भूमिका
पिछले अध्याय में हमने न्याय की निश्चितता का अध्ययन किया और प्रस्तावना में सात विभिन्न न्यायों के विषय में सीखा। इस अध्याय में हम इन सातों न्यायों की अधिक विस्तृत रूपरेखा संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जैसे कि वे संसार में घटित हुए हैं या घटित होंगे। केवल ये ही न्याय नहीं हैं, नूह के युग में जल प्रलय द्वारा न्याय हुआ था और बाबुल के गुम्मट के निर्माण के समय भाषा में गड़बड़ी द्वारा भी न्याय हुआ था। कुछ कम स्तर पर भी न्याय हुए हैं, जो कि व्यक्तियों, राष्ट्रों और विभिन्न समयों में राष्ट्रों के समूहों पर भी घटित हुए हैं।
आइए पाँच मूलभूत तथ्यों के अन्तर्गत इनमें से प्रत्येक न्याय का अध्ययन करें। यह अध्याय मूल रूप से फिलीपाइन के क्रिश्चियन कॉलेज, जो मनीला में है, के लिए तैयार किया गया था; सन् 1961 में अनेक प्रश्नों के उत्तर में इसे प्रस्तुत किया गया था।
सम्भवतः प्रथम मुख्य न्याय उत्पत्ति के प्रथम अध्याय के प्रथम दो पदों के बीच के काल में हुआ, जो आदम से पहले वाली जाति पर महाविपत्ति के रूप में हुआ।
1. वह न्याय जो कलवरी पर किया गया
1) विषय: मसीह ने हमारे पाप उठाए।
- यूहन्ना 1:29, "देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है, जो जगत का पाप उठा ले जाता है।"
- इब्रानियों 2:9 पर हम यीशु को जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं; ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे।
- 1 यूहन्ना 2:2 और वही हमारे पापों का प्रायश्चित्त है: और केवल हमारे ही नहीं, वरन सारे जगत के पापों का भी।
2) समय: लगभग ईस्वी सन् 30 जब यीशु क्रूस पर था।
3) स्थानः कलवरी, वास्तविक क्रूस पर चढ़ाया जाना;
यूहन्ना 19:17,18
17 तब वे यीशु को ले गए। और वह अपना क्रूस उठाए हुए उस स्थान तक बाहर गया, जो खोपड़ी का स्थान कहलाता है और इब्रानी में गुलगुता।
18 वहां उन्होंने उसे और उसके साथ और दो मनुष्यों को क्रूस पर चढ़ाया, एक को इधर और एक को उधर, और बीच में यीशु को।रोमियों 1:18, “परमेश्वर का क्रोध तो उन लोगों की सब अभक्ति और अधर्म पर स्वर्ग से प्रकट होता है, जो सत्य को अधर्म से दबाए रखते हैं।"
- यह क्रोध कलवरी पर प्रकट किया गया; परमेश्वर ने अन्धकार के पर्दे को खींच दिया;
मत्ती 27:45
दोपहर से लेकर तीसरे पहर तक उस सारे देश में अन्धेरा छाया रहा।
4) आधारः व्यवस्था,
रोमियों 6:23
"क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है।" यहेजकेल 18:4 भी देखिए "जो प्राणी पाप करे वही मर जाएगा। पाप का न्याय सिद्ध व्यवस्था द्वारा किया गया,
याकूब 1:25
पर जो व्यक्ति स्वतंत्रता की सिद्ध व्यवस्था पर ध्यान करता रहता है, वह अपने काम में इसलिये आशीष पाएगा कि सुनकर नहीं, पर वैसा ही काम करता है।
5) परिणामः मसीह की शारीरिक मृत्युः विश्वासियों के लिए दोषमुक्ति या धार्मिकता -
1 तीमुथियुस 4:10
"जो सब मनुष्यों का, और निज करके विश्वासियों का उद्धारकर्ता है।"
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2. प्रतिदिन आत्म-निरीक्षण
1) विषयः सन्त अपने को जांचते हैं,
1 कुरिन्थियों 11:28
"इसलिए मनुष्य अपने आपको जांच ले और इसी रीति से इस रोटी में से खाए।
भजन संहिता 26:12
"हे यहोवा, मेरा न्याय कर मुझको जांच और परख, मेरे मन और हृदय को परख।"
