योंकि कितने ऐसे मनुष्य चुपके से हम में आ मिले हैं, जिनके इस दण्ड का वर्णन पुराने समय में पहिले ही से लिखा गया था: ये भक्तिहीन हैं, और हमारे परमेश्वर के अनुग्रह को लुचपन में बदल डालते हैं, और हमारे प्रभु परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह का इंकार करते हैं" (यहूदा 4)।

विचार
परमेश्वर व्दारा बुलाए हुए सेवक के रूप में आपको उनसे बचना हैं जो हमारे एकमात्र स्वामी और प्रभु यीशु मसीह का इंकार करते हैं। आपका एकमात्र स्वामी और प्रभु यीशु मसीह हैं; इसलिए, आप को उसकी और केवल उसकी सेवा करना हैं और आज्ञापालन करना हैं। उपरोक्त वचन में तीन बिन्दुओं पर ध्यान दें।

अ)     झूठे शिक्षक कलीसिया में चुपके से घुस आते हैं। वे परमेश्वर व्दारा बुलाए हुए शिक्षक नहीं हैं। वे कलीसिया में शिक्षा देने का चुनाव एक पेशे के रूप में या लोगों की सेवा करने और जीवन की नैतिकताओं और गुणों को सिखाने के एक तरीके के रूप में करते हैं। विचार यह हैं कि वे बिना ध्यान आकर्षण किए कलीसिया में प्रविष्ट हुए। उन्होंने यीशु मसीह पर विश्वास नहीं किया, कि वह परमेश्वर का पुत्र हैं जो मनुष्य को बचाने के लिए पृथ्वी पर आया। इसलिए वे कलीसिया के नहीं हैं। परन्तु वे उससे जुड़ गये उन अवसरों और लाभ के लिए जो वह उनके लिए लाई। उन्होंने मसीह की शिक्षाओं को ग्रहण किया, विश्वास किया कि वह एक महान धार्मिक अगुवा था, परन्तु उन्होंने उसके ईश्वरत्व का इंकार किया।

"क्योंकि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, और छल से काम करनेवाले, और मसीह के प्रेरितों का रूप धरनेवाले हैं। और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता हैं। सो यदि उसके सेवक भी धर्म के सेवकों का सा रूप धरें, तो कुछ बड़ी बात नहीं परन्तु उनका अन्त उनके कामों के अनुसार होगा" (2 कुरि. 11:13-15)।

ब) झूठे शिक्षकों का न्याय किया जाना निश्चित हैं। वे यीशु मसीह का तिरस्कार करते हैं; इसलिए, न्याय उनकी प्रतीक्षा कर रहा हैं। परमेश्वर ने समय के आरम्भ से ही ठहराया हैं कि सब अविश्वासियों का न्याय किया जाएगा। और यीशु मसीह और पवित्रशास्त्र दोनों सिखाते हैं कि झूठे शिक्षकों का न्याय अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अत्याधिक कठोर होगा।

"मुझे आश्चर्य होता हैं, कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उससे तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार हैं ही नहीं; पर बात यह हैं, कि कितने ऐसे हैं, जो तुम्हें घबरा देते हैं, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं। परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हम ने तुम को सुनाया हैं, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो। जैसा, हम पहिले कह चुके हैं, वैसा ही मैं अब फिर कहता हूं, कि उस सुसमाचार को छोड़ जिसे तुम ने ग्रहण किया हैं, यदि कोई और सुसमाचार सुनाता हैं, तो श्रापित हो" (गला 1:6-9)।

स) झूठे शिक्षक भक्तिहीन हैं। वे परमेश्वर के समान नहीं जीते; वे परमेश्वर से भिन्न हैं। उनकी एक भिन्न जीवनशैली हैं उस की अपेक्षा जो परमेश्वर की होती यदि वह पृथ्वी पर चलता होता। परमेश्वर सिध्द, नैतिक, शुध्द, धर्मी और प्रेमी हैं। परन्तु झूठे शिक्षक नैतिक, शुध्द, धर्मी, या प्रेमी नहीं हैं। वे धोखेबाज हैं, लोगों को परमेश्वर के प्रेम और शुध्दता से दूर ले जाते हैं, उस प्रेम और शुध्दता से जो उसके पुत्र, प्रभु यीशु मसीह में प्रगट हैं। मसीह में प्रदर्शित परमेश्वर के प्रेम और शुध्दता के सत्य को वे नहीं सिखाते। वे परमेश्वर और उसके प्रेम और धार्मिकता के सत्य को अशुध्द करते हैं।

"परमेश्वर का क्रोध तो उन लोगों की सब अभक्ति और अधर्म पर स्वर्ग से प्रगट होता हैं, जो सत्य को अधर्म से दबाए रखते हैं" (रोमि. 1:18)।

7. आप को धर्म - भ्रष्टों, झूठे शिक्षकों का तिरस्कार करना हैं।

"किसी पाखंडी को एक दो बार समझा बुझाकर उससे अलग रह। यह जानकर कि ऐसा मनुष्य भटक गया हैं, और अपने आप को दोषी ठहराकर पाप करता रहता हैं" (तीतु. 3:10-11)।

विचार
मसीह के एक सेवक के रूप में, आप को धर्म भ्रष्टों का तिरस्कार करना हैं, उनका जो मसीह और परमेश्वर के वचन के सत्य को छोड़ देते हैं। यूनानी शब्द "धर्मभ्रष्ट" (हैरटिकौस) रूचिकर हैं। इसका अर्थ हैं स्वयं के लिए ले लेना; स्वयं के लिए चुनना। इसलिए, एक धर्म - भ्रष्ट ऐसा एक व्यक्ति हैं जो चुनता हैं कि वह क्या विश्वास करेगा, जो झूठी शिक्षा को स्वयं के लिए ले लेता हैं। वह सब अधिकार का तिरस्कार करता हैं चाहे वह जो भी हो: परमेश्वर, मसीह, परमेश्वर का वचन, कलीसिया, मनुष्य। वह स्वयं चुनता हैं कि उसे क्या विश्वास करना हैं। वह और केवल वह उसका अधिकारी हैं; वह और केवल वह सत्य को निश्चित करता हैं - कि क्या सत्य हैं और क्या सत्य नहीं हैं। दो महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान दें।

प्रथम, यह धर्म - भ्रष्ट कलीसिया में हैं; वह विश्वासियों के साथ रहता हैं। अधिकांश धर्म - भ्रष्टों का यही चित्रण हैं। कुछ ही मसीह और बाईबिल की सब शिक्षाओं का तिरस्कार करते हैं। अधिकांश धर्मभ्रष्ट कलीसिया में रहते हैं, कुछ मूल शिक्षाओं को पकड़े हुए परन्तु उन शिक्षाओं का तिरस्कार करते हुए जिन को वे पसन्द नहीं करते हैं। पवित्रशास्त्र स्पष्ट हैं: आप और कलीसिया को धर्मभ्रष्ट या झूठे शिक्षक तक पहुंचना हैं। उसे बुरा - भला कहकर तिरस्कृत करके कलीसिया से निकालना नहीं हैं। मसीह के लिए उस तक पहुंचने का प्रयास करना हैं। यथार्थ में, पवित्रशास्त्र कहता हैं कि दो प्रबल प्रयास किए जाने चाहिए उस तक पहुंचने के लिए। उसे प्रेम और चिंता दिखाना हैं और डांटना हैं कि वह मन फिरा कर मसीह और उसके वचन के सत्य का अंगीकार करे। परन्तु ध्यान दें: एक सीमा हैं। तीसरे प्रयास पर, यदि वह मन नहीं फिराता तो उसका तिरस्कार किया जाना हैं, अर्थात्, कलीसिया से निकाल दिया जाना हैं। उसे अन्य विश्वासियों को बहकाने नहीं देना हैं (देखें प्रचारक की रूपरेखा और उपदेश बाईबिल, रूपरेखा और लेख 
मत्ती 18:15-20 मसीह व्दारा सिखाए गए कलीसियाई अनुशासन पर अधिक विस्तृत चर्चा के लिए) 

व्दितीय, धर्मभ्रष्ट "भटक गया हैं" (एकद्रेपो)। इसका अर्थ हैं कि वह विकृत हैं और मसीह और उसके वचन के सत्य से हट गया हैं। ध्यान दें कि धर्मभ्रष्ट पाप करता हैं। विचार यह हैं कि वह अत्याधिक पाप करता हैं। इसलिए, वह स्वयं को दोषी ठहराता हैं। उसने अविश्वास का पथ चुना हैं, और अपने अविश्वास के लिए वह दोषी ठहराया जाएगा।

"जो उस पर विश्वास करता हैं, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिए कि उसने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया" (यूह 3:18)।

विचारशील और सच्चे सेवक के लिए बिन्दु स्पष्ट हैं, और सच्चाई उतनी ही आवश्यक हैं जितनी कि इस मुद््दे के विषय में विचार करने की इच्छा। एक व्यक्ति जो अपनी धारणा की कैंची का प्रयोग करके मसीह और परमेश्वर के वचन को काट देता हैं - उसके और उसके वचन के विषय की कुछ शिक्षाओं को काट कर फेंक देता हैं - जिसे बाईबिल व्दारा धर्मभ्रष्ट समझा जाता हैं। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह कौन हैं: प्रचारक, शिक्षक, या साधारण मनुष्य। यही वह व्यक्ति हैं जिसे बाईबिल धर्मभ्रष्ट कहती हैं। यदि वह मसीह और पवित्रशास्त्र के सत्य से स्वयं को मरोड़ कर बाहर कर लेता हैं, तो वह धर्मभ्रष्ट हैं। इसलिए, प्रेमपूर्वक उसके पास जाकर दो विशिष्ट अवसरों पर उसे डांटना हैं। यदि इन दो डांटों का वह तिरस्कार करता हैं, तो उसके पास तीसरी बार पहुंचना हैं, और यदि वह मन फिराने से तब भी इंकार करता हैं तो उसका तिरस्कार करना हैं। उसका तिरस्कार करके निष्कासन किया जाना चाहिए चाहे वह कलीसिया में एक सेवक और शिक्षक क्यों न हो।

एक महत्वपूर्ण और दुख:द प्रश्न यह हैं - एक प्रश्न जिसका उत्तर न्याय के उस महान और भयानक दिन में परमेश्वर अवश्य देगा: हमारी कलीसियाओं के कितने लाखों लोगों को बहकाया गया हैं झूठे शिक्षकों व्दारा, जिन को बाइबिल धर्मभ्रष्ट कहती हैं - जो कि मसीह और उसके वचन के सत्य से मुड़ गए हैं?

"यदि तेरा भाई तेरा अपराध करे, तो जा और अकेले में बातचीत करके उसे समझा, यदि वह तेरी सुने तो तूने अपने भाईको पा लिया। और यदि वह न सुने, तो एक दो जन को अपने साथ ले जा, कि हर एक बात दो या तीन गवाहों के मुंह से ठहराई जाए। यदि वह उनकी भी न माने, तो कलीसिया से कह दे, परन्तु यदि वह कलीसिया की भी न माने, तो तू उसे अन्यजाति और महसूल लेनेवाले के जैसा जान" (मत्ती 18:15-17)।

"और जिस प्रकार उन लोगों में झूठे भविष्यवक्ता थे उसी प्रकार तुम में भी झूठे उपदेशक होंगे, जो नाश करनेवाले पाखंड का उद्घाटन छिप छिपकर करेंगे और उस स्वामी का जिस ने उन्हें मोल लिया हैं इंकार करेंगे और अपने आप को शीघ्र विनाश में डाल देंगे" (2 पत 2:1)।

8. आप को उन को तिरस्कृत करना हैं जो मसीह के वचनों और धार्मिकता की शिक्षा नहीं देते।

"यदि कोई और हीं प्रकार का उपदेश देता हैं; और खरी बातों को, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह की बातों को और उस उपदेश को नहीं मानता, जो भक्ति के अनुसार हैं। तो वह अभिमानी हो गया, और कुछ नहीं जानता वरन उसे विवाद और शब्दों पर तर्क करने का रोग हैं, जिनसे डाह, और झगड़े, और निन्दा की बातें, और बुरे बुरे संदेह। और उन मनुष्यों में व्यर्थ रगड़े झगड़े उत्पन्न होते हैं, जिनकी बुध्दि बिगड़ गई हैं और वे सत्य से विहीन हो गए हैं, जो समझते हैं कि भक्ति कमाई का व्दार हैं: ऐसों से स्वयं को अलग कर लें" (1 तीमु. 3:5)।

विचार
मसीह के एक सेवक के रूप में, आप को उनका तिरस्कार करना हैं जो मसीह के वचनों और भक्ति की शिक्षा को नहीं सिखाते हैं। आप मसीह के सेवक हैं, पृथ्वी पर उसके प्रतिनिधि हैं; इसलिए, आपको उनका विरोध और तिरस्कार करना हैं जो एक भिन्न शिक्षा देते हैं। यह एक भयानक दोषी ठहराया जाना हैं। कल्पना करें एक मसीही कलीसिया के पुलपिट में होने की और प्रभुयीशु मसीह के एक शिक्षक होने का दावा करने की, तथापि उसके वचनों को नहीं सिखाने की। हम में से कितने इस प्रकार दोषी ठहराए जाने वाले अपराधी हैं? हम में से कितने दोषी हैं एक भिन्न शिक्षा सिखाने के? दो कारण दिए गए हैं कि झूठे शिक्षक एक भिन्न शिक्षा क्यों सिखाते हैं।


प्रथम, झूठा शिक्षक हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों से सहमत नहीं हैं। "सहमत" शब्द (प्रोसकॉर्मोई) का अर्थ हैं "पहुंच" और मसीह से "स्वयं को जोड़ने" का अर्थ रखता हैं। झूठा शिक्षक स्वयं को प्रभु यीशु मसीह से जोड़ने को तैयार नहीं हैं।

* वह अंगीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि यीशु स्वर्ग से प्रभु परमेश्वर हैं, स्वयं परमेश्वर का पुत्र हैं।

* वह अंगीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि यीशु ही ख्रीष्ट हैं, मसीहा और जगत का उध्दारकर्त्ता हैं।

व्दितीय, झूठा शिक्षक धार्मिकता की शिक्षाओं से सहमत नहीं हैं।

* वह परमेश्वर की धार्मिकता को जो यीशु मसीह में प्रगट की गई स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

* वह स्वयं को संसार से अलग करने के लिए तैयार नहीं हैं और न अपने जीवन को परमेश्वर के लिए पूर्णतः अलग करने के लिए।

इन एक या दोनों कारणों से झूठा शिक्षक मसीह के पौष्टिक वचनों को नहीं सिखाता, परन्तु एक भिन्न शिक्षा और जीवन शैली को सिखाने का चुनाव करता हैं। उसने अपना जीवन सेवकाई के पेशे को समर्पित किया हैं...

