क्या दशमांश देना जरूरी है बाइबल शिक्षा | Tithe in Bible Hindi

🎬 विषय: क्या दशमांश आज भी देना जरूरी है? | Bible Teaching | Tithe in New Testament


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🔵 प्रारंभ / परिचय

Praise the Lord।

आज हम बाइबल का एक बहुत महत्वपूर्ण और अक्सर विवाद का विषय बनने वाला प्रश्न समझेंगे।

वह प्रश्न है —

क्या दशमांश आज अनिवार्य है?

क्या हर मसीही को अपनी आय का 10% देना ही चाहिए?
अगर कोई नहीं देता तो क्या वह पाप करता है?
क्या दशमांश केवल पुराने नियम की व्यवस्था थी?
या आज भी यह उतना ही आवश्यक है?

बहुत से लोग इस विषय में उलझन में हैं।

कुछ लोग कहते हैं —
“अगर तुम दशमांश नहीं देते तो तुम शापित हो।”

कुछ लोग कहते हैं —
“दशमांश अब खत्म हो चुका है, अब देने की जरूरत नहीं।”

लेकिन आज हम किसी की राय नहीं सुनेंगे।

आज हम केवल बाइबल से उत्तर खोजेंगे।


और मेरा विश्वास है कि आज परमेश्वर का वचन हमें संतुलित सत्य समझाएगा।


🔵1. दशमांश का पहला उल्लेख

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि दशमांश की शुरुआत कहाँ से हुई।

बाइबल में दशमांश का पहला उल्लेख हमें मिलता है
उत्पत्ति 14 अध्याय में।

यहाँ हम पढ़ते हैं कि
अब्राहम ने युद्ध जीतने के बाद
मेल्कीसेदेक नाम के परमेश्वर के याजक को
दशमांश दिया।

महत्वपूर्ण बात क्या है?

उस समय मूसा की व्यवस्था नहीं थी।

कोई कानून नहीं था।
कोई आदेश नहीं था।

फिर भी अब्राहम ने दशमांश दिया।

क्यों?

क्योंकि यह कानून नहीं था… सम्मान था।

यह परमेश्वर के प्रति धन्यवाद था।

अब्राहम कह रहे थे —

“जो कुछ मेरे पास है
वह सब परमेश्वर से आया है।”


इससे हमें एक महत्वपूर्ण सिद्धांत मिलता है —

दशमांश पहले हृदय का सिद्धांत था।
बाद में यह व्यवस्था बना।


🔵 2. मूसा की व्यवस्था में दशमांश

अब हम आते हैं पुराने नियम की व्यवस्था पर।

जब परमेश्वर ने इस्राएल को व्यवस्था दी
तब दशमांश को एक नियम बनाया गया।

लेवीयव्यवस्था और गिनती की पुस्तक में
दशमांश के बारे में स्पष्ट निर्देश दिए गए।

दशमांश का उद्देश्य क्या था?

तीन मुख्य उद्देश्य थे —

पहला
लेवी गोत्र की सेवा।

लेवी लोग मंदिर की सेवा करते थे
इसलिए उन्हें जमीन नहीं मिली थी।

उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए
लोग दशमांश देते थे।

दूसरा उद्देश्य —

मंदिर की व्यवस्था।

मंदिर की सेवा, पूजा और व्यवस्थाओं के लिए
दशमांश का उपयोग होता था।

तीसरा उद्देश्य —

गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता।

इस तरह दशमांश केवल धार्मिक काम के लिए नहीं
बल्कि समाज की सहायता के लिए भी था।


इसलिए हमें समझना चाहिए —

पुराने नियम में
दशमांश वास्तव में अनिवार्य था।

यह इस्राएल राष्ट्र की व्यवस्था का हिस्सा था।


🔵 3. मलाकी की चेतावनी

पुराने नियम में एक बहुत प्रसिद्ध वचन है।

मलाकी 3:10

“सब दशमांश भण्डार में ले आओ
कि मेरे भवन में भोजनवस्तु रहे।”

फिर परमेश्वर कहते हैं —

“मुझे इसमें परखकर देखो
कि मैं आकाश के झरोखे खोलकर
तुम्हारे ऊपर आशीष उंडेलूँगा या नहीं।”

बहुत से प्रचारों में
इस वचन को बार-बार सुनाया जाता है।

और लोग कहते हैं —

“अगर दशमांश नहीं दिया
तो तुम शापित हो जाओगे।”

लेकिन हमें याद रखना चाहिए —

यह वचन इस्राएल राष्ट्र को दिया गया था।

यह उस समय की व्यवस्था का हिस्सा था।

अब हमें देखना होगा —

नए नियम में क्या सिखाया गया है।


🔵 4. यीशु ने क्या कहा?