2) समयः किसी भी समय, प्रभु भोज में ही नहीं, वरन प्रतिदिन, विशेष रूप से प्रातःकाल के मनन के शान्त समय में।
3) स्थानः कोई भी स्थान, हमें प्रभु की निरन्तर संगति में रह कर उससे बातचीत करते रहना चाहिए और उसकी डांट या पवित्र आत्मा का निर्देशन सुनने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।
4) आधारः पुत्रत्व
इब्रानियों 12:6,7
"क्योंकि प्रभु, जिससे प्रेम करता है, उसकी ताड़ना भी करता है; और जिसे पुत्र बना लेता है, उसको कोड़े भी लगाता है। तुम दुख को ताड़ना समझ कर सह लो परमेश्वर तुम्हें पुत्र जान कर तुम्हारे साथ बर्ताव करता है।"
5) परिणामः शुद्धिकरण, दुर्बलताओं, रोग और मृत्यु से छुटकारा
1 कुरिन्थियों 11:30
इसी कारण तुम में से बहुत से निर्बल और रोगी हैं, और बहुत से सो भी गए।
- विश्वासी को आनन्द और शान्ति सहित क्षमा-प्राप्ति:
1यूहन्ना 1:9
“यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है। "
3. न्याय (The Bema) मसीह का न्याय आसन
1) विषयः सन्तों का अपने कार्यों के अनुसार न्याय हो रहा है।
2) समयः मसीह के दूसरे आगमन पर
मत्ती 16:27
मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों के साथ अपने पिता की महिमा में आएगा, और उस समय वह हर एक को उसके कामों के अनुसार प्रतिफल देगा।
- और प्रथम पुनरुत्थान के बाद,
लूका 14:14
तब तू धन्य होगा, क्योंकि उन के पास तुझे बदला देने को कुछ नहीं, परन्तु तुझे धमिर्यों के जी उठने पर इस का प्रतिफल मिलेगा।
3) स्थान: हवा में...
1 थिस्सलुनीकियों 4:16,17
16 क्योंकि प्रभु आप ही स्वर्ग से उतरेगा; उस समय ललकार, और प्रधान दूत का शब्द सुनाई देगा, और परमेश्वर की तुरही फूंकी जाएगी, और जो मसीह में मरे हैं, वे पहिले जी उठेंगे।
17 तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उन के साथ बादलों पर उठा लिए जाएंगे, कि हवा में प्रभु से मिलें, और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।
4 ) आधारः विश्वासी के कार्य...
1 कुरिन्थियों 3:13
तो हर एक का काम प्रगट हो जाएगा; क्योंकि वह दिन उसे बताएगा; इसलिये कि आग के साथ प्रगट होगा: और वह आग हर एक का काम परखेगी कि कैसा है।
5) परिणामः विश्वासयोग्य ठहरने वाले के लिए प्रतिफल और मुकुट...
1 कुरिन्थियों 3:14
जिस का काम उस पर बना हुआ स्थिर रहेगा, वह मजदूरी पाएगा।
- उन लोगों को हानि जो भूसा, लकड़ी और ठूंठ प्रस्तुत करते हैं,
1 कुरिन्थियों 3:15
और यदि किसी का काम जल जाएगा, तो हानि उठाएगा; पर वह आप बच जाएगा परन्तु जलते जलते॥
4. यहूदियों का न्याय
1) विषयः यहूदी राष्ट्र या लोग,
यहेजकेल 20:34-38
34 मैं बली हाथ और बढ़ाई हुई भुजा से, और भड़काई हुई जलजलाहट के साथ तुम्हें देश देश के लोगों में से अलग करूंगा, और उन देशें से जिन में तुम तितर-बितर हो गए थे, इकट्ठा करूंगा;
35 और मैं तुम्हें देश देश के लोगों के जंगल में ले जा कर, वहां आम्हने-साम्हने तुम से मुक़द्दमा लड़ूंगा।
36 जिस प्रकार मैं तुम्हारे पूर्वजों से मिस्र देशरूपी जंगल में मुक़द्दमा लड़ता था, उसी प्रकार तुम से मुक़द्दमा लड़ूंगा, प्रभु यहोवा की यही वाणी है।
37 मैं तुम्हें लाठी के तले चलाऊंगा। और तुम्हें वाचा के बन्धन में डालूंगा।