* मानव जाति की सेवा करने के एक तरीके के रूप में।

* जीविकोपार्जन के एक तरीके के रूप में।

परन्तु मसीह और उसके वचन का प्रतिनिधित्व करने के लिए वह समर्पित नहीं हैं। परिणामस्वरूप, पवित्रशास्त्र और मसीह दोनों व्दारा उस व्यक्ति को एक झूठा शिक्षक कहा जाता हैं। उपरोक्त वचन झूठे शिक्षक के विषय में चार बातें कहता हैं।

अ) झूठा शिक्षक घमंडी हैं (टेटूफोटाई)। इस शब्द का अर्थ हैं "फूला हुआ" और अहंकारी। परन्तु ध्यान दें: शब्द में मूर्खता की धारणा भी हैं; उसमें सुबुध्दि का अभाव हैं। इस प्रमाण का तिरस्कार करना कि यीशु ही प्रभु हैं - प्रभु यीशु मसीह - घमंड और मूर्खता की पराकाष्ठा हैं। ऐसे तिरस्कार में सुबुध्दि का अभाव हैं (स्त्रोत अज्ञात)। झूठा शिक्षक घमंड करता हैं...


  • अपनी धारणाओं और विचारों पर।

  • बाइबिल के कुछ अंशों के उसके तिरस्कार पर।

  • अपने ज्ञान पर कि बाईबिल की कुछ कथाए और घटनाएं ऐसी हैं जिसे वह कल्पनाएं या मिथ्या कहता हैं।

  • अपनी मानसिक योग्यता पर जो मसीह के विषय में सत्य को झूठ से अलग करने की हैं।

  • अपने प्रकाशन पर - कि वह बेहतर जानता हैं ऐसी बातों में विश्वास करने की अपेक्षा जैसे कि चमत्कार, ईश्वरत्व, कुंवारी से जन्म, अवतरण, पुनरूत्थान, स्वर्गारोहण, और पृथ्वी पर मसीह का व्यक्तिगत आगमन।

  • मसीह के विषय में उसके नवीन और नए विचारों और धारणाओं पर।

सूची आगे और आगे जा सकती हैं, परन्तु सब सेवकों ने अन्य सेवकों के साथ चर्चा में इस घमंड को पाया हैं। और दुख की बात हैं, कि हम सब हमारे स्वयं के विचारों पर घमंड करने के दोषी हैं। विलियम बार्क्ले के पास झूठे शिक्षक के घमंड पर एक श्रेष्ठ टिप्पणी हैं:

"उसका प्रथम, गुण है अहंकार। उसका प्रथम लक्ष्य हैं आत्म - प्रदर्शन। उसकी इच्छा मसीह को प्रदर्शित करने की नहीं हैं, परन्तु स्वयं को प्रदर्शित करने की हैं। अब भी प्रचारक और शिक्षक हैं जो यीशु मसीह की अपेक्षा स्वयं के लिए अनुयायी बनाने के लिए अधिक चिंतित हैं। परमेश्वर के वचन को मनुष्यों तक पहुंचाने की अपेक्षा वे उनके स्वयं के विचारों को लोगों पर थोपने के लिए अधिक चिंतित हैं। जब लोग अराधना के लिए एकत्रित होते हैं तो वे किसी मनुष्य के विचारों को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं; वे उत्सुक हैं यह सुनने के लिए कि परमेश्वर क्या कहता हैं। महान प्रचारक और शिक्षक स्वयं के विचारों का वितरक नहीं हैं; वह परमेश्वर की एक प्रतिध्वनि हैं" (तीमुथियुस, तीतुस, और फिलेमोन की पत्रियां, पृ 146)।

ब) झूठे शिक्षक की एक अस्वस्थ रूचि हैं विवादी प्रश्नों में। प्रचार और शिक्षा देने की तैयारी करते समय, झूठा शिक्षक प्राथमिक स्त्रोत, परमेश्वर के वचन पर निर्भर नहीं रहता। वह माध्यमिक स्त्रोतों, अर्थात्, बाईबिल के विषय में पुस्तकों पर निर्भर रहता हैं।

बाईबिल न तो उसके जीवन का आधार हैं और न उसके प्रचार और शिक्षण का। झूठा शिक्षक प्राथमिक स्त्रोत (बाईबिल) का तिरस्कार कर के बाईबिल के विषय के माध्यमिक स्त्रोतों की ओर मुड़ता हैं। कुछ तो बाईबिल अध्ययन तक करना नहीं जानते। उसकी रूचि हैं...

  • बाईबिल में सत्य की खोज के प्रयत्न में, बाईबिल के सत्य का प्रचार करने में नहीं।

  • बाईबिल के अनुसार जीने की अपेक्षा प्रश्न करने में कि सत्य क्या हैं और असत्य क्या हैं।

परिणाम, अवश्य ही, वह हैं जिसे हम बहुधा लिखा हुआ देखते हैं झूठे शिक्षक और जो उनके अनुयायी हैं उनके चेहरों और बुद्धि में: अनेक विचार और क्षण..

  • व्याकुलता और अशांति के।

  • सोचने में कि क्या परमेश्वर यथार्थ में हैं।

  • खालीपन और उध्देश्यहीनता के।

  • सोचने में कि क्या धर्म और आराधना में वास्तव में कोई अर्थ हैं।

  • जीवन पर प्रश्न करने और जीवन के अर्थ के अभाव के।

  • सोचने में कि इस पृथ्वी के परे क्या वास्तव में एक संसार या जीवन हैं।

क्यों? क्योंकि मानव हृदय जिसकी लालसा करता हैं वह हैं परमेश्वर और उसका वचन, उसका ज्ञान और आश्वासन और उसका मार्गदर्शन।

यह तो केवल तर्कसंगत और अपेक्षित हैं क्योंकि परमेश्वर -सृष्टि कर्त्ता और जीवन दाता - ने अवश्य ही मनुष्य के भीतर एक गहरी, स्वाभाविक भूख रखी हैं उसके और उसके वचन के लिए। इसलिए, जो लालसा मानव हृदय करना हैं, झूठे शिक्षक का हृदय तक, वह "हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों" या बाईबिल के वचनों पर विवादी प्रश्न और तर्क नहीं हैं। हृदय जो लालसा करता हैं वह परमेश्वर से सुनने की, स्वयं परमेश्वर के वचन के अधिकार - युक्त प्रचार को सुनने की हैं।

स) झूठे शिक्षक की बुद्धि भ्रष्ट हैं और उसमें सत्य नहीं हैं। उसकी बुद्धि इसी बात में भ्रष्ट हैं: "हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों और धार्मिकता की शिक्षा" (परमेश्वर का वचन, पवित्रशास्त्र, बाईबिल। 1 तीमु. 6:3) देने पर यह केंद्रित नहीं हैं। उसकी बुद्धि...

  • केंद्रित हैं मनुष्यों की शिक्षा और ईश्वरज्ञान पर

  • केंद्रित हैं मनुष्यों के मनोविज्ञान और दर्शन पर

  • केंद्रित हैं मनुष्य की स्वयं की उर्जा और आत्म - उन्नति पर, मनुष्य के अहं और आत्म - छवि को उन्नत करने पर।

  • केंद्रित हैं आधुनिकतम धर्मों या ईश्वरज्ञानी विचारों पर।

  • केंद्रित हैं लोकप्रिय धार्मिक चर्चा पर जो मनुष्य के कानों को प्रसन्न करती और गुदगुदाती हैं।

बिन्दु यह हैं: झूठा शिक्षक सत्य पर, परमेश्वर के वचन पर केंद्रित नहीं हैं। वह सत्य से खाली हैं। उसके पास सत्य नहीं हैं और न वह सत्य की शिक्षा देता हैं। सत्य की बात जब आती हैं तो वह दिवालिया हैं। तथापि ध्यान दें: जो शिक्षा झूठा शिक्षक देता हैं, उस से बहुधा हमारी सहायता होती हैं उच्चतर करने में: बहुधा यह सहायक हैं हमारे अह और आत्म - छवि को उन्नत करने और इस जीवन में अधिक उपलब्धियां पाने में। कुछ स्वयं - सहायता प्रचार कुछ आत्म सहायता कार्यक्रमों, दवाखानों, सम्मेलनों के समान हैं जो पूरे देश भर में किए जाते हैं: वे श्रेष्ठ हैं जहां तक वे जाते हैं। परन्तु उनमें एक गभीर त्रुटि है: वे पर्याप्त दूरी तक नहीं जाते हैं। वे नही दर्शाते...

  • कि परमेश्वर वास्तव में हमारे साथ हैं और हमारी देख - भाल कर रहा हैं जब हम पृथ्वी पर चलते हैं।

  • कि यीशु मसीह वास्तव में हमारे पापों के लिए मरा और जी उठा हमें जीवन देने के लिए - जीवन जो अनन्तकाल तक चलेगा।

  • कि परमेश्वर ने वास्तव में हमारे पापों को क्षमा कर दिया और मसीह में हमें स्वीकार किया हैं।

  • कि जब हम मरेंगे, तब परमेश्वर तुरन्त हमें उसकी उपस्थिति में स्थानान्तरित करेगा उसके साथ सदा रहने के लिए।

इस प्रकार का पूर्ण, सघन आश्वासन झूठे शिक्षक और किसी और व्यक्ति में नहीं हैं जिसकी बुद्धि "हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों और धार्मिकता की शिक्षा" अर्थात् परमेश्वर के वचन पर केंद्रित नहीं हैं (1 तीमु 6:3)।

ड) झूठा शिक्षक सोचता हैं कि धर्म से लाभ हैं। इसका अर्थ न्यूनतम तीन बातें हैं।

  • कुछ झूठे शिक्षक चिंतित हैं नैतिकता और गुण और मनुष्य से कि वह सर्वोत्तम बने और यथासंभव अत्याधिक उपलब्धियां प्राप्त करें। वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, आवश्यक नहीं कि मसीह में, परन्तु परमेश्वर में। इसलिए, वे जानते हैं कि मनुष्य और उसके संसार को श्रेष्ठतर बनाने का उत्तर हैं धर्म। इसलिए, वे अपने जीवनों को परमेश्वर और धर्म के प्रति, मनुष्यों को धर्म को कार्यो को कराने और अधिक धर्मी और नैतिक जीवनों को जीने के लिए, समर्पित कर देते हैं। वे चाहते हैं कि मनुष्य भले हों और भले कार्य करें। वे सोचते हैं कि "भक्ति लाभ हैं", कि यह सहायक हैं और मनुष्य और उसके जगत के लिए लाभ दायक हैं।

ध्यान दें कि झूठा शिक्षक इस बिन्दु पर ठीक है: धर्म की नैतिक शिक्षा - नैतिक और धर्मी जीवन जीना - मनुष्य के लिए अच्छा हैं। परन्तु जैसा कि ऊपर इंगित किया गया हैं, कर्म और स्वयं सहायक सेवक पर्याप्त दूरी तक नहीं जाते। वे परमेश्वर के पुत्र, प्रभु यीशु मसीह पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। और परमेश्वर कभी भी किसी को स्वीकार नहीं करेगा जो उसके पुत्र का आदर नहीं करता, क्योंकि परमेश्वर के पास केवल एक पुत्र हैं जो उस से उत्पन्न हुआ, एक मात्र पुत्र जिस से वह प्रेम करता हैं उस सबसे सिध्द प्रेम से जो कि अनन्तकाल के लिए संभव हैं।

