
याकूब के पुत्र दान का नाम प्रकाशितवाक्य 7:4-8 में परमेश्वर ने क्यों काट दिया?
बाइबिल में याकूब के एक पुत्र का जिक्र है जिसे एक सांप कहा गया और जब हम प्रकाशित वाक्य की ओर बढ़ते हैं तो पाते हैं उस गोत्र का नाम ही गायब है उस सूची से जिसमें परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों पर मोहर लगाता है। पर सोचिए क्या परमेश्वर कभी किसी पूरे गोत्र को अनदेखा कर सकता है दान के साथ ऐसा क्या हुआ जो उसका नाम इतिहास से लगभग मिटा ही दिया गया।
हम याकूब की वह भविष्यवाणी जानेंगे जो सुनने में डराती है। दान के गोत्र की छिपी हुई भूमिका को उजागर करेंगे और उस रहस्य में उतरेंगे जिसे अधिकतर लोग पढ़कर भी अनदेखा कर देते हैं क्योंकि वह असहज करता है। बेचैन करता है।
उत्पत्ति 36 में दान के जन्म का उल्लेख राहेल के शब्दों से होता है। परमेश्वर ने मेरा न्याय किया है। मेरी पुकार सुनी है और मुझे एक पुत्र दिया है और इसलिए उसने उसका नाम रखा। दान शायद यह याकूब के अन्य बेटों की तरह ही एक और जन्म लगे। लेकिन ध्यान से सुनिए। इसमें एक मां का दर्द छिपा है। उसकी आंखों में वह खुशी नहीं है जो आमतौर पर संतान के जन्म पर होती है। ना वह आशीर्वाद देती है। ना स्तुति करती है। ना परमेश्वर की महिमा का गुणगान करती है। वह बस कहती है परमेश्वर ने मेरा न्याय किया। जैसे वह अपने ही जीवन की हार स्वीकार कर रही हो। दान हिब्रू में इस नाम का अर्थ है। उसने न्याय किया। याकूब के सभी बेटों में दान एकमात्र है जिसका नाम किसी पुण्य पर नहीं बल्कि एक घरेलू संघर्ष एक टूटी हुई आत्मा और एक महिला के खालीपन से जन्मा जिसने पति के प्रेम के लिए होड़ लगाई और अपनी दासी से पुत्र को पाया। यह कहानी किसी जीत की नहीं। यह उस दर्द की कहानी है जिसे इंसान छुपा भी नहीं पाता और बांट भी नहीं सकता।
यह एक ऐसा नाम है जो शुरुआत से ही टूटे हुए दिल की गवाही देता है। दान का जन्म प्रेम से नहीं हुआ था। वह एक आशीर्वाद नहीं बल्कि दो बहनों के बीच एक चुपचाप चल रही पीड़ा की कहानी था। वह बिल्हाहा का पुत्र था। एक दासी जिसे राहेल ने अपनी बेबसी में एक रणनीति की तरह अपने पति को सौंप दिया। ना कोई दया, ना कोई आराधना, सिर्फ एक कोशिश कि शायद इस तरह वह भी किसी दिन मां कहला सके।
क्या आपने कभी सोचा है कि एक संतान का जन्म इतना भारी भी हो सकता है। आत्मिक रूप से बाइबल में नाम सिर्फ नाम नहीं होते। वह तो जैसे भविष्यवाणियां होते हैं जिनमें एक आत्मा की कहानी संक्षेप में छिपी होती है। दान का नाम उसने न्याय किया। शायद उसी क्षण आकाश में कुछ तय हो गया था। पर उस पल न्याय किसका हुआ था? क्या राहेल का या उस छोटे शिशु दान का जिसका जीवन किसी प्रेम के मिलन से नहीं बल्कि एक टूटी हुई आशा और हारे हुए हृदय से शुरू हुआ था जो धरती पर एक औरत की छोटी सी जीत लग रही थी स्वर्ग में शायद वह एक चेतावनी थी कि यह वंश आगे चलकर बहुत कुछ खोएगा उसे एक शब्द दान में एक बीज बोया गया और वह बीज धीरे-धीरे अंकुरित हुआ उसमें उगाए पाप के कांटे मूर्ति पूजा के झाड़ झंघाड़ और अंत में वह खो गया। प्रकाशित वाक्य 7 की पवित्र सूची में उसका नाम तक नहीं बचा। यह कोई साधारण कहानी नहीं है। यह हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर दिलों की गहराई तक देखता है। और एक छोटी सी बात एक छोटा सा निर्णय पूरे इतिहास की दिशा बदल सकता है।
सांप की यह कथा याकूब से शुरू नहीं हुई थी। यह तो एक दासी की कोख से जन्मी थी। और एक ऐसे नाम के साथ जो किसी अदालती फैसले जितना भारी था। कितना विचित्र है ना। बाइबल हमें शुरू से ही कुछ इशारा दे रही थी कि दान कोई सामान्य पुत्र नहीं था। वह तो एक अधूरी कहानी का प्रतीक था। एक ऐसा न्यायाधीश जो कभी सही न्याय कर ही नहीं पाया। एक ऐसा बेटा जो बचपन से ही अपने भीतर किसी अनसुलझे निर्णय की गूंज लिए चलता रहा। और जब आप इस नजरिए से देखें तो समझ आता है कि क्यों उसका वंश इतना अलग था और क्यों प्रकाशित वाक्य की पवित्र सूची में उसका नाम कहीं नहीं दिखता।
अब उस गंभीर पल की कल्पना कीजिए। याकूब वृद्ध हो चुके हैं। मृत्यु समीप है। उन्होंने अपने पुत्रों को पास बुलाया है ताकि उन्हें बताएं कि उनके भविष्य में क्या होने वाला है। वह क्षण बहुत पवित्र है। सम्मान से भरा थोड़ा भयभीत भी। हर बेटा यह जानने को तैयार बैठा है कि उसके जीवन की दिशा कैसी होगी। एक-एक करके पुत्र आते हैं और फिर आता है दान का नंबर और उस घड़ी जब एक पिता अपने पुत्र के बारे में कहता है दान मार्ग में सांप होगा। पथ में बिच्छू की नाई जो घोड़े की एड़ी पर डसेगा जिससे उसका सवार गिर पड़ेगा। उत्पत्ति 49 का 17
सोचिए किसी बेटे के लिए पिता के मुख से ऐसी वाणी सुनना क्या यह आशीर्वाद था या चेतावनी दान को एक योद्धा एक संरक्षक या एक आशीष का पात्र नहीं कहा गया बल्कि उसे एक खतरे के प्रतीक से पहचाना गया शायद यह कोई साधारण वंश नहीं था यह एक ऐसा वंश था जिसे शुरुआत से ही आत्मिक संकट में देखा गया ठहरिए जरा सांप यह तो आशीर्वाद नहीं है बल्कि यह तो बाइबल के सबसे भयावह प्रतीकों में से एक से तुलना है। एक ऐसा चिन्ह जो छल, धोखे और पतन की कहानी कहता है।
सोचिए याकूब के सब पुत्रों में से केवल दान ऐसा है जिसे एक सांप के रूप में वर्णित किया गया। वही सांप जो उत्पत्ति तीन में एदेन की वाटिका में आया था और जो मानव जाति के पहले पतन का कारण बना। क्या आपने कभी इस पर ध्यान दिया है? याकूब ने यह छवि क्यों चुनी? क्या उन्होंने आत्मा में कुछ ऐसा देख लिया था जो हमारी आंखें कभी ना देख पाई?
दान। क्या वह उस रहस्य का भाग्य था जो परमेश्वर की योजना में एक ऐसे प्राणी की तरह कार्य करेगा जो छिपकर वार करता है। कमजोरी की घात में बैठा रहता है। और जिसका कार्य हमेशा पर्दे के पीछे होता है। सांप कभी सामने से नहीं लड़ता। वह यहूदा की तरह शौर्य नहीं दिखाता। ना ही बिन्यामीन की तरह दृढ़ता रखता है और ना ही लावी की तरह परमेश्वर की सेवा करता है। वह छिपता है। वह चुप रहता है। फिर धीरे से एड़ी पर वार करता है और घुड़सवार को गिरा देता है। उसका वार शब्दों से नहीं होता ना शोर से। पर जब वह करता है तो बहुत कुछ टूट जाता है।
याकूब की वह भविष्यवाणी एक पिता के टूटे हुए मन से निकली हुई बात थी। वह बता रही थी कि दान का वंश परमेश्वर की प्रजा के भीतर ही एक छिपा हुआ संकट बन जाएगा। एक ऐसी उपस्थिति जो शांत तो होगी पर धीरे-धीरे आत्मा को भीतर से तोड़ देगी। यह कोई साधारण चेतावनी नहीं थी। यह स्वर्ग की ओर से एक गहरी पुकार थी कि सब कुछ जो दिखाई देता है, वह हमेशा पवित्र नहीं होता। यह कोई साधारण मानसिक विश्लेषण नहीं था। यह एक गहरी आत्मिक चेतावनी थी।
याकूब जब दान के विषय में बोलते हैं तो वह केवल शब्द नहीं बोलते। वह आत्मा में कुछ ऐसा देख रहे होते हैं जो उन्हें विचलित कर देता है। वे कह रहे हैं कि दान का वंश इसराइल के भीतर कार्य करेगा। पर वह कार्य तलवार या युद्ध से नहीं होगा बल्कि छल और भीतर के भ्रष्टाचार से। वह शत्रु की तरह सामने खड़ा नहीं होगा। वह तो अपने ही लोगों के बीच होगा। पर उसके कर्म भीतर से धीरे-धीरे सब कुछ खोखला कर देंगे।
अब ध्यान दीजिए। जैसे ही याकूब दान की बात कहते हैं, वह अचानक चुप हो जाते हैं और उनके मुंह से निकलता है, हे यहोवा, मैं तेरे उद्धार की आशा करता हूं। उत्पत्ति 49 का 18 जैसे उनका हृदय कांप उठा हो। जैसे वे अब और आगे कुछ कह ही ना पा रहे हो। क्योंकि जो उन्होंने आत्मा में देखा वो इतना भयानक था कि बिना परमेश्वर को पुकारे वे आगे नहीं बढ़ सकते थे। क्या आपने कभी सोचा है? याकूब ने अपने 12 बेटों में से किसी के बारे में कहते समय कभी खुद को रोका नहीं। लेकिन जब दान की बारी आई तो उनका मन रुक गया। उनकी आत्मा कांप उठी। दान को बुलाया गया था अपनी प्रजा का न्याय करने के लिए। पद 16 परंतु उसे स्मरण किया गया। एक सांप के रूप में एक ऐसा प्राणी जो मार्ग में छिपा रहता है जो शांति का वादा करता है पर वार करता है पीठ पीछे। कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिसे न्याय देने के लिए बुलाया गया वही अपने ही लोगों के लिए एक अदृश्य संकट बन गया और यह सब देखकर एक वृद्ध पिता का हृदय इतना बोझिल हो गया कि वह केवल एक बात कह सका हे यहोवा तेरे उद्धार की आशा करता हूं क्योंकि जब इंसान कुछ नहीं कर पाता तो वह सिर्फ एक ही काम करता है परमेश्वर को पुकारता है वह एक जिसे बुलाया गया था न्याय को थामने के लिए पर उसने चुना धोखे का चोला वो एक जिसे धार्मिकता से न्याय करना था पर उसने चालाकी से लोगों की आत्माओं में जहर घोल दिया। यह कोई साधारण तुलना नहीं है। यह ईश्वर की चेतावनी थी। एक चिन्ह जो याकूब की वाणी से निकला और धीरे-धीरे पूरे युगों में गूंजता चला गया। यहां तक कि प्रकाशित वाक्य तक पहुंच गया।
याकूब ने उत्पत्ति 49 का 17 में जो भविष्यवाणी की थी, वह कहीं खोई नहीं। वो हवा में नहीं उड़ गई। वह तो जैसे बीज की तरह मिट्टी में गिर गई और समय आने पर उसका फल दिखाई देने लगा। सालों बाद हम देखते हैं कि दान का गोत्र उस सांप की तरह बन गया था जो राह में छिपा रहता है। धीरे से वार करता है और दूसरों को गिरा देता है। न्यायों 18 में दान के गोत्र ने एक निर्णय लिया जो उनकी आत्मा की दिशा को सदा के लिए मोड़ देता है। वे उस भूमि को छोड़ देते हैं जो उन्हें परमेश्वर ने दया से दी थी। वे अपने ही लिए एक नकली धार्मिकता खड़ी कर लेते हैं। एक तराशी हुई मूर्ति, एक पैसा लेकर रखा गया याजक और एक ऐसी पूजा जो यरूशलेम यानी परमेश्वर के चुने हुए स्थान से पूरी तरह अलग होती है। सोचिए यह कोई छोटी बात नहीं थी। यह वह मोड़ था जहां एक पूरा गोत्र परमेश्वर की उपस्थिति से अलग चला गया। यह क्षण बाइबल की सबसे अनदे गई चाबियों में से एक है। पर यही वह रहस्य खोलता है कि क्यों दान को सांप कहा गया और क्यों उसका नाम प्रकाशित वाक्य की मोहर लगी हुई आत्माओं की सूची में नहीं पाया गया।
अब चलिए हम और भी गहराई से देखें। उस दुखद मोड़ को जहां न्याय खो गया और धोखा धार्मिकता के वेश में आकर बैठ गया। दान का गोत्र जिसे न्याय का प्रतिनिधि बनना था। वह अपने उत्तरदायित्व को निभा नहीं पाया। जिस भूमि को परमेश्वर ने सौंपा था, उसे वे पूरी तरह प्राप्त ना कर सके और फिर वे उत्तर की ओर चल पड़े। एक शांति से भरे नगर लेशेम की ओर जहां कोई युद्ध नहीं था। कोई विरोध नहीं था। लेकिन उनके मार्ग में एक मोड़ आया। वे मिले एक मनुष्य से। मीका नाम था उसका। उसने अपने ही घर में एक मंदिर जैसा कुछ बना लिया था। एक तराशी हुई मूर्ति थी वहां। एक एफोद रखा गया था और उसने एक लेवी पुरोहित को चंद पैसों में खरीद लिया था। अब जरा देखिए दान के लोगों को। क्या उन्होंने सच के लिए खड़े होकर उस कार्य को रोका? नहीं। उन्होंने वह सब कुछ लूट लिया। मूर्तियां, वेदियां और यहां तक कि वह याजक भी और फिर बड़े गर्व से उसे कहा, तू किसी एक के लिए याजक क्यों बना है? आ हमारे पूरे गोत्र का पिता और याजक बन। और बस वहीं से आरंभ हो गया। एक ऐसा धार्मिक भटकाव जिसने परमेश्वर के बनाए सच्चे मार्ग से एक नकली और भ्रष्ट मार्ग तैयार कर दिया। यह कोई साधारण गलती नहीं थी। यह कोई भूल से उठाया गया कदम नहीं था। यह एक जानबूझकर की गई आत्मिक बगावत थी।
जिस दान को परमेश्वर ने न्याय का बर्तन बनाया था, वह अब बन गया भ्रष्टता और भ्रम का साधन और फिर वह सांप जिसके बारे में याकूब ने रोते हुए कहा था, वह घोड़े की एड़ी पर डसेगा ताकि उसका सवार गिर जाए। अब वह सच्चाई बन चुकी थी। इसराइल दो भागों में बंट गया था। एक सच्ची उपासना और दूसरी नकली और दूषित उपासना जिसकी नींव दान ने डाली थी। अब सोचिए क्या यह सिर्फ एक गोत्र की कहानी है या फिर यह हम सबके लिए एक चेतावनी जिसे न्याय करना था। उसी ने बंटवारे बो दिए। दान एक ऐसा नाम जिसे परमेश्वर ने न्याय के अर्थ में रखा था। लेकिन उस गोत्र ने खुद को बना लिया भ्रम और विद्रोह का स्रोत। वो लोग केवल ठगे नहीं गए। उन्होंने खुद ही ठगने का रास्ता चुना। परमेश्वर की वेदी को दोबारा खड़ा करने की बजाय उन्होंने सांप के लिए सिंहासन बना दिया और तब से दान के वंश पर एक ऐसा कलंक लग गया जिसने उन्हें परमेश्वर के चुने हुए गोत्रों से भी अलग कर दिया।
जब कभी बाइबल में इसराइल की आत्मिक गलतियों की बात होती है तो न्यायों 18वा अध्याय और दान का नाम सामने आता है। एक ऐसे मोड़ की तरह जहां आस्था से गिरावट शुरू हुई। जिसे धर्म का मार्ग दिखाना था। उसने पाप को धर्म का मुखौटा पहना दिया और यही विद्रोह का मार्ग वहीं नहीं रुकता। यह धीरे-धीरे हमें ले जाता है उस अंतिम समय की ओर जब न्याय फिर से किया जाएगा। अब हम आते हैं प्रकाशित वाक्य 7:4-8 रेवुलेशन की उस घड़ी पर जहां परमेश्वर अपने चुने हुए सेवकों पर छाप लगाता है। रेवुलेशन सात का चार से आठ में लिखा है 1 लाख 44,000 लोगों पर मोहर लगाई जाएगी। हर एक गोत्र से 12,000 सूची की शुरुआत होती है यहूदा से फिर रूबेन गाद आशेर नफ्ताली लेकिन फिर कुछ ऐसा होता है जो आत्मा को हिला देता है हे प्रभु दान का नाम वहां नहीं है तेरे चुने में तेरी छाप पाने वालों में उसका कोई नामोनिशान नहीं एक ऐसा गोत्र जो कभी न्याय करने के लिए बुलाया गया था अब तेरे पवित्र जनों की सूची से ही गायब है यह कोई साधारण बात नहीं है यह तेरे मौ मौन का न्याय है। हम अक्सर पड़ जाते हैं। यह सूची जहां 12 गोत्रों में से हर एक का नाम लिया गया। पर दान दान नहीं है। क्या हमने कभी रुक कर यह सोचा? क्यों तूने उसे छोड़ दिया प्रभु? क्यों उसके लिए कोई स्थान नहीं रखा? क्या यह तेरे दिल की पीड़ा थी? या दान की जिद्दी विद्रोह हे प्रभु यह कोई भूल नहीं। कोई गलती नहीं। यह तो तेरा परम न्याय है। तू भ्रष्टता पर मुर नहीं लगाता। तू मूर्ति पूजा को पवित्र नहीं कहता। तू विद्रोह को अपने राज्य में स्थान नहीं देता। हे प्रभु दान का मौन तेरी उपस्थिति में सबसे बड़ा चिल्लाता हुआ अभाव बन गया। और हम तेरे वचन को पढ़कर भी कभी इस खाली जगह पर रोए तक नहीं। एक नाम जो कभी न्याय का प्रतीक था। आज परमेश्वर की मोहर से बाहर है। बाइबल हमें दिखाती है दान का गोत्र वह था जिसने अपने लिए एक नई आराधना रच ली। परमेश्वर की पवित्र उपासना को छोड़ दिया और अपने आत्मिक अस्तित्व पर दाग लगा दिया। जब मेमना अपने लोगों को अंतिम न्याय के लिए मोहर बंद कर रहा है। दान उस गिनती में नहीं है। उसका नाम मिटा दिया गया है। कभी न्याय के साथ जन्मा अब न्याय से बाहर कर दिया गया। यह बस एक भविष्यवाणी नहीं थी। यह उस आत्मा की चीख है जो अपने पाप के बोझ से दब कर गिर गई और फिर उठ ना सकी। बाकी गोत्रों ने भी गलतियां की थी। लेकिन उनके कुछ लोग तो वफादार निकले। उन्हें मोहर मिल गई। लेकिन दान उसमें कोई नहीं बचा जो परमेश्वर की मोहर का अधिकारी ठहरता। दान की पहचान सर्प बन गई और सर्प को मोहर नहीं दी जाती। मोहर धोखे पर नहीं लगती। मोहर विद्रोह पर नहीं लगती। मोहर उस पर लगती है जो टूटा है, पश्चातापी है और सत्य के लिए रोता है। पर दान ने