38 मैं तुम में से सब बलवाइयों को निकाल कर जो मेरा अपराध करते है; तुम्हें शुद्ध करूंगा; और जिस देश में वे टिकते हैं उस में से मैं उन्हें निकाल दूंगा; परन्तु इस्राएल के देश में घुसने न दूंगा। तब तुम जान लोगे कि मैं यहोवा हूँ।
2) समयः महाक्लेश के समय।
3) स्थान: यरूशलेम और आसपास का क्षेत्र,
यिर्मयाह 33:6
देख, मैं इस नगर का इलाज कर के इसके निवासियों चंगा करूंगा; और उन पर पूरी शान्ति और सच्चाई प्रगट करूंगा।
4) आधारः ईश्वरत्व का इन्कार करना,
1 शमूएल 8:7
और यहोवा ने शमूएल से कहा, वे लोग जो कुछ तुझ से कहें उसे मान ले; क्योंकि उन्होंने तुझ को नहीं परन्तु मुझी को निकम्मा जाना है, कि मैं उनका राजा न रहूं।
लूका 23:18
इस का काम तमाम कर, और हमारे लिये बरअब्बा को छोड़ दे।
प्रेरितों के काम 7:51
जैसा तुम्हारे बाप दादे करते थे, वैसे ही तुम भी करते हो।
5) परिणामः यहूदियों का हृदय परिवर्तन और उनका यीशु ख्रीष्ट को मसीह के रूप में स्वीकार कर लेना,
यिर्मयाह 30:7
हाय, हाय, वह दिन क्या ही भारी होगा! उसके समान और कोई दिन नहीं; वह याकूब के संकट का समय होगा; परन्तु वह उस से भी छुड़ाया जाएगा।
यशायाह 66:8
ऐसी बात किस ने कभी सुनी? किस ने कभी ऐसी बातें देखी? क्या देश एक ही दिन में उत्पन्न हो सकता है? क्या एक जाति क्षण मात्र में ही उत्पन्न हो सकती है? क्योंकि सिय्योन की पीड़ाएं उठी ही थीं कि उस से सन्तान उत्पन्न हो गए।
5. राष्ट्रों का न्याय
1) विषयः अन्यजाति राष्ट्र,
मत्ती 25:32
“और सब जातियां उसके सामने इकट्ठी की जाएगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग कर देता है, वैसे ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा।”
2 ) समयः मसीह के दूसरे आगमन पर,
मत्ती 25:31
"जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और सब स्वर्गदूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिंहासन पर विराजमान होगा। "
3) स्थान: यहोशापात की तराई,
योएल 3:2
“उस समय मैं सब जातियों को इकट्ठी करके यहोशापात की तराई में ले जाऊँगा।"
4 ) आधारः यहूदियों के प्रति व्यवहार।
मत्ती 25:40
“तुमने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया वह मेरे ही साथ किया।" ( मसीह के भाई यहूदी थे )।
5) परिणामः बकरी राष्ट्रों को दण्ड,
मत्ती 25:41,
"हे श्रापित लोगों मेरे सामने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है।"
भेड़ राष्ट्रों को आशिष,
मत्ती 25:34
“हे मेरे पिता के धन्य लोगों, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिए किया हुआ है।"
6. पतित स्वर्गदूतों का न्याय
1) विषयः पतित स्वर्गदूत
2) समयः अज्ञात (सम्भवतः महान श्वेत न्याय के सिंहासन के समय)
3) स्थानः अज्ञात।
4) सम्भवतः लुसीफर द्वारा विद्रोह का संचालन करने के फलस्वरूप, यहेजकेल 28:12-19
यशायाह 14:12-17
प्रकाशित वाक्य 12:4
और उस की पूंछ ने आकाश के तारों की एक तिहाई को खींच कर पृथ्वी पर डाल दिया, और वह अजगर उस स्त्री से साम्हने जो जच्चा थी, खड़ा हुआ, कि जब वह बच्चा जने तो उसके बच्चे को निगल जाए।
1 कुरिन्थियों 6:3
“क्या तुम नहीं जानते, कि हम स्वर्गदूतों का न्याय करेंगे?"
यहूदा 6
“फिर जो स्वर्गदूतों ने अपने पद को स्थिर न रखा वरन अपने निज निवास को छोड़ दिया, उसने उनको भी उस भीषण दिन के न्याय के लिए अंधकार में जो सