व्यक्तिगत विश्वासत्याग
इब्रानियों 3:12 "हे भाइयों, चौकस रहो कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो तुम्हें जीवते परमेश्वर से दूर हटा ले जाये।
विश्वासत्याग (यूनानी अपोस्टासिया) नये नियम में दो बार संज्ञा के रूप में प्रयोग हुआ है (प्रे 21:21; 2थिस 2:3) और यहाँ इब्रानियों 3:12 में क्रिया के रूप में (यूनानी ऐपीसटेमी, का अनुवाद "फिर जाना")। यूनानी शब्द की परिभाषा गिर जाना, टूट जाना, विद्रोह, त्यागना, अपने को हटा लेना या उसमें फिर जाना जो पहले करते थे के अर्थों में दी गई है।
(1) फिर जाने का अर्थ है अपने उद्धार के संबंध को मसीह से तोड़ लेना या उस महत्वपूर्ण एकता से जो उसमें सच्चे विश्वास में थी अपने आप को हटा लेना। इस प्रकार व्यक्तिगत धर्म त्याग केवल उनके लिये सम्भव है जिन्होंने पहले उद्धार का अनुभव किया, नये जन्म तथा पवित्र आत्मा के द्वारा नवीनीकरण का (तुलना करें लूक 8:13; इब्र 6:4-5); यह केवल नये नियम की शिक्षा का त्यागना नहीं है उद्धार न पाये हुओं के द्वारा दृश्य कलीसिया में। धर्म त्याग के दो भिन्न परन्तु सम्बन्धित पहलू हो सकते हैं
(A) धर्म ज्ञान संबंधी धर्म-त्याग, अर्थात् मसीह तथा प्रेरितों की मूल शिक्षा में से सब या कुछ को अस्वीकार करना (1तीम 4:1; 2तीम 4:3)
(B) नैतिक धर्म त्याग, अर्थात् भूतपूर्व विश्वासी मसीह में स्थिर नहीं रहता बल्कि दोबारा पाप व अनैतिकता का दास बन जाता है (यश 29:13; मत्ती 23:25-28; रोम 6:15-23; 8:6-13)
(2) पवित्रशास्त्र धर्म त्याग के विषय में महत्वपूर्ण चेतावनी देता है, जिसका तात्पर्य सावधान करना है उस खतरे से जो मसीह के साथ मिलन के त्याग से हो सकता है तथा हमें प्रेरणा देने के लिये कि हम विश्वास व आज्ञाकारिता में बने रहें। इन चेतावनियों का ईश्वरीय उद्देश्य इस विचारधारा से कमज़ोर न हो जाए जो बताता है कि "चेतावनी सत्य है, परन्तु वास्तविक धर्म-त्याग की संभावना नहीं है।" बल्कि, हमें इन चेतावनियों को हमारी तैयारी के काल में सच्चाई को बताते हुये देखना है और उन्हें एक खतरा समझना है यदि हम अनन्त उद्धार पाना चाहते हैं। नये नियम की बहुत सी चेतावनियों में से कुछ हैं: मत 24:4-5,11-13; यूह 15:1-6; प्रे 11:21-23; 14:21-22; 1कुर 15:1-2; कुल 1:21-23; 1तीम 4:1,16; 6:10-12, 2तीम 4:2-5 इब्र 2:1-3; 3:6-8,12-14; 6:4-6; याक 5:19-20; 2पत 1:8-11; 1 यूह 2:23-25।
(3) धर्म त्याग के उदाहरण निर्ग 32; 20 17:7-23; भज 106; यश 1:2-4; यिर्म 2:1-9; प्रे 1:25; गल 5:4; 1तीम 1:18-20; 2पत 2:1,15,20-22; यहूद 4,11-13 में देखें जा सकते हैं; धर्मत्याग पर नोट के लिये जिनकी पूर्व सूचना अन्तिम समय के लिये दी गई थी और जो कलीसिया में होगा।
(4) धर्म त्याग तक ले जाने वाले चरण यह हैं:
(a) विश्वासी, अविश्वास के कारण सच्चाईयों को उपदेश, चेतावनी, प्रतिज्ञाओं व परमेश्वर के वचन की शिक्षा को अति गम्भीरता से नहीं लेते (मर 1:15; लूका 8:13; यूह 5:44,47; 8:46)।
(b) जब संसार के सत्य परमेश्वर के स्वर्गीय राज्य से बड़े हो जाते हैं, तो विश्वासीजन धीरे-धीरे मसीह के द्वारा परमेश्वर के नज़दीक आना बन्द हो जाते हैं (इब्र 4:16; 7:19,25; 11:6)।
(c) पाप के धोखे के द्वारा अपने जीवनों में वे पाप को अधिक सहन करने लगते हैं (1कुर 6:9-10; इफ 5:5; इब्र 3:13)। वे आगे को धार्मिकता, प्रेम तथा दुष्टता से घृणा नहीं करते (देखें इब्र 1:9, नोट)।