रोना नहीं चुना। उसने भटकना चुना। शुरुआत में उसका नाम न्याय था। पर अंत में वह खुद उस न्याय का विषय बन गया जिसे वह दूसरों पर लाने को भेजा गया था। और यहीं से हमारी आत्मा कांप उठती है। कहीं हम भी उस मोहर से बाहर तो नहीं। परमेश्वर ने मेरा न्याय किया है। यह राहेल की पुकार थी। एक मां की जिसने अपने हृदय की पीड़ा से यह शब्द कहे थे। उत्पत्ति 30 और याकूब एक पिता के रूप में दान के लिए भविष्यवाणी करता है। दान अपने लोगों का न्याय करेगा। उत्पत्ति 49 का 16 क्या सौभाग्य था? एक पुत्र जिसे जन्म से ही न्याय की जिम्मेदारी सौंपी गई। एक गोत्र जिसे परमेश्वर की ओर से आवाज बनना था। लेकिन दुख की बात यह है जो न्याय का दीपक था वो अंधकार का कारण बन गया। जो मार्गदर्शन देने के लिए था वो खुद राह से भटक गया और औरों को भी भटका दिया। दान जिसने अपनी पहचान को परमेश्वर के उद्देश्यों के साथ शुरू किया था। आखिरकार आत्मिक विश्वासघात का प्रतीक बन गया। उसने ना तो परमेश्वर के मार्गों की रक्षा की ना ही मूर्ति पूजा से स्वयं को अलग रखा बल्कि उसने एक ऐसा मार्ग चुना जो सीधे आत्मिक विनाश की ओर जाता था। परिणाम क्या हुआ? जब हम प्रकाशित वाक्य सात में मोहर बंद किए गए
1 लाख 44000 सेवकों की सूची देखते हैं तो वहां दान का नाम ही नहीं है। क्या यह एक संयोग है? नहीं। यह एक गंभीर चुपचाप गूंजती हुई घोषणा है। जिन्होंने मूर्तियों को अपनाया जिन्होंने मेरे न्याय को ठुकराया, उन्हें मेरी मुर नहीं मिलेगी। दान एक समय पर न्याय का प्रतीक अब न्याय के द्वारा खारिज किया गया है। कभी जिसे चुनकर न्याय देने की आशा थी। आज वह सूची से मिटा दिया गया है। सोचिए एक गोत्र जो आदर और प्रतिष्ठा के साथ आरंभ हुआ। कैसे चुपचाप इतिहास से बाहर कर दिया गया। क्या हमने कभी इस पीड़ा पर मनन किया है? न्याय करने वाला अब न्याय का शिकार बन गया। दान एक नाम जो न्याय का प्रतीक था, आज चेतावनी बन गया है। जिस वंश से उम्मीद थी कि वह लोगों का न्याय करेगा, वही राह भटक गया और दूसरों को भी भटका दिया। जिसे आत्मिक अगवा होना था, वह झूठी उपासना का जनक बन गया। जिसका नाम हमेशा के लिए याद रखा जाना था, वह नाम परमेश्वर की मोहर से बाहर रह गया। पर यह बात समझ लीजिए। परमेश्वर ने दान को नहीं भुलाया। परमेश्वर झूठ पर मुर नहीं लगाता। वह मुर केवल उन्हीं पर लगाई जाती है जो वफादार हैं, सच्चे हैं और जो मसीह के स्वरूप को अपने जीवन में जीवित रखते हैं। दान की कहानी कोई साधारण भूल नहीं है। यह एक गंभीर चेतावनी है हम सबके लिए। सिर्फ प्रतिज्ञा में जन्म लेना काफी नहीं। उसमें बने रहना आवश्यक है। दान का वंश इस कारण मिटा दिया गया क्योंकि उसने अपने उद्देश्य को छोड़ दिया। उसने वह राह चुनी जो झूठी उपासना और विद्रोह की थी और शायद यही सबसे गहरा दुख है कि एक नाम जो न्याय का प्रतीक था अब न्याय के बाहर खड़ा है।
इस संदेश को दूसरों तक भी पहुंचाएं। यह सेवकाई पूर्णतः नीट, स्वार्थ और प्रेम पूर्वक चलाई जाती है। आपका छोटा सा सहयोग भी किसी के जीवन को बदल सकता है। जय मसीह की।
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