  • कुछ झूठे शिक्षक एक पेशे के रूप में और जीविकोपार्जन के एक साधन के रूप में सेवकाई में प्रवेश करते हैं। संभवत: लोगों के धार्मिक हित की उन्हें कुछ चिंता हैं, परन्तु सेवकाई में प्रवेश करने का चुनाव करने में बड़ा विचार यह था; उनके विचार में यह एक अच्छा और सराहनीय पेशा होगा और उनके और उनके वर्तमान या भविष्य के परिवार के लिए एक अच्छी जीविका प्रदान करेगा।

  • कुछ झूठे शिक्षकों ने धर्म को व्यवसाय बना लिया हैं। झूठा शिक्षक "लाभ के लिए तत्पर हैं। वह अपने शिक्षण और प्रचार को एक बुलाहट के रूप में नहीं देखता, परन्तु एक पेशे के रूप में। वह व्यवसाय में हैं, दूसरों की सेवा के लिए नहीं, परन्तु स्वयं को उन्नत करने के लिए" (विलियम बार्क्ले 1 तीमुथियुस, तीतुस, और फिलेमोन की पत्रियां, पृ 148)।

सेवक के लिए पवित्रशास्त्र का उपदेश स्पष्ट, सीधा और प्रबल है: "ऐसों से अलग हो।" उस व्यक्ति के साथ जो कि एक झूठा सेवक और शिक्षक हैं हमें न तो अधीन होना हैं, न साथ देना हैं, और न कुछ संबंध रखना हैं। कलीसिया पेशेवरों का स्थान नहीं हैं और न मानव प्रयास और कर्मो (मानववाद) की शिक्षा का।

मानव केंद्रित और स्वयं - सहायता शिक्षण सहायक हैं, परन्तु परमेश्वर की कलीसिया के पुलपिट में इसका कोई स्थान नहीं हैं, धर्म - निरपेक्ष जगत के संगोष्ठी कक्षों और महाकक्षों में इसका स्थान हैं। कलीसिया को सुसमाचार प्रचार में शुद्ध और स्वतन्त्र रहना हैं और उस सर्वोच्च प्रेम में जो परमेश्वर ने अपने पुत्र, प्रभु यीशु मसीह में प्रदर्शित किया। यदि मानव जाति परमेश्वर के शुद्ध वचन को परमेश्वर की कलीसिया के पुलपिटों से प्रवाहित होने नहीं देती, तब मानव जाति का नाश हो जाएगा। क्यों? क्योंकि जब हम मरेंगे तो सब समाप्त हो जाएगा। परमेश्वर से हम सदा के लिए अलग हो जाएंगे। क्योंकि परमेश्वर हमें तब ही ग्रहण करेगा यदि हम मसीह में उस तक पहुंचे। इसलिए, मनुष्य के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण समय सदा वह होगा जब वह परमेश्वर के वचन के - "हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों और धार्मिकता की शिक्षा के "प्रचार के नीचे बैठता हैं। जब मनुष्य परमेश्वर के वचन के प्रचार को सुनता हैं, तो उसे प्रत्युत्तर देना और करना हैं जैसा परमेश्वर कहता हैं।

"अब हे भाईयों, मैं तुम से विनती करता हूं, कि जो लोग उस शिक्षा के विपरीत जो तुमने पाई हैं, फूट पड़ने, और ठोकर खाने के कारण होते हैं, उन्हें ताड़ लिया करो; और उन से दूर रहो। क्योंकि ऐसे लोग हमारे प्रभु मसीह की नहीं, परन्तु अपने पेट की सेवा करते हैं; और चिकनी चुपड़ी बातों से सीधे सादे मन के लोगों को बहका देते हैं" (रोमि 16:17-18)।

"वे भक्ति का भेष तो धरेंगे, पर उसकी शक्ति को न मानेंगे; ऐसो से परे रहना" (2 तीमु. 3:5)।

"यदि कोई तुम्हारे पास आए, और यही शिक्षा न दे, उसे न तो घर में आने दो, और न नमस्कार करो। क्योंकि जो कोई ऐसे जन को नमस्कार करता हैं, वह उसके बुरे कामों में साझी होता हैं" (2 यूह 10-11)।


यदि आप जानना चाहते हैं कि एक सच्चे सेवक का बाइबल के अनुसार क्या कर्तव्य है, तो इस लिंक पर क्लिक करके पूरा लेख पढ़ें 👉 — सेवक से बाइबल क्या कहती है ?


सेवक से बाइबल क्या कहती है अध्याय 7 | झूठी शिक्षा के प्रति सेवक का कर्त्तव्य | Bible Teaching Hindi | Christian Doctrine Explained

ब) आप और अन्य सुसमाचार


  1. आप को मसीह के सुसमाचार को बदलना नहीं हैं और न किसी अन्य सुसमाचार का प्रचार करना हैं।

"मुझे आश्चर्य होता हैं, कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उस से तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे हो। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार हैं ही नहीं, पर बात यह हैं, कि कितने ऐसे हैं, जो तुम्हें घबरा देते, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं। परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हम ने तुम को सुनाया हैं, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो। जैसा हम पहिले कह चुके हैं, वैसा ही मैं, अब फिर कहता हूं, कि उस सुसमाचार को छोड़ जिसे तुम ने ग्रहण किया हैं, यदि कोई और सुसमाचार सुनाता हैं, तो श्रापित हो" (गला 1:6-9)।

"मैं जानता हूं, कि मेरे जाने के बाद फाड़नेवाले भेड़िये तुम में आएगे, जो झुंड को न छोड़ेगे। तुम्हारे ही बीच में से भी ऐसे ऐसे मनुष्य उठेंगे, जो चेलों को अपने पीछे खींच लेने को टेढ़ी मेढ़ी बातें कहेंगे" (प्रेरि. 20:29-30)।

विचार

परमेश्वर व्दारा बुलाए गए एक सेवक के रूप में, आप को मसीह के सुसमाचार को मरोडना नहीं हैं और न अन्य किसी सुसमाचार का प्रचार करना हैं। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, नितान्त अनिवार्य हैं। लोगों के प्राण दांव पर लगे हैं। यह एक प्रबल चेतावनी हैं, परन्तु पौलुस के पास कोई चुनाव नहीं था। इन शब्दों को लिखने में पौलुस को बलवान होना था, क्योंकि मसीह ने सिखाया था कि एक प्राण का मूल्य संसार के समस्त धन से अधिक था।

"यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा? और मनुष्य अपने प्राण के बदले क्या देगा?" (मर 8:36-37)।

प्रबलता से और बलपूर्वक, पौलुस हमें चिताता हैं - हम सब जो सेवक हैं - कि परमेश्वर के पास केवल एक संदेश है: मसीह का सुसमाचार यह परमेश्वर का सुसमाचार हैं और केवल परमेश्वर का ही सुसमाचार जिसका प्रचार, शिक्षण किया जाना हैं और पालन किया जाना हैं। तीन चेतावनियां दी गई हैं।

अ) आप को "किसी और सुसमाचार" का प्रचार और शिक्षण नहीं करना हैं। "अन्य" (हेटेरौन) का अर्थ हैं एक भिन्न सुसमाचार, मात्र एक बल या आत्मा में अंतर नहीं। इसका अर्थ हैं एक भिन्न प्रकार का सुसमाचार जो प्रस्तुत करता हैं...

  • एक भिन्न यीशु

  • एक भिन्न अनुग्रह

  • एक भिन्न तरीका उध्दार पाने के लिए

  • एक भिन्न परमेश्वर

  • परमेश्वर के प्रेम का एक भिन्न चित्र

परन्तु ध्यान दें कि पवित्रशास्त्र क्या घोषित करता हैं: कोई अन्य सुसमाचार नहीं हैं। कोई अन्य सुसमाचार नहीं हैं; केवल एक सच्चा सुसमाचार हैं जिसके व्दारा मनुष्य परमेश्वर व्दारा ग्रहणयोग्य बन सकते हैं, और वह हैं स्वयं परमेश्वर का सुसमाचार जो उसके पुत्र की मृत्यु में प्रगट हुआ, जो कि "मसीह का अनुग्रह" हैं (गला 1:6)।

आप को कभी भी किसी अन्य सुसमाचार का प्रचार नहीं करना हैं। केवल एक ही सच्चा सुसमाचार हैं, हमारे प्रभु यीशु मसीह का सुसमाचार।

"क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, कि जो कोई उस पर विश्वास रखे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए" (यूह 3:16)।

"तब शिमोन पतरस ने उसे उत्तर दिया, कि हे प्रभु हम कहां जाएं? तेरे पास ही तो अनन्त जीवन के वचन हैं" (यूह 6:68)।

"इसलिए मैंने तुम से कहा, कि तुम अपने पापों में मरोगे; क्योंकि यदि तुम विश्वास न करो कि मैं वह हूं, तो तुम अपने पापों में मरोगे" (यूह 8:24)।

"और न किसी और में उध्दार हैं: क्योंकि आकाश के नीचे मनुष्यों के बीच कोई और नाम नहीं दिया गया हैं जिस के व्दारा हमारा उद्धार हो" (प्रेरि. 4:12)।

"क्योंकि मैंने यह ठान लिया था, कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह, वरन क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानू (1 कुरि 2:2)।

"क्योंकि उस नेव को छोड़ जो पड़ी हैं, और वह यीशु मसीह है: कोई दूसरी नेव नहीं डाल सकता" (1 कुरि 3:11)।

ब) आप को मसीह के सुसमाचार को बदलना नहीं हैं। "बदलना" (मेटास्ट्रेपसाइ) शब्द का अर्थ हैं मोड़ देना, पूर्णतः बदल देना, विकृत करना। आप को परमेश्वर के प्रेम के सुसमाचार को लेकर, जैसा कि उसके पुत्र, यीशु मसीह में प्रदर्शित हैं, उसे बदलना नहीं हैं। पौलुस के दिन में, झूठे शिक्षक दावा करते थे मसीही, मसीह के अनुयायी होने का। उन्होंने पौलुस के साथ विश्वास तक किया था...

  • कि परमेश्वर ने जगत से प्रेम किया और अपने पुत्र को जगत में भेज दिया।

  • कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र था जो वास्तव में पृथ्वी पर आया था।

  • कि यीशु मसीह मरा और मृतकों में से जी उठा।

तथापि, झूठे शिक्षक सुसमाचार में कुछ जोड़ रहे थे या घटा रहे थे; वे उसके अर्थ को मरोड़ रहे थे और उस के व्दारा पौलुस व्दारा प्रचार किए गए पवित्रशास्त्र से कुछ पूर्णतः भिन्न बात कहलवा रहे थे। उन्होंने सुसमाचार को मरोड़ा यह कहने के व्दारा...

  1. कि परमेश्वर ने जगत के लिए अपने प्रेम को प्रदर्शित किया, अपने पुत्र को भेजने के व्दारा, परन्तु उसने अपने पुत्र को विशेषकर धार्मिक व्यक्ति (यहूदी और धर्मवादी) के लिए भेजा। वे कह रहे थे कि परमेश्वर जगत से प्रेम करता हैं, परन्तु विशेषकर वह उन लोगों से प्रेम करता हैं जो धार्मिक जीवन जीते हैं। (ध्यान दें कि किस प्रकार यह परमेश्वर को पक्षपात करते हुए दर्शाता हैं और जातिवाद और पूर्वन्याय के लिए व्दार खोल देता हैं)।

  2. कि यीशु मसीह पृथ्वी पर आया; तथापि, मनुष्यों के लिए एक सिध्द धार्मिकता सुरक्षित करने के लिए यह नहीं था, परन्तु मनुष्यों को यह दर्शाने के लिए था कि एक अच्छा जीवन कैसे जिएं जो परमेश्वर को प्रसन्न करता और परमेश्वर के अनुमोदन का पात्र हो।

  1. कि यीशु मसीह मनुष्य के लिए मरा; तथापि, वह मनुष्य के पाप के लिए नहीं मरा। वह मनुष्य को यह दर्शाने के लिए मरा कि किस प्रकार उसे परमेश्वर के लिए मरने के लिए तैयार रहना चाहिए।

  2. कि मसीह की मृत्यु अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं; वह अपने आप अकेले खड़ी नहीं रह सकती; मनुष्य को परमेश्वर के लिए ग्रहणयोग्य बनाने के लिए यह पर्याप्त नहीं हैं। परमेश्वर के शुध्द प्रेम और मसीह के शुध्द अनुग्रह से कुछ अधिक की आवश्यकता हैं।

  3. कि एक व्यक्ति उद्धार प्राप्त और सुरक्षित हैं यदि उसने उस प्रथा को पूरा किया होगा जो कि शताब्दियों से विश्वासियों की मुख्य प्रथा रही थी: खतना (कलीसियाई सदस्यता, बपतिस्मा, दृढ़िकरण, इत्या।)

  4. कि एक व्यक्ति को परमेश्वर की व्यवस्था और कुछ कलीसियाई संस्कारों और प्रथाओं, नियमों और विधियों का पालन करने के लिए कर्म करना अवश्य हैं।

ध्यान दें कि यह झूठी शिक्षा कितनी विनाशकारी थी: विश्वासी व्याकुल थे, अर्थात् विचलित, उलझन में, असमंजस में, सम्भ्रांति में थे। वे न केवल सुसमाचार से विमुख हो रहे थे, परन्तु स्वयं परमेश्वर से और मसीह के महिमामय अनुग्रह से (गला 1:6)।