अब हम आते हैं
नए नियम में।

यीशु ने दशमांश का उल्लेख किया
मत्ती 23:23 में।

यीशु ने फरीसियों से कहा —

“हाय तुम पर…
तुम पुदीना, सोआ और जीरे का दशमांश देते हो
पर न्याय, दया और विश्वास को छोड़ देते हो।”

फिर यीशु कहते हैं —

“इनको भी करना चाहिए था
और उनको भी न छोड़ना चाहिए था।”

इसका मतलब क्या है?

यीशु ने दशमांश को गलत नहीं कहा।

लेकिन उन्होंने यह सिखाया कि

धर्म केवल नियमों का पालन नहीं है।

धर्म का हृदय है —

न्याय
दया
और विश्वास।


🔵 5. प्रारंभिक कलीसिया का उदाहरण

अब हम देखते हैं
प्रेरितों की कलीसिया में क्या हुआ।

प्रेरितों के काम 2 और 4 अध्याय में
हम पढ़ते हैं कि

विश्वासी लोग अपनी संपत्ति बेचकर
जरूरतमंदों की सहायता कर रहे थे।

वहाँ किसी ने नहीं कहा —

“तुम्हें केवल 10% देना है।”

बल्कि लोग स्वेच्छा से दे रहे थे।

कुछ लोग तो अपनी जमीन तक बेच रहे थे।

इसका अर्थ क्या है?

नए नियम में देने की भावना
कानून से नहीं
प्रेम से आती है।


🔵 6. पौलुस की शिक्षा

प्रेरित पौलुस ने देने के विषय में
एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दिया।

2 कुरिन्थियों 9:7

“हर एक जन जैसा अपने मन में ठाने
वैसा ही दान करे।
न कुढ़-कुढ़ाकर
और न दबाव से।
क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।”

ध्यान दीजिए —

पौलुस ने नहीं कहा —

“जरूर 10% दो।”

उन्होंने कहा —

हर्ष से दो।
विश्वास से दो।
प्रेम से दो।


🔵 7. संतुलित सत्य

तो अब प्रश्न है —

क्या दशमांश आज अनिवार्य है?

बाइबल के अनुसार
नए नियम में ऐसा कोई स्पष्ट आदेश नहीं है
कि हर विश्वासी को कानून की तरह 10% देना ही होगा।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है
कि हमें कुछ भी नहीं देना चाहिए।

सत्य यह है —

परमेश्वर उदार हृदय चाहता है।

दशमांश एक अच्छा प्रारंभ हो सकता है।

लेकिन परमेश्वर केवल प्रतिशत नहीं देखते।

वह हमारा हृदय देखते हैं।


🔵 8. अंतिम आत्मिक चुनौती

आज असली प्रश्न यह नहीं है —

“क्या मुझे 10% देना है?”

असली प्रश्न यह है —

क्या परमेश्वर मेरे जीवन में पहला स्थान रखते हैं?

क्या मैं अपनी आय में परमेश्वर को सम्मान देता हूँ?

क्या मैं विश्वास से देता हूँ?

क्या मैं आनंद से देता हूँ?

अगर आपका उत्तर हाँ है —

तो आप नए नियम की आत्मा में चल रहे हैं।


🔵 शक्तिशाली समापन 


परमेश्वर आपका पैसा नहीं
आपका हृदय चाहते हैं।

अगर 10% देना
आपके लिए विश्वास का कदम है —

तो दीजिए।

अगर परमेश्वर आपको उससे भी अधिक देने के लिए प्रेरित करे —

तो दीजिए।

लेकिन एक बात याद रखिए —

परमेश्वर को हमेशा पहला स्थान दीजिए।

क्योंकि बाइबल कहती है —

“जहाँ तुम्हारा धन है
वहीं तुम्हारा हृदय भी होगा।”

  • आज निर्णय लीजिए —

मैं कानून से नहीं
प्रेम से दूँगा।

मैं डर से नहीं
विश्वास से दूँगा।

और मैं परमेश्वर को
अपने जीवन में पहला स्थान दूँगा।

आमीन।