(d) मन की कठोरता से (इब्र 3:8,13), परमेश्वर के मार्ग को त्यागकर (3:10) वे बार बार पवित्र आत्मा की वाणी तथा डाँट को नहीं सुनते (इफ 4:30; 1थिस 5:19-22)।
(e) पवित्र आत्मा शोकित होता है (इफ 4:30; इब्र 3:7-8) बुझ जाता है (1थिस 5:19) और उसके मन्दिर को भ्रष्ट किया जाता है (1कुर 3:16) वह अन्ततः भूतपूर्व विश्वासियों से दूर हो जाता है (न्या 16:20; भज 51:11; रोम 8:13; 1कुर 3:16-17; इब 3:14)।
(5) यदि धर्म त्याग को बिना देखे ऐसे ही चलने दिया जाये, तो लोग अन्ततः उस बिन्दु पर पहुँच जाऐंगे जब नया आरम्भ सम्भव न होगा। (a) जिनको पहले उद्धार का अनुभव हुआ परन्तु जानबूझ कर तथा निरन्तर अपने हृदयों को आत्मा की वाणी के प्रति कठोर करते रहे (इब्र 3:7-19), जानबूझ कर पाप करते रहे (इब 10:26) तथा पश्चात्ताप करने तथा परमेश्वर की ओर फिरने से इन्कार कर दिया, वे उस बिन्दु पर पहुँच सकते हैं जहाँ से वापस नहीं मुड़ा जा सकता है। जहाँ पश्चात्ताप व उद्धार सम्भव नहीं (इब्र 6:4-6; देखें व्य 29:18-21, नोट; 1शम 2:25 नोट; नीत 29:1, नोट)। परमेश्वर के धीरज की भी एक सीमा है (देखें 1शम 3:11-14; मत्ती 12:31-32; 2तीम 2:9-11; इब्र 10:26-29,31; 1 यूह 5:16)।
(b) वापस न हो सकने वाले बिन्दु को पहले से समझाया नहीं जा सकता हैं। इसलिए एक मात्र सुरक्षा धर्म त्याग के खतरे के विरूद्ध में इस शिक्षा से पायी जाती है : "आज तुम उसकी वाणी को सुनो तो अपने हृदयों को कठोर न करो" (इन 3:7-8,15,4:7)।
(6) यह बल देना है कि धर्म त्याग उन सब के लिये एक खतरा है जो विश्वास से बहक जाते हैं (इब्र 2:1-3) तथा परमेश्वर से दूर हो जाते हैं (6:6) तो भी वह तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक निरन्तर रूप से तथा जानबूझ कर पवित्र आत्मा की वाणी के विरूद्ध पाप न किये जाते रहें (देखें मत 12:31, पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप पर नोट)।
(7) जो विश्वासी हृदय से परमेश्वर से दूर हो जाते हैं (इब्न 3:12) विचार कर सकते हैं कि वे मसीही है परन्तु मसीह तथा आत्मा की माँगों के प्रति उनकी उदासीनता तथा पवित्रशास्त्र की चेतावनियों के प्रति उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता। इस आत्म धोखे की संभावना के कारण पौलुस उन सबसे जो उद्धार का दावा करते हैं, कहता है अपने आप को जाँचों यह देखने के लिये कि तुम विश्वास में बने हो; अपने को जाँचों (2कुर 13:5, मोट) ट्री
(8) जो उचित रूप से अपनी आत्मिक स्थिति के लिये चिन्तित होंते हैं और अपने हृदयों में पश्चात्ताप के साथ परमेश्वर की ओर लौटने की इच्छा रखते हैं तो उनको यह निश्चित प्रमाण है कि उन्होंने क्षमा न किया जाने वाला धर्म त्याग नहीं किया। पवित्रशास्त्र स्पष्ट बताता है कि परमेश्वर किसी को नाश होने देना नहीं चाहता है (2पत 3:9; यश 1:18-19; 55:6-7) और घोषणा करता है कि परमेश्वर उन सब को गृहण करेगा जो पहले उद्धार के अनुग्रह के अधीन थे यदि वे पश्चात्ताप करके लौट आयें (तुलना करें गल 5:4 को 4:19 से; 1कुर 5:1-5 की 2कुर 2:5-11 से; देखें लूका 15:11-24; रो 11:20-23; याक 5:19-20; प्रक 3:14-20; पतरस के उदाहरण पर ध्यान दें, मत 16:16: 26:74-75; यूह 21:15-22)

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