एक स्तब्ध करनेवाले सत्य पर ध्यान दें: कलीसिया में झूठी शिक्षा सत्य के कितने निकट है! किस प्रकार यहां पर एक छोटा सा जोड़ और वहां पर एक छोटा सा घटाना सुसमाचार की शुध्दता को विकृत करता हैं। परमेश्वर के सुसमाचार में स्वयं के विचारों को जोड़ने से आप को चौकस रहना हैं। मसीह के सुसमाचार को आप को कभी भी बदलना या मरोड़ना नहीं हैं।

"वे व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं" (मत्ती 15:9)।

"क्योंकि मैं जानता हूं, कि मेरे जाने के बाद फाड़नेवाले भेड़िए तुम में आएंगे, जो झुंड को न छोड़ेगे। तुम्हारे ही बीच में से भी ऐसे ऐसे मनुष्य उठेंगे, जो चेलों को अपने पीछे खींच लेने को टेढ़ी मेढ़ी बातें कहेंगे" (प्रेरि. 20:29-30)।

"क्योंकि हम उन बहुतों के समान नहीं, जो परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैं" (2 कुरि. 2:17)।

स) आप श्रापित होंगे यदि आप एक झूठे सुसमाचार का प्रचार करेंगे। चाहे आप कोई भी क्यों न हो, आप का जो भी पद हो और जो भी दावा हो, आप श्रापित होंगे यदि आप एक झूठे सुसमाचार को पकड़े हुए हैं। यह एक प्रबल कथन हैं परन्तु यह स्पष्टता से समझा जा सकता हैं। सुसमाचार वह साधन हैं जिस के व्दारा मनुष्यों का पाप, मृत्यु और दोषी ठहराए जाने की पकड़ से उध्दार होता हैं। बिना सुसमाचार किसी का उध्दार नहीं हैं - कोई व्यक्ति परमेश्वर के ग्रहणयोग्य नहीं बन सकता - कोई भी अनन्त जीवन का वारिस नहीं हो सकता। पवित्रशास्त्र इस विषय में स्पष्ट हैं और आप को और अन्य सब सेवकों को चिताता हैं। ध्यान दें कि इस सत्य को कितनी स्पष्टता से पवित्रशास्त्र घोषित करता हैं।

  1. सुसमाचार स्वयं पौलुस प्रेरित से बड़ा हैं। यह एक महत्वपूर्ण कथन हैं, क्योंकि स्मरण रखें कि पौलुस कौन था: संभवत: परमेश्वर का सर्वाधिक समर्पित सेवक जो कभी भी जीवित रहा हैं। एक पथ प्रदर्शक के रूप में वह जगत के अन्यजाति क्षेत्रों में गया कि लोगों तक मसीह के सुसमाचार के साथ पहुंचे, अच्छा समाचार कि मनुष्य पाप, और मृत्यु से छुटकारा पाकर अनन्तकाल तक जीवित रहे। वह गलातियों से इतना प्रेम करता था कि उनके लिए उसने जो कुछ वह था और उसका था, सब दांव पर लगा दिया था। कुछ के लिए तो पौलुस एक महापुरूष रहा होगा, और उनके मनों में अति प्रिय रहा होगा। परन्तु ध्यान दें कि पौलुस क्या कहता है: यदि लौटकर उन्हें वह कोई अन्य सुसमाचार सुनाए, तो वह श्रापित होगा। गलातियों को उसे ग्रहण नहीं करना था चाहे वे उसका कितना भी सम्मान क्यों न करते हो: उनको उसका तिरस्कार करना था। सुसमाचार अपनी सब सरलता और शुध्दता में स्वयं पौलुस से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था।

  2. सुसमाचार स्वर्गदूतों से बड़ा हैं। स्वर्ग से यदि एक दूत आकर कोई अन्य सुसमाचार प्रचार करने लगे तो उस का तिरस्कार करना था, क्योंकि वह भी श्रापित होगा। सुसमाचार का महिमामय संदेश स्वर्गदूतों से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।

  1. सुसमाचार किसी भी मनुष्य से बड़ा हैं (मत्ती 15:9)। यदि कोई मनुष्य कोई अन्य सुसमाचार प्रचार करें तो वह श्रापित होगा। सुसमाचार किसी भी मनुष्य से अधिक महत्वपूर्ण हैं।

  2. झूठे सुसमाचारों के प्रचारक दुगुने श्राप का दण्ड भोगेंगे। "श्रापित" (अनाथेमा) शब्द का यही अर्थ है: श्रापित होना, विनाश के लिए ठहराया जाना, अनन्त दण्ड का दिया जाना, परमेश्वर के प्रकोप के नीचे होना। विचार हैं अनन्त मृत्यु का पौलुस के इस शब्द के अन्य स्थल पर उपयोग से यह स्पष्ट हैं जहां वह स्वयं के लिए इसका उपयोग करता हैं: "मैं यहां तक चाहता था कि अपने भाइयों के लिए... स्वयं ही मसीह से श्रापित हो जाता" (रोमि 9:3)। पौलुस एक यहूदी था; वह कह रहा था कि वह अपने यहूदी भाइयों से इतना प्रेम करता था कि वह आनन्द से उनके उध्दार के लिए अनन्त दण्ड भोगने के लिए तैयार था (वही प्रेम जो मसीह ने सब लोगों के लिए प्रदर्शित किया था)।

पवित्रशास्त्र की सब चेतावनियों में सबसे कठोर में से यह एक हैं, और ध्यान दें कि यह किसे दी जाती हैं: आप को और अन्य सब सेवकों को। लेहमैन स्ट्रौस इंगित करता हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो प्रभु यीशु मसीह से प्रेम नहीं करता, श्रापित होगा। झूठा शिक्षक परमेश्वर के अनन्त प्रकोप को सहेगा।

"झूठे भविष्य वक्ताओं से सावधान रहो, जो भेड़ों के भेष में तुम्हारे पास आते हैं परन्तु अंतर में फाड़नेवाले भेड़िए हैं। उन के फलों से तुम उन्हें पहचानोगे, क्या झाड़ियों से अंगूर वा ऊंट कटारों से अंजीर तोड़ते हैं? प्रत्येक पेड़ जो अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में डाला जाता हैं" (मत्ती 7:15-16,19)।

"उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओं" (मत्ती 7:22-23)।

"हे सांपों, हे करैतों के बच्चो, तुम नरक के दंड से क्योंकर बचोगे?" (मत्ती 23:33)।


  1. आप को विनाशक झूठी शिक्षाओं को कलीसिया में नहीं लाना हैं, झूठी शिक्षाएं जो मनुष्य के लिए प्रभु और उसकी मृत्यु का इंकार करती हैं।

"और जिस प्रकार उन लोगों में झूठे भविष्यवक्ता थे उसी प्रकार तुम में भी झूठे उपदेशक होंगे, जो नाश करनेवाले पाखण्ड का उद्घाटन छिप छिपकर करेंगे और उस स्वामी का जिस ने उन्हें मोल लिया हैं इंकार करेंगे और अपने आप को शीघ्र विनाश में डाल देंगे" (2 पत 2:1)।

विचार

     मसीह के एक सेवक के रूप में, आपको विनाशक झूठी शिक्षाओं को कलीसिया में नहीं लाना हैं जो मनुष्य के लिए प्रभु और उसकी मृत्यु का इंकार करती हैं। पवित्रशास्त्र पर ध्यान दें: आप को गुप्त रूप से विनाशक झूठी शिक्षा नहीं सिखाना हैं, न गुप्त रूप से उद्घाटन करना या विनाशक शिक्षाओं को लाना है। "कहां लाना हैं?" कलीसिया में, विश्वासियों में। झूठे शिक्षक बाहर जगत में नहीं हैं, परन्तु वे कलीसिया में हैं। वे अगुवों के पद पर हैं जहां से वे उनकी विनाशक झूठी शिक्षाओं को सिखाएंगे। "झूठी शिक्षाओं" (हेरेसीज) शब्द बहुवचन हैं। कौन सी झूठी शिक्षाएं संदर्भित हैं? जो भी शिक्षा पवित्रशास्त्र, अर्थात् परमेश्वर के वचन या बाईबिल के विपरीत हैं। स्पष्ट हैं कि यही अर्थ हैं, क्योंकि हाल ही में उपदेश दिया गया हैं: "भविष्यवाणी के वचन, पवित्रशास्त्र पर ध्यान दो" (तुल. 2 पत 1:19-21)।

"और हमारे पास जो भविष्यवक्ताओं का वचन हैं वह इस घटना से दृढ़ ठहरा और तुम यह अच्छा करते हो कि तुम उसपर ध्यान करते हो... क्योंकि पुराने समय में भविष्यवाणी मनुष्य की इच्छा व्दारा नहीं आई: परन्तु परमेश्वर के पवित्र लोग पवित्र आत्मा की प्रेरणा व्दारा बोलते थे" (2 पत 1:19,21)।

बिन्दु यह है: कोई भी शिक्षा जो परमेश्वर के वचन के विपरीत हैं, एक विनाशक झूठी शिक्षा हैं। कलीसिया के लिए परमेश्वर के उध्देश्य को यह नष्ट करती हैं, और कलीसिया के भीतर लोगों के जीवनों को यह नष्ट करती हैं। शिक्षाएं जो परमेश्वर के वचन के विपरीत हैं वे विनाशक हैं और इस सत्य से बचा नहीं जा सकता। चाहे जितना भी आकर्षक एक व्यक्ति क्यों न हो, चाहे हमें वह कितना भी अच्छा लगे, यदि वह एक विनाशकारी झूठी शिक्षा दे रहा हैं, तो वह कलीसिया को नष्ट कर रहा हैं और लोगों के जीवनों को। विलियम बार्क्ले इसे सुव्यक्त करता है:

"एक झूठा शिक्षक एक ऐसा मनुष्य है जो विश्वास करता हैं अपनी इच्छानुसार इसकी अपेक्षा कि परमेश्वर के सत्य को ग्रहण करे जिस पर उसे विश्वास करना अवश्य हैं।

पतरस के लोगों के मामले में जो हो रहा था वह यह था कि कुछ मनुष्य जो भविष्यवक्ता होने का दावा करते थे, वे छिप छिपकर मनुष्यों को बहका रहे थे, उन बातों पर विश्वास करने के लिए जिन के सत्य होने की इच्छा वे करते थे उन बातों की अपेक्षा जिनको सत्य के रूप में परमेश्वर ने प्रगट किया था। उन्होंने स्वयं को मसीहियत के विरोधियों के रूप में नहीं रखा। इसके विपरीत उन्होंने स्वयं को "मसीही विचारधारा के सर्वश्रेष्ठ फलों के रूप में रखा। गुप्त रूप से, अचेतना से, बिना दिखाई दिए, इतने धीरे से और इतनी चालाकी से कि लोगों को अहसास तक न हो, लोग प्रलोभित किए जा रहे थे परमेश्वर के सत्य से दूर मनुष्यों की व्यक्तिगत विचार धारा के लिए, क्योंकि यही तो झूठी शिक्षा है" (याकूब और पतरस की पत्रियां। "द डेली स्टडी बाईबिल" पृ. 374)।

अ) सबसे दुखद झूठी शिक्षा हैं प्रभु का इंकार करना जिसने हमें खरीदा हैं। यीशु मसीह ने हमें खरीदा हैं, और उसने हमें खरीदने के लिए सर्वोच्च मूल्य चुकाया हैं। पाप और मृत्यु से बाहर हमें खरीदने के लिए उसने सब कुछ दिया जो वह हैं और जो उसके पास हैं - यहां तक कि उसका प्राण तक। हम अपने जीवनों के लिए उसके कर्जदार हैं; सब बातों के लिए हम उसके कर्जदार हैं। चित्र एक दास का है: हम अपनी बुद्धि, हृदय, कर्त्तव्य और सेवा के लिए मसीह के कर्जदार हैं; सब बातों के लिए हम उसके कर्जदार हैं। इसलिए उसका इंकार करना हमारे प्रभु और स्वामी का इंकार करना हैं। और हम जानते हैं कि क्या होता हैं उस दास के साथ जो अपने प्रभु और स्वामी का इंकार करता है: शीघ्र विनाश। चाहे आप जो भी हों, कितने ही उच्च पद पर हों या कितने प्रभावशाली आप हों, यदि आप अपने स्वामी का इंकार करते हैं, तो आप स्वयं पर शीघ्र विनाश ले आएंगे। मसीह का इंकार करने का क्या अर्थ हैं?

  • इसका अर्थ हैं इंकार करना कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है: कि वह स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर मानव (परमेश्वर मानव) रूप में आया मनुष्य के लिए परमेश्वर के महान प्रेम को प्रगट करने के लिए।

  • इसका अर्थ हैं इंकार करना कि यीशु मसीह जगत का उध्दारकर्त्ता है: कि उसने एक सिध्द और निष्पाप जीवन जिया और मनुष्य के लिए सिध्द धार्मिकता को सुरक्षित किया।

  • इसका अर्थ है इंकार करना कि यीशु मसीह मनुष्य के लिए मरा: कि उसने मनुष्य के पाप को अपने ऊपर लिया और दण्ड, दोषी ठहराए जाने और न्याय को मनुष्य के लिए सहा।

  • इसका अर्थ हैं इंकार करना कि यीशु मसीह मुर्दों में से जी उठा और मनुष्य के लिए मृत्यु पर जय पाई।

  • इसका अर्थ हैं इंकार करना कि यीशु मसीह परमेश्वर के दहिने हाथ पर जा बैठा हैं विश्व की सब आराधना, महिमा, आदर, और प्रशंसा पाने के लिए।

सूची आगे और आगे जा सकती थी उस सब को सम्मिलित करने के लिए जो पवित्रशास्त्र मसीह के विषय में सिखाता हैं। मसीह के विषय में पवित्रशास्त्र की किसी भी शिक्षा का इंकार करना मसीह का इंकार करना है। यही बिन्दु पवित्रशास्त्र बना रहा है: आप को पवित्रशास्त्र पर अवश्य ध्यान देना हैं...

स्मरण रखें: झूठे शिक्षक कलीसिया में हैं। वे प्रचारक और शिक्षक हैं जो मसीह का अंगीकार करते हैं और कहते हैं कि वे मसीह के अनुयायी हैं और उसकी कलीसिया का निर्माण कर रहे हैं। परन्तु उनका प्रचार और शिक्षण उसका पूर्णतः इंकार हैं, और यह कलीसिया को नष्ट कर रहा हैं।

"पर जो कोई मनुष्यों के सामने मेरा इंकार करेगा उस से मैं भी अपने स्वर्गीय पिता के सामने इंकार करूंगा" (मत्ती 10:33)।

"जो कोई इस व्यभिचारी और पापी जाति के बीच मुझ से और मेरी बातों से लजाएगा, मनुष्य का पुत्र भी जब वह पवित्र दूतों के साथ अपने पिता की महिमा सहित आएगा, तब उस से भी लजाएगा" (मर. 8:38)।

"झूठा कौन है? केवल वह, जो यीशु के मसीह होने से इंकार करता हैं; और मसीह का विरोधी वही हैं, जो पिता और पुत्र का इंकार करता हैं" (1 यूह 2:22)।

ब) झूठे शिक्षक तुरन्त नष्ट किए जाएंगे। ध्यान दें: वे स्वयं पर विनाश लाते हैं। वे स्वयं के कृत्यों के लिए उत्तरदायी हैं। उन्हें झूठी शिक्षा देने की आवश्यकता नहीं हैं; उसे सिखाने का वे चुनाव करते हैं। वे सत्य की शिक्षा (पवित्रशास्त्र) दे सकते थे, परन्तु वे जानबूझकर चुनाव करते हैं उसके विपरीत सिखाने का जो परमेश्वर ने कहा हैं। इसलिए वे स्वयं पर शीघ्र विनाश लाते हैं। शीघ्र की धारणा निश्चित और शीघ्र दोनों हैं। जब न्याय आता हैं, तब इस विषय पर कोई चर्चा नहीं होगी - कोई प्रश्न, कोई ढीलापन, कोई दया, कोई प्रेम न होगा। शुध्द न्याय होगा, ठीक वही जिन के योग्य वे हैं - न अधिक, न कम - और न्याय शीघ्र, तुरन्त दंड आज्ञा और विनाश।

  • "विनाश" (अपोलीयन) का अर्थ हैं अपना स्वास्थ्य खोना, नष्ट हो जाना, बर्बाद हो जाना, मर जाना, नाश किए जाना नरक में जाना।

आप को स्वयं के साथ ऐसा कभी भी होने देना नहीं चाहिए। आप को कभी भी मसीह से विमुख होकर विनाशकारी झूठी शिक्षाओं का प्रचार करना आरम्भ नहीं करना हैं। आप को कभी भी प्रभु का और मनुष्य के लिए उसकी मृत्यु का इंकार नहीं करना हैं।

"जो पुत्र पर विश्वास करता हैं उसके पास अनन्त जीवन है: और जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता वह जीवन को नहीं देखेगा; परन्तु परमेश्वर का क्रोध उस पर बना रहता हैं" (यूह 3:36)।

"तो सोच लो कि वह कितने और भी भारी दंड के योग्य ठहरेगा, जिसने परमेश्वर के पुत्र को पांवों से रौंदा, और वाचा के लोहू को जिसके व्दारा वह पवित्र ठहराया गया था अपवित्र जाना हैं, और अनुग्रह की आत्मा का अपमान किया" (इब्रा 10:29)।


  1. आप को एक अन्य यीशु, एक यीशु जो पवित्रशास्त्र और सच्चे सेवकों व्दारा प्रचारित यीशु से भिन्न हैं, उसका प्रचार नहीं करना हैं।

"यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुमने पहिले न माना था... क्योंकि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, और छल से काम करनेवाले, और मसीह के प्रेरितों का रूप धरनेवाले हैं। और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता हैं। सो यदि उसके सेवक भी धर्म के सेवकों का सा रूप धरें, तो कुछ बड़ी बात नहीं परन्तु उनका अन्त उनके कामों के अनुसार होगा" (2 कुरि 11:4, 13-15)।

विचार

एक सेवक के रूप में, आप को एक अन्य यीशु का प्रचार करने से डरना हैं। यह सदा एक खतरा हैं जो सेवक के सामने हैं। उपरोक्त पाठ में पांच महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान दें।

अ)   झूठे सेवक एक अन्य यीशु का प्रचार करते हैं। यह एक अन्य ख्रीष्ट (मसीहा) नहीं हैं जिसका प्रचार वे करते हैं, पर एक अन्य यीशु हैं। अर्थात्, वे नहीं जानते कि बढ़ई यीशु कौन था और परमेश्वर का पुत्र यीशु कौन हैं। वे यीशु की मानवता के विषय में उलझन में हैं। वे शिक्षा दे रहें हैं कि...

  • यीशु केवल एक अच्छा मनुष्य था जिसने जीवन बिताया जैसे कि मनुष्यों को जीवन बिताना चाहिए।

  • यीशु केवल एक महान गुरू था जिसने मनुष्यों को सिखाया कि कैसे जिए।

  • यीशु केवल एक अद्भुत शहीद था जिसने मनुष्यों को दिखाया कि उन्हें कैसे मरना चाहिए।

वे यीशु की मानवता पर बल देते हैं और उसके ईश्वरत्व का इंकार या अनदेखा करते हैं।

ध्यान दें कि पवित्रशास्त्र क्या कहता है: मनुष्यों को परमेश्वर के आत्मा से भिन्न अन्य आत्मा मिल सकता हैं, और वे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार से भिन्न एक अन्य सुसमाचार ग्रहण कर सकते हैं (2 कुरि. 11:4)। अन्य आत्माए और सुसमाचार हैं जो मनुष्यों की निष्ठा चाहते हैं; इसलिए, आप और कलीसिया को किसी अन्य यीशु के प्रचार के विरूध्द सतर्क रहना हैं।

ब)   झूठे सेवक मसीह के सेवकों का रूप धारण करते हैं, परन्तु वे छल से काम करने वाले हैं।

  • वे धार्मिक कार्यकर्ता हैं, कार्यकर्ता जो धर्म में सेवा करते हैं।

  • वे झूठे सेवक हैं: वे मसीह के सेवक होने का दावा करते हैं, परन्तु वे हैं नहीं।

  • वे स्वयं का रूप बदलते हैं (मेटा - शिमैटी - जोमेनोई) मसीह के सेवकों के रूप में। इस शब्द का अर्थ हैं, स्वयं के बाहरी रूप को बदलना। वे "चोगा - धारी सज्जनों" के रूप में होते हैं, परन्तु चोगा छोड़ वे और कुछ नहीं हैं (ए.टी. रॉबर्टसन बर्ड पिक्चर्स इन न्यू टेस्टामेन्ट, वौल. 4 पृ. 259)। वे झूठे सेवक हैं।

  • वे धार्मिक कार्यकर्ता हैं जो छल से लोगों को मसीह से दूर करते हैं:

  • झूठे विश्वासों और शिक्षा में।

  • नए विचारों और पदों में।

  • संस्कार और कर्मकाण्ड में।

  • संस्थाओं और कार्यक्रमों में।

  • मसीह की अपेक्षा किसी व्यक्ति या सेवक पर ध्यान केंद्रित करने में।

स)    झूठे सेवक शैतान के समान ही भेष बदलते हैं - ज्योंति के सेवकों के रूप में। शैतान बहुधा ज्योंति के एक दूत या संदेशवाहक के रूप में दिखाई देता हैं, विशेषकर औद्योगिक समाजों में। उसकी स्थिति सदा प्रस्तुत की जाती हैं सत्य के रूप में, बुध्दि, ज्ञान और प्रकाशमानहोने के पथ के रूप में। उसके मार्ग को सदा प्रस्तुत किया जाता हैं उस मार्ग के रूप में जिस पर चलना चाहिए, उस मार्ग के रूप में जो...

  • प्रगतिशील हैं

  • विकास करता हैं

  • आश्वासन देता हैं

  • पूरा करता हैं

  • शिक्षित बनाता हैं

  • संतुष्ट करता हैं

  • अच्छा दिखता हैं

  • अच्छा स्वाद रखता हैं

  • अच्छा लगता हैं

शैतान कभी भी स्वयं को शैतान के रूप में प्रस्तुत नहीं करता; और न पाप को वह पाप के रूप मे प्रस्तुत करता हैं। शैतान सदा स्वयं को सर्वोच्च ज्ञानी के रूप में प्रस्तुत करता हैं जो जानता हैं कि मनुष्य के लिए सर्वोत्तम क्या हैं और जो वास्तविक आनन्द, मनोरंजन, और परिपूर्णता मनुष्य के लिए प्रदान करेगा। जब शैतान अपने मार्ग को मनुष्यों को प्रस्तुत करता हैं तो यह आकर्षित करता, अच्छा लगता और खींचता हैं मनुष्य को संसार के मार्ग की चाह करने के लिए। शैतान का मार्ग सदा ज्योंति का मार्ग लगता हैं, अर्थात्, बुद्धिमानी का या आनन्द का।

ड)    झूठे सेवक शैतान के हैं: धार्मिकता के सेवकों के भेष में। क्योंकि शैतान स्वयं को ज्योंति के एक दूत या संदेशवाह के भेष में रखता हैं, वैसे ही उसके सेवक भी करते हैं। वे धार्मिकता के सेवकों जैसे दिखते हैं, और वे प्रचार करते और शिक्षा देते हैं कि एक मनुष्य उध्दार पाता हैं धार्मिकता व्दारा, एक धार्मिकता जो हैं...

  • नैतिकता

  • भलाई

  • न्याय

  • शिक्षण

  • विकास

  • सेवकाई

  • दान

  • सेवा

  • सहायता

वे यीशु के जीवन और शिक्षाओं पर बल देते हैं, जीवन के सब अच्छे गुणों पर - सब गुण जो लोगों के चरित्र में होना चाहिए। वे लोगों से यीशु के जीवन की नकल करने और उनके मनों को जीवन के इन अच्छे गुणों पर लगाने के लिए कहते हैं, और यदि वे ऐसा करें तो परमेश्वर उन्हें ग्रहण करेगा। तथापि, वे एक जानलेवा गलती करते हैं: वे अनदेखा करते और इंकार करते हैं...

  • यीशु मसीह की धार्मिकता का जिसे उसने मनुष्य के लिए सुरक्षित किया एक आदर्श, सिध्द, निष्पाप जीवन बिताने के व्दारा।

  • यीशु मसीह की मृत्यु का जिसे उसे मरना था जिससे कि वह मनुष्य के लिए पाप के न्याय, दोषी ठहराएजाने, और दण्ड को उठा सकें।

  • यीशु मसीह के पुनरूत्थान का जिसका उसे अनुभव करना था जिससे कि मनुष्य के लिए मृत्यु पर जय पाए और एक नया जीवन प्रदान करें।

पवित्रशास्त्र निश्चित रूप से सिखाता हैं कि यीशु मसीह से अलग किसी भी व्यक्ति को परमेश्वर ग्रहण नहीं करता - चाहें कितना नैतिक या भला वह हो। क्योंकि यीशु मसीह ने इतना बड़ा मूल्य चुकाया - हमारे पापों के लिए मरने का सर्वोच्च मूल्य - परमेश्वर यीशु मसीह से सर्वोच्च प्रेम करता हैं। इसलिए, परमेश्वर केवल उसी व्यक्ति को ग्रहण करेगा जो उसके पुत्र का आदर करता हैं। परमेश्वर के ग्रहणयोग्य होने का कोई अन्य मार्ग नहीं हैं। नैतिकता और भलाई का प्रचार तक एक व्यक्ति को ग्रहण करने के लिए परमेश्वर को नहीं उसकाएगा। परमेश्वर चाहता हैं कि लोग नैतिक और अच्छा जीवन जिएं, परन्तु जो प्रथम बात वह चाहता हैं, वह यह हैं कि मनुष्य उसके पुत्र, यीशु मसीह से प्रेम करे और उसकी उपासना करे। और परमेश्वर के ग्रहणयोग्य होने के लिए, हमें प्रथम बातों को प्रथम करना हैं: हमें उसके पुत्र यीशु मसीह से प्रेम करना हैं। तब हमें आगे बढ़कर सब कुछ देना हैं जो हम हैं और हमारा हैं उसे एक हताश जगत की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, उस जगत की जो मरणासन्न हैं परमेश्वर के साथ बिना किसी संबंध के।

बिन्दु यह हैं: शैतान की रणनीति हैं कि मनुष्यों को मसीह से दूर, सत्य से दूर कर दे। वह सेवकों की अगुवाई करता हैं कि वे प्रचार करें कि सच्ची धार्मिकता क्या हैं, परन्तु वह उन से परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम के सत्य को अनदेखा करवाता हैं जो कि मनुष्यों के पापों के लिए यीशु मसीह की मृत्यु हैं, और परमेश्वर की मांग को: कि मनुष्यों को यीशु मसीह के उदाहरण का अनुकरण करना हैं, जो वे हैं और उनका हैं उस सब को मनुष्यों की अत्यन्त आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दे देना हैं।

शैतान के सेवक धार्मिकता के सेवक हैं, परन्तु वे परमेश्वर की धार्मिकता के सेवक नहीं हैं जो स्वयं यीशु मसीह हैं। वे संपूर्ण जगत के पुलपिटों में हैं, परन्तु वे जगत के धार्मिकता के मार्ग के सेवक हैं। वे सेवक नहीं हैं परमेश्वर की धार्मिकता के जो कि धार्मिकता और मृत्यु और पुनरूत्थान हैं प्रभु यीशु मसीह का।

"और उस की आज्ञा यह हैं कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें और जैसा उसने हमें आज्ञा दी हैं उसी के अनुसार आपस में प्रेम रखें (1 यूह 3:23)।

ई) झूठे शिक्षकों का न्याय उन के कर्मो के अनुसार होगा

"क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे" (मत्ती. 5:20)।

"उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ" (मत्ती 7:22-23)।

"वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा... क्योंकि परमेश्वर किसी का पक्ष नहीं करता" (रोमि 2:6,11)।

"परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हम ने तुम को सुनाया है, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो। जैसा हम पहिले कह चुके हैं, वैसा ही मैं अब फिर कहता हूं, कि उस सुसमाचार को छोड़ जिसे तुमने ग्रहण किया हैं, यदि कोई और सुसमाचार सुनाता हैं, तो श्रापित हो" (गला. 1:8-9)।

सेवक से बाइबल क्या कहती है अध्याय 7 | झूठी शिक्षा के प्रति सेवक का कर्त्तव्य | Bible Teaching Hindi | Christian Doctrine Explained

स) आप और झूठे सिध्दान्त और शिक्षा


  1. आप को शिध्दान्तों के रूप में मनुष्यों की प्रथाओं, विचारों और आज्ञाओं की शिक्षा नहीं देना हैं।

"सो तुमने अपनी रीतों के कारण परमेश्वर का वचन टाल दिया।

  हे कपटियो, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यवाणी ठीक की। कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता हैं। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं" (मत्ती 15:6ब-9)।

="और वे यहूदियों की कथा कहानियों और उन मनुष्यों की आज्ञाओं पर मन न लगाएं जो सत्य से भटक जाते हैं" (तीतु 1:14)।


विचार

मसीह के एक सेवक के रूप में, आपको सिध्दान्तों के रूप में मनुष्यों की प्रथाओं, विचारों और आज्ञाओं की शिक्षा नहीं देना हैं। मसीह कुछ अत्यन्त वास्तविक खतरों के विषय में बताता हैं जिनसे आप को एक सेवक के रूप में बचना हैं।

अ)  आप को प्रथा के लिए परमेश्वर के वचन को अलग नहीं करना हैं। धार्मिक प्रथाओं का वर्णन संस्थागत या व्यग्तिगत के रूप में किया जा सकता हैं।

*   संस्थागत प्रथाएं ऐसी हैं जैसे कि संस्कार, नियम, विधियां, कार्यसूचियां, रूप, सेवाएं, प्रक्रियाएं, संस्थाएं जो भी सम्बध्द व्यक्तियों को क्रम और सुरक्षा दे।

*   व्यक्तिगत प्रथाएं ऐसी हैं जैसे कि कलीसियाई आराधना, संस्कार, प्रार्थनाएं, आदतें, विधियां, और पात्र जिन का उपयोग एक व्यक्ति करता हैं स्वयं को धार्मिक रूप से सुरक्षित रखने के लिए।

मसीह इस तथ्य पर आक्रमण कर रहा था कि कुछ सेवक उनकी प्रथाओं को परमेश्वर के वचन से आगे रखते हैं। कुछ लोग परमेश्वर के वचन की अवहेलना और उपेक्षा करते हुए अपनी प्रथाओं का पालन करते हैं। आप को इस खतरे से स्वयं को बचाना हैं।

"इस प्रकार तुम अपनी रीतियों से, जिन्हें तुम ने ठहराया हैं, परमेश्वर का वचन टाल देते हो, और ऐसे ऐसे बहुत से काम करते हो" (मर 7:13)।

ब)   आप को कपटी नहीं होना है: आप को होंठों से सेवा नहीं करना हैं जब कि आप अपने मन को परमेश्वर से दूर रखते हैं। अत्याधिक लोग धार्मिक धोखे में हैं (तुलना फरीसी और शास्त्री)। वे अध्ययन करते, गवाही देते, चिंता दर्शाते, जरूरतमंदों की सहायता करते, और निमयों का पालन करते हैं। वे संघर्ष करते और लड़ते हैं धार्मिक प्रथाओं को बनाए रखने के लिए, तथापि मसीह कहता हैं कि वे कपटी हैं। क्यों? क्योंकि उन का मन परमेश्वर का नहीं हैं। वे व्यक्तिगत रूप से यीशु को परमेश्वर के पुत्र, मसीहा और जगत के उध्दारकर्त्ता के रूप में ग्रहण करने से इंकार करते हैं। वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर को नहीं जानते, अपने मनों की गहराइयों में नहीं (यूह 14:6)।

एक सेवक के रूप में आप को इस खतरे से बचना हैं। आप को प्रभु के साथ अपने व्यक्तिगत चलन को बनाए रखना हैं।

"और प्रभु ने कहा, ये लोग जो मुंह से मेरा आदर करते हुए समीप आते परन्तु अपना मन मुझ से दूर रखते हैं, और जो केवल मनुष्यों की आज्ञा सुन सुनकर मेरा भय मानते हैं" (यशा 29:13)।

स) खाली मन से आराधना करने से आपको बचना है। मसीह ने सिखाया...

  • कि सच्ची उपासना को "आत्मा और सच्चाई में" करना हैं।

"परमेश्वर एक आत्मा है: और अवश्य हैं कि उसके भजन करनेवाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें" (यूह 4:24)।

  • कि वह व्यक्ति जो मसीह का इंकार या परमेश्वर के वचना का इंकार करता हैं, वह परमेश्वर की सच्ची आराधना नहीं कर सकता।

"यीशु ने उससे कहा, मार्ग, सत्य, और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे व्दारा कोई पिता के पास नहीं जा सकता" (यूह 14:6)।

"सत्य के व्दारा उन को पवित्र कर, तेरा वचन सत्य है" (यूह 17:17)।

  • कि एक व्यक्ति उपासना कर सकता हैं, परन्तु उसकी उपासना खाली, मूल्यहीन, और अग्राह्य हो सकती हैं। मसीह के समय के धर्मवादी अपने होठों से तो धर्म को मान रहे थे, परन्तु परमेश्वर के पुत्र, मसीह का इंकार अपने मनों में कर रहे थे। (व 17-20)।

    "और उसकी आज्ञा यह हैं कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें और जैसा उसने हमें आज्ञा दी हैं उसी के अनुसार आपस में प्रेम रखें" (1 यूह 3:23)।

ड)    परमेश्वर की आज्ञा के रूप में आपको प्रथा नहीं सिखाना हैं। प्रथा मनुष्य का विचार हैं कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं। कुछ प्रथाएं अच्छी हैं; कुछ बुरी हैं। परन्तु अच्छी प्रथाओं को परमेश्वर की आज्ञाओं के रूप में नहीं सिखाना हैं। कुछ प्रथाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं परन्तु वे परमेश्वर के वचन जितनी महत्वपूर्ण नहीं हैं।

"इसलिए हम भी परमेश्वर का धन्यवाद निरन्तर करते हैं, कि जब हमारे व्दारा परमेश्वर के सुसमाचार का वचन तुम्हारे पास पहुंचा, तो तुम ने उसे मनुष्यों का नहीं, परन्तु परमेश्वर का वचन समझकर (और सचमुच यह ऐसा ही हैं) ग्रहण किया: और वह तुम में जो विश्वास रखते हो, प्रभावशाली हैं" (1 थिस्स 2:13)।

"हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया हैं और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिए लाभदायक हैं" (2 तीमु 3:16)।


  1. विभिन्न प्रकार की शिक्षाओं के बहाव में आपकों नहीं बहना हैं। आप को कथाओं, अंधविश्वासों, अनुमानों, विचारों और झूठे सिध्दान्तों का प्रचार नहीं करना हैं जो मनुष्यों के हैं।

"नाना प्रकार के और विभिन्न शिक्षाओं व्दारा न भरमाए जाओं" (इब्रा 13:9)।

"... कितनों को आज्ञा दे कि और प्रकार की शिक्षा न दें। और उन ऐसी कहानियों और अनन्त वंशावलियों पर मन न लगाएं, जिन से विवाद होते हैं; और परमेश्वर के उस प्रबन्ध के अनुसार नहीं, जो विश्वास से संबंध रखता हैं: ऐसा कर" (1 तीमु. 1:3-4)।

"क्योंकि ऐसा समय आएगा, कि लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिए बहुतेरे उपदेशक बटोर लेंगे" (2 तीमु 4:3-4)।

"ताकि हम आगे को बालक न रहें, जो मनुष्यों की ठग विद्या और चतुराई से उनके भ्रम की युक्तियों की, और उपदेश की हर एक बयार से उछाले, और इधर उधर घुमाए जाते हों" (इफि 4:14)।


विचार

मसीह के सेवक के रूप में, आप को विभिन्न प्रकार की शिक्षाओं के बहाव में नहीं बहना हैं। आप को कथाओं, अंधविश्वासों, अनुमानों विचारों और झूठे सिध्दान्तों का प्रचार नहीं करना हैं जो मनुष्यों के हैं। आप को परमेश्वर के वचन का प्रचार करना हैं और केवल परमेश्वर के वचन का।

उपरोक्त 1 तीमु 1:3-4 पर ध्यान दें। "आज्ञा दे" (पारांगेलो) एक प्रबल शब्द हैं। यह एक सैनिक शब्द हैं जिसका अर्थ हैं कि आज्ञाओं को निचली पंक्तियों तक पहुंचाना। मसीह के सेवक, पवित्रशास्त्र आप को तीन नकारात्तमक आज्ञाएं, तीन नकारात्मक आदेश देता हैं। आप के पास आप के आदेश हैं: आप को दो बातें नहीं करना हैं।

अ) आपको परमेश्वर के वचन की शिक्षा के अतिरिक्त कोई अन्य शिक्षा नहीं देना हैं।

  • आप को परमेश्वर के वचन की शिक्षा में जोड़ना नहीं हैं।

  • आप को परमेश्वर के वचन की शिक्षा से कुछ घटाना नहीं हैं।

  • आप को कलीसिया के लिए नई शिक्षा नहीं बनाना हैं।

आप को यह नहीं सोचना हैं कि परमेश्वर के वचन में कुछ त्रुटियां हैं जिनको सुधारने की आवश्यकता हैं। आप को परमेश्वर के वचन में कुछ भी परिवर्तन नहीं करना हैं। इस पवित्रशास्त्र के वचनों में आपको आपकी आज्ञा मिली हैं, आपके आदेश: "कोई अन्य शिक्षा" आप को नहीं देना हैं (1 तीमु 1:3)।

ब) आप को कथाओं (झूठी शिक्षाओं) और मनुष्यों की वंशावलियों पर ध्यान नहीं देना हैं। क्यों? क्योंकि धार्मिक उन्नति की अपेक्षा इससे प्रश्न खड़े होते हैं।

"कथाओं" (म्यूथौइस) शब्द संदर्भित करता है सब प्रकार की झूठी और कल्पित शिक्षा या सिध्दान्त। इसका अर्थ हैं झूठे विचार और मनुष्यों के अनुमान जो परमेश्वर और मसीह और परमेश्वर के वचन की शिक्षाओं के विषय में हैं। मनुष्यों की शिक्षाएं केवल अनुमान, कथाएं, वर्णन, कहानियां, कल्पनाएं और झूठ हैं।

"परन्तु अशुध्द और बूढ़ियों की सी कहानियों से अलग रह; और भक्ति के लिए साधना कर" (1 तीमु 4:7)।

"और अपने कान सत्य से फेरकर कथा कहानियों पर लगाएंगे" (2 तीमु 4:4)।

"और वे यहूदियों की कथा कहानियों और उन मनुष्यों की आज्ञाओं पर मन न लगाएं, जो सत्य से भटक जाते हैं" (तीतु 1:14)।

"क्योंकि जब हमने तुम्हें अपने प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ का और आगमन का समाचार दिया था तो वह चतुराई से गढ़ी हुई कहानियों का अनुकरण नहीं किया था वरन हम ने आप ही उसके प्रताप को देखा था" (2 पत 1:16)।

"वंशावलियां" शब्द उनके संदर्भ में हैं जो एक धर्मी वंश और परम्परा में सांत्वना लेते हैं। यहूदी इस बात के दोषी थे। वे अपने धर्मी पूर्वजों पर बड़ा घमण्ड करते थे, इतना अधिक कि उनको लगता था कि उनके पूर्वजों की धार्मिकता उन में भी आ गई थीं। उनकी जड़ों में जितने अधिक पूर्वज धर्मी थे, उतना ही अधिक सम्मानित और ग्रहणयोग्य वे स्वयं को परमेश्वर और मनुष्यों के आगे समझते थे। वे समझते थे कि जितनी बलवान उनकी जड़ें होंगी उतना ही अधिक मनुष्य और परमेश्वर उन्हें ग्रहण करेंगे और आदर देंगे। "अनन्त वंशावलियों" के संदर्भ पर ध्यान दें। प्रगट हैं कि ये वे लोग हैं जो अत्याधिक समय व्यतीत कर रहे थे विगत धर्मी पूर्वजों के ढांचे बनाने और चर्चा करने में। प्रगट हैं कि यह प्रचलन कलीसिया में भी समा गया था। ऐसे लोग थे...

  • जो मसीह की अपेक्षा पूर्वजों और परम्परा पर बल दे रहे थे।

  • उध्दार के लिए मसीह पर भरोसा करने की अपेक्षा जो धर्मी पूर्वजों पर भरोसा कर रहे थे।

  • जो कलीसिया की धार्मिकता का निर्माण करने और उन्नत करने की अपेक्षा वंशावलियों में अधिक समय व्यतीत कर रहे थे।

  • विश्वासियों के बीच धर्मी व्यवहार बढ़ाने की अपेक्षा जो प्रश्नों और सिध्दान्तों पर अधिक ध्यान दे रहे थे।

कुछ लोग उनके धर्मी पूर्वजों में बड़ी सांत्वना पाते हैं। उन्हें ऐसा लगता हैं कि परमेश्वर उनका कभी तिरस्कार नहीं करेगा...

  • उनकी धर्मी पत्नियों, पतियों, बच्चों, माता - पिता के कारण।

  • क्योंकि वे एक परम्परागत कलीसिया के हैं एक धर्मी वंशावली और प्रसिध्दि के साथ।

  • क्योंकि उनका एक धर्मी पासबान या मित्र है जिसके साथ उनके घनिष्ठ संबंध हैं।

"सो मन फिराव के योग्य फल लाओं और अपने अपने मन में यह ने सोचो, कि हमारा पिता इब्राहीम हैं; क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि परमेश्वर इन पत्थरों से इब्राहीम के लिए सन्तान उत्पन्न कर सकता हैं" (लूका 3:8)।

"तब वे उसे भला - बुरा कहकर बोले, तू ही उनका चेला है; हम तो मूसा के चेले हैं" (यूह 9:28)।

मसीह के सेवक के रूप में, आप को मनुष्यों की कथाओं और धर्मी पूर्वजों की शिक्षा नहीं देना हैं। आप को परमेश्वर के वचन की शिक्षा देना हैं और केवल परमेश्वर के वचन की।


  1. आप को खोखली बात और झूठे विज्ञान और झूठे ज्ञान के विरोध से मुड़ना हैं।

"हे तीमुथियुस इस थाती की रखवाली कर और जिस ज्ञान को ज्ञान कहना ही भूल है, उसके अशुध्द बकवाद और विरोध की बातों से परे रह। कितने इस ज्ञान का अंगीकार करके, विश्वास से भटक गए हैं" (1 तीमु 6:20-21)।

विचार

यह अंतिम आज्ञा हैं - सेवक तीमुथियुस को पौलुस के लिखे गए - अंतिम वचन हैं। अंतिम वचन होने के कारण, आज्ञा अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।

आप, मसीह के सेवकों को, खोखली बात और झूठे विज्ञान और झूठे ज्ञान के विरोध से विमुख होना हैं। आप को दो बातें करने की आज्ञा दी गई हैं।

प्रथम, आप के भरोसे जो सौंपा गया हैं, उसकी रखवाली आप को करना हैं। आप को क्या सौंपा गया हैं? आपके हाथों में क्या भरोसा सौंपा गया हैं?

परमेश्वर के सेवक को महान भरोसा जो सौंपा गया हैं वह हैं...

  • विश्वास, महान मसीही विश्वास।

  • परमेश्वर का महिमामय सत्य, वह सत्य जो उसने अपने वचन में और प्रभु यीशु मसीह में मनुष्यों पर प्रगट किया हैं।

  • परमेश्वर का अद्भुत सुसमाचार, वह सुसमाचार जो प्रगट होता हैं मनुष्यों का उध्दार करने के लिए पृथ्वी पर परमेश्वर के पुत्र को भेजने में।

"भरोसे" शब्द का चित्र यह हैं: यह एक "जमा" हैं, एक विश्वासयोग्य और परिश्रमी बैंकर का चित्र जो उसकी देखभाल में "जमा" राशि की देखभाल करता हैं। आप, परमेश्वर के सेवक, को परमेश्वर के विश्वास और सत्य की रक्षा, रखवाली, देख - भाल, और चिंता करना हैं - उसके पुत्र, उसके वचन, उसके प्रकाशन, और उसके सुसमाचार के विश्वास और सत्य की। आप को यह कभी नहीं भूलना हैं कि परमेश्वर ने जमा किया हैं - वास्तव में रखा हैं - परमेश्वर के सत्य को आपके हाथों में। आपके भरोसे दिया गया हैं परमेश्वर का सुसमाचार, उसके पुत्र प्रभु यीशु मसीह का महिमामय संदेश।

विलियम बार्क्ले की टिप्पणी उल्लेख करने के योग्य है:

"यदि हमारे समय में मसीही विश्वास टेढ़ा - मेढ़ा और विकृत किया जाए, तो केवल हमारी हानि नहीं होगी; आनेवाली पीढ़ियों से कुछ अत्याधिक बहुमूल्य चुरा लिया जाएगा। हम केवल कब्जेदार ही नहीं हैं, हमारे भरोसे विश्वास भी रखा गया हैं। जिसे हमने प्राप्त किया हैं, उसे हमें देना भी हैं" (तीमुथियुस, तीतुस, फिलेमोन की पत्रियां, पृ 161)।

"पर जैसा परमेश्वर ने हमें योग्य ठहराकर सुसमाचार सौंपा, हम वैसा ही वर्णन करते हैं; और इस में मनुष्यों को नहीं, परन्तु परमेश्वर को, जो हमारे मनों को जांचता है प्रसन्न करते हैं" (1 थिस्स 2:4)।

"इसलिए हम भी परमेश्वर का धन्यवाद निरन्तर करते हैं; कि जब हमारे व्दारा परमेश्वर के सुसमाचार का वचन तुम्हारे पास पहुंचा, तो तुमने उसे मनुष्यों का नहीं, परन्तु परमेश्वर का वचन समझकर (और सचमुच यह ऐसा ही हैं) ग्रहण किया; और वह तुम में जो विश्वास रखते हो, प्रभावशाली हैं" (1 थिस्स 2:13)।

"यही परमधन्य परमेश्वर की महिमा के उस सुसमाचार के अनुसार हैं, जो मुझे सौंपा गया हैं। और मैं अपने प्रभु यीशु का, जिसने मुझे सामर्थ दी हैं, धन्यवाद करता हूं; कि उसने मुझे विश्वासयोग्य समझकर अपनी सेवा के लिए ठहराया" (1 तीमु 1:11-12)।

"पर ठीक समय पर अपने वचन को उस प्रचार के व्दारा प्रगट किया, जो हमारे उद्धारकर्त्ता परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार मुझे सौंपा गया" (तीतु 1:3)।

व्दितीय, आपको झूठी शिक्षा से विमुख होना हैं। झूठी शिक्षा का वर्णन सजीव हैं।

अ) झूठी शिक्षा का वर्णन किया गया हैं अशुध्द बकवाद के रूप में।

  • "अशुध्द" (बेबेलौस) शब्द का अर्थ हैं साधारण, अनादर पूर्ण, और अधर्मी बातें।

  • "व्यर्थ" का अर्थ हैं खाली और अर्थहीन।

  • "बकवाद" शब्द का अर्थ हैं" खोखली आवाजें"

इसलिए, आदेश हैं कि सब अर्थहीन बातों से विमुख होना हैं। साधारण, अनादरपूर्ण, अधर्मी, और व्यर्थ बकवाद से कुछ भी संबंध न रखें - चाहे जो भी व्यक्ति बोल रहा हो। अवश्य ही इसमें सम्मिलित है:

  • सत्य होने के झूठे दावे

  • धर्म के नए विचार

  • आलोचना

  • सब प्रकार की झूठी शिक्षा

  • श्राप देना

  • अश्लील मजाक

  • सांसारिक दर्शन

  • गप - शप

  • अश्लील बातें

ब)   झूठी शिक्षा का वर्णन "विज्ञान" के रूप में किया गया हैं, परन्तु ऐसा "विज्ञान जो झूठा हैं।"

  • "विज्ञान" (ग्रोसियोस) शब्द का अर्थ हैं ज्ञान, संसार का झूठा ज्ञान, सत्य की उसकी मानवीय खोज में।

  • "विरोध" (एंटीथीसिस) का अर्थ हैं पूर्वपक्ष विरोध, अर्थात्, किसी पूर्वपक्ष, सत्य या तथ्य के विरोध में खड़े होना। जिस बात को दोषी ठहरायो जा रहा हैं वह हैं मनुष्यों का झूठा ज्ञान, वे बातें जो मनुष्य सिखाते हैं जो मसीह में और परमेश्वर के वचन में परमेश्वर के महिमामय प्रकाशन के विपरीत हैं। परमेश्वर का सेवक - यथार्थ में, कोई भी व्यक्ति - एक मूर्ख हैं यदि वह सत्य और तथ्य के विरोध में खड़ा होता हैं, चाहे परमेश्वर का या सच्चे विज्ञान का सत्य हो।

आदेश प्रबल हैं, अत्यन्त प्रबल: मनुष्यों और उनकी शिक्षाओं से विमुख हो जाओं जब वे मसीह और परमेश्वर के वचन की शिक्षाओं के विरोध में खड़े होते हैं, झूठे विज्ञान या मनुष्यों के झूठे ज्ञान से कोई संबंध न रखो। मनुष्य और उनकी झूठी शिक्षाएं, दर्शन, मनोविज्ञान, शिक्षण, सामाजिक विज्ञान, धर्म-विज्ञान या ज्ञान के किसी भी क्षेत्र के विषय में हो सकती हैं - परन्तु उन से विमुख हो जाओ यदि वे झूठी हैं। आप कैसे बता सकते हैं कि वह शिक्षा झूठी है? परमेश्वर के वचन, मसीह के प्रकाशन और लेख और परमेश्वर के सत्य के व्दारा। यदि वह विज्ञान या ज्ञान परमेश्वर के वचन के विरोध में खड़ा हैं, तो उस से विमुख हो जाओ। वह झूठा हैं, और भविष्य में जांच उसे झूठा प्रमाणित करेगी यदि जांच बुद्धिमानी और सच्चाई से की जाती हैं।

ध्यान दें कि कुछ लोग झूठी शिक्षा में आ गए थे। स्थिति की गम्भीरता इस में देखी जाती हैं: तीमुथियुस की पत्री के ये अंतिम वचन हैं। सबसे अंतिम बात जो पौलुस तीमुथियुस से कहता हैं, वह हैं झूठी शिक्षा से परे रहने की। क्या चेतावनी हैं आप के लिए और परमेश्वर के सब सेवकों के लिए!

"चट्टान पर के वे हैं, कि जब सुनते हैं, तो आनन्द से वचन को ग्रहण तो करते हैं, परन्तु जड़ न पकड़ने से वे थोड़ी देर तक विश्वास रखते हैं, और परीक्षा के समय बहक जाते हैं" (लूका 8:13)।

"और यीशु ने उस से कहा; जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता हैं, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं" (लूका 9:62)।

"पर मुझे तेरे विरूध्द यह कहना हैं कि तूने अपना पहिला सा प्रेम छोड़ दिया हैं" (प्रका 2:4)।


  1. आप को धर्म और राष्ट्र की झूठी शिक्षा से बचना हैं।

"और उसने उन्हें चिताया, कि देखो, फरीसियों के खमीर (झूठे धर्मवालों की शिक्षा) और हेरोदेस के खमीर (राष्ट्र की शिक्षा) से चौकस रहो" (मर 8:15)।

विचार

यीशु का क्या अर्थ था फरीसियों और हेरोदेस या संसार के अगुवों के खमीर से (मत्ती हेरोदेस की अपेक्षा सदूकियों का संदर्भ देता हैं। अधिकांश हेरोदी, हेरोदेसके अनुयायी सदूकी थे। देखें मत्ती 22:16; प्रेरि 23:8)।

अ)      फरीसियों का खमीर (धर्मवादियों) उनकी शिक्षा (मत्ती 16:12) थी और उनकी कपट, छल, और नाटक (लूका 12:1)। फरीसी जिनको स्पर्श करते थे उन सब में उफान लाते और खट्टा कर देते थे। फरीसी एक व्यक्तिगत परमेश्वर में विश्वास करते थे और परमेश्वर के वचन के रूप में पवित्रशास्त्र में, परन्तु वे परमेश्वर के वचन में जोड़ते थे। उन्होंने नियमों, विधियों, संस्कारों और अनुष्ठानों को जोड़ दिया जिस से कि मनुष्य के आचरण पर व्यर्थ प्रतिबन्ध लगे। इस से तीन बड़ी गलतिया हुई।

  • इस से लोग यह विचार करने लगे कि उनका अच्छा आचरण और उनके धार्मिक संस्कार और अनुष्ठान उन्हें परमेश्वर के ग्रहणयोग्य बनाते थे। धार्मिकता के लिए भले कामों के एक धर्म पर भरोसा रखा जा रहा था।

  • इस से सामाजिक आदरनीयता का धर्म, एक बाहरी धर्म बना। यदि एक व्यक्ति सामाजिक रूप से आदरनीय था और सब ठीक बातें करता था, तब उसे परमेश्वर के ग्रहणयोग्य समझा जाता था।

  • इससे स्वधार्मिकता का एक वातावरण बना। यदि एक व्यक्ति नियमों और विधियों का पालन करता तो स्वाभाविक रूप से वह स्वयं को धर्मी समझता और कभी - कभी इसे प्रदर्शित भी करता था। स्वयं पर एक निर्भरता थी, उचित नियमों के पालन करने पर और इस के व्दारा धर्मी होने पर।

ब)    सदूकी या हेरोदी उनके समय के उदारवादी थे। उनका खमीर या झूठी शिक्षा दो प्रकार की थी।

  • उन्होंने परमेश्वर के वचन से घटा दिया, पुराने नियम की प्रथम पांच पुस्तकों के अतिरिक्त सब पवित्रशास्त्र से इंकार करते हुए।

  • वे उदारवादी विचार के और तर्कवादी थे जो कि धर्म निरपेक्ष और भौतिकवादी थे। इसलिए यहूदी संस्कृति को हटाकर रोमी और यूनानी संस्कृति स्थापित करने में वे रोमियों के साथ सहयोग देने के लिए तैयार थे। इसलिए रोम ने उन के अगुवों को प्रशासनिक पदों (सनहेड्रिन) पर रखा और उन्हें धन दिया। उनकी सांसारिकता, धर्मनिरपेक्ष दार्शनिकता, और उदारवादी ईश्वरज्ञान किसी भी मनुष्य के लिए सदा एक खतरा थी (देखें प्रचारक की रूप रेखा और उपदेश बाईबिल, लेख मत्ती 16:1-12)।

यीशु ने जो दोहरी चेतावनी दी उस पर ध्यान दें: "चिताया", "चौकस रहो"। धर्मवादियों और सांसारिक अगुवों दोनों के खमीर से बचने के सर्वोच्च महत्व पर बल इसके व्दारा दिया गया हैं। मसीह के सेवक, आप के लिए आदेश हैं दो।

अ)    आप को धर्म और राष्ट्र की झूठी शिक्षा से चौकस रहना, बचना हैं। "चौकस रहो" शब्दों का अर्थ हैं देखों, परखो, और जानों निकटता से देखने और अनुभव करने के व्दारा। "चौकस रहने" के लिए आप को दो बातों की आवश्यकता है: सक्रिय विचार और परखने की बुध्दि। जिस बात से चौकस रहना हैं उसे सक्रियता से देखना, पूर्ण विचार करना और परखना हैं। इस पाठ में, आदेश एक "वर्तमान आदेश" हैं। चेले को खमीर से "चौकस रहना" हैं इसी समय से आरम्भ करते हुए, और उसे सदा चौकस रहना, झूठी शिक्षा को सदा देखते और परखते रहना हैं।

ब)   आप को धर्म और राष्ट्र की झूठी शिक्षा से सतर्क रहना हैं। "सतर्क" शब्द का अर्थ है देखना और समझना जिस से कि किसी बात के लिए चौकस हों; अपनी बुध्दि को एक पात्र पर लगाना, विचार करना और उस पर सतर्कता की आंख लगाए रखना; किसी बात से सुरक्षित रहना और रक्षा करना। और आदेश वर्तमान आज्ञा हैं। आपको तुरन्त आरम्भकरना हैं सतर्कता को और रखवाली करते रहना हैं, सदा धर्म और राष्ट्र में झूठी शिक्षा के खतरे पर आंख लगाए रखना हैं।

  1. आप को मनुष्यों के खोखले विचारों और विमर्शो - प्रश्नजनक बातों - का प्रचार नहीं करना हैं - परन्तु प्रेम और विश्वास और एक शुध्द अंत: करण की आवश्यकता का।

"आज्ञा का सारांश यह हैं, कि शुध्द मन और अच्छे विवेक, और कपटरहित विश्वास से प्रेम उत्पन्न हो। इन को छोड़कर कितने लोग फिर कर बकवाद की ओर भटक गए हैं। और व्यवस्थापक तो होना चाहते हैं, पर जो बातें कहते और जिनकों दृढ़ता से बोलते हैं, उनको समझते भी नहीं" (1 तीमु 1:5-7)।


विचार

मसीह के सेवक के रूप में आपको मनुष्यों के खोखले विचारों और विमर्शो - प्रश्नजनक बातों - का प्रचार नहीं करना हैं - परन्तु प्रेम और विश्वास और एक शुध्द अंत: करण की आवश्यकता का। उपरोक्त पवित्रशास्त्र पर ध्यान दें। मसीह के सेवक से दो महत्वपूर्ण बातें कही जा रही हैं।

अ) आपको खोखले विचारों और विमर्शो को प्रेम से ऊपर नहीं रखना हैं। परमेश्वर की आज्ञा का अंत हैं प्रेम (अगापे, जैसा प्रेम परमेश्वर का हैं)। इसलिए, आप को और अन्य सब सेवकों को प्रेम में विकसित होने और प्रेम की शिक्षा देने पर ध्यान लगाना हैं। विश्वासियों की महान बुलाहट हैं...

  • परमेश्वर के प्रेम को जानना और परमेश्वर से प्रेम करना।

  • प्रभु में भाईयों के रूप में परस्पर प्रेम करना।

  • जगत के खोए हुओं से इतना प्रेम करना कि उन तक सुसमाचार ले जाने के लिए हम चलाए जाएं।

परन्तु ध्यान दें कि ऐसा प्रेम आता कहां से हैं। इसका स्त्रोत मनुष्यों में नहीं पाया जाता; मनुष्य के हृदय से यह बाहर नहीं निकलता। वह प्रेम जिसे हमें जानना और रखना हैं तीन स्त्रोतों से आता हैं।

  • प्रेम एक शुध्द हृदय से आता है: एक हृदय जो परमेश्वर व्दारा क्षमा किया गया हैं और सब अशुध्दताओं से शुध्द किया गया है; एक हृदय जो स्वार्थ, सांसारिकता, जलन, लालच और अनैतिकता के भार से नहीं दबा हैं।

  • प्रेम एक अच्छे विवेक से आता है: एक विवेक जो जानता हैं कि उसके और परमेश्वर के बीच में, उसके और मनुष्यों के बीच कुछ नहीं हैं; एक विवेक जो जानता हैं कि वह परमेश्वर के वचन के प्रति सच्चा रहा हैं और कोई गलत शिक्षा नहीं दी हैं।

  • प्रेम जो असली या सच्चे विश्वास से आता हैं: एक विश्वास जो परमेश्वर पर और उसके वचन पर जमा हैं, जो परमेश्वर के वचन को थामे रहता हैं और भरोसा रखता हैं और परमेश्वर के वचन की शिक्षा देता हैं और केवल परमेश्वर के वचन की।

परमेश्वर की आज्ञा का अंत - उस सब का जो मनुष्य से परमेश्वर ने कभी भी कहा - प्रेम हैं। इसलिए, एक सेवक के रूप में, आपको अपने जीवन को समर्पित करना हैं परमेश्वर के प्रेम के विषय में अधिकाधिक सीखने और परमेश्वर के प्रेम की अधिकाधिक शिक्षा देने के लिए परन्तु ऐसा करने के लिए आप को पूर्णतः समर्पित होना है...

  • परमेश्वर के सामने एक शुध्द हृदय रखने के लिए।

  • परमेश्वर के सामने एक अच्छा (स्पष्ट) विवेक रखने के लिए।

  • विश्वास का पालन करने के लिए, अर्थात्, परमेश्वर के वचन के सिध्दान्तों और शिक्षाओं का।

तथापि, यह कुछ के साथ सत्य नहीं हैं - झूठे शिक्षकों के साथ नहीं हैं। ध्यान दें कि ठीक - ठीक पवित्रशास्त्र क्या कहता हैं: कुछ बहक गए हैं और खोखले विमर्शो की ओर चले गए हैं। "व्यर्थ बकवाद" की ध्वनि ठीक वैसे ही हैं जैसे कि बकवाद होती हैं - व्यर्थ, खोखली बकवाद। इस शब्द का अर्थ हैं खोखले वाद - विवाद, चर्चाए, और अटकलें - परमेश्वर, मसीह और परमेश्वर के वचन के विषय में मनुष्यों की अटकलें। ध्यान दें कि झूठे शिक्षक परमेश्वर के वचन की शिक्षाओं से बहक कर इन व्यर्थ बकवादों की ओर मुड़ जाते हैं। परन्तु ध्यान दें: आप, परमेश्वर के सच्चे सेवक, मसीह व्दारा बुलाए गए हो परमेश्वर के प्रेम का प्रचार करने और शिक्षा देने के लिए, जो कि प्रदर्शित किया गया उसके पुत्र की मृत्यु में और उस के वचन में, पवित्रशास्त्र में घोषित किया गया।

"परन्तु आत्मा स्पष्टता से कहता हैं, कि आनेवाले समयों में कितने लोग भरमानेवाली आत्माओं, और दुष्टात्माओं की शिक्षाओं पर मन लगाकर विश्वास से बहक जाएंगे। यह उन झूठे मनुष्यों के कपट के कारण होगा, जिनका विवेक मानो जलते हुए लोहे से दागा गया हैं" (1 तीमु 4:1-2)।

"क्योंकि बहुत से लोग निरंकुश, बकवादी और धोखा देनेवाले हैं; विशेष करके खतनावालों में से" (तीतु 1:10)।

"उसके मुख के वचनों का आरम्भ तो मूर्खता हैं; और उसकी बातों का अंत पागलपन हैं" (सभो 10:13)।

ब) सत्य से ऊपर आपको स्वयं की महत्वाकांक्षा और व्यक्तिगत विचार नहीं रखना हैं। चित्र उस मनुष्य का हैं जो महत्वाकांक्षी हैं...

  • मूल शिक्षक या प्रचारक के रूप में मान्यता पाने का।

  • एक रचनात्मक व्यक्ति के रूप में मान्यता पाने का।

  • एक नए विचार या सिध्दान्त के रचेता के रूप में मान्यता पाने का।

  • एक नए आंदोलन के संस्थापक के रूप में मान्यता पाने का।

  • एक नए विचार या सिध्दान्त के लेखक के रूप में मान्यता पाने का।

चित्र उस व्यक्ति का हैं जो शिक्षा के आधुनिकतम फैशन में सटीक बैठने की इतनी इच्छा रखना हैं कि वह सत्य की उपेक्षा करता या उसे अनदेखा करता हैं। अपने साथियों के साथ सटीक बैठने के लिए वह सत्य की उपेक्षा करता हैं। झूठे शिक्षक की महत्वाकांक्षा को सत्य की उसकी समझ को धुंधला करने दिया जाता हैं।

विलियम बार्क्ले इंगित करता हैं कि वह महत्वाकांक्षी झूठा शिक्षक बहुधा...

  • नम्रता की अपेक्षा अहंकार प्रदर्शित करता हैं।

  • सीखने की अपेक्षा सिखाने पर केंद्रित रहता हैं।

  • भोले - भाले लोगों को नीच समझता हैं।

  • उनको अज्ञानी मूर्ख समझता हैं जो उसके निष्कर्षो से सहमत नहीं होते। (तीमुथियुस, तीतुस, और फिलेमोन की पत्रियां. पृ. 37)।

मसीह के एक सेवक के रूप में, आप को स्वयं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और विचारों को सत्य से ऊपर नहीं रखना हैं।

"और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं; क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं" (मत्ती 15:9)।

"यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि तुम पवित्रशास्त्र और परमेश्वर की सामर्थ नहीं जानते; इस कारण भूल में पड़ गए हो" (मत्ती 22:29)।

"यदि कोई और ही प्रकार का उपदेश देता हैं; और खरी बातों को, अर्थात्, हमारे प्रभु यीशु मसीह की बातों को और उस उपदेश को नहीं मानता, जो भक्ति के अनुसार हैं तो वह अभिमानी हो गया, और कुछ नहीं जानता, वरन उसे विवाद और शब्दों पर तर्क करने का रोग लग गया हैं, जिससे डाह, और झगड़े, और निन्दा की बातें, और बुरे संदेह, और उन मनुष्यों में व्यर्थ रगड़े झगड़े उत्पन्न होते हैं; जिनकी बुध्दि बिगड़ गई हैं, और वे सत्य से विहीन हो गए हैं जो समझते हैं कि भक्ति कमाई का व्दार है: ऐसों से स्वयं को अलग कर लें" (1 तीमु 6:3-5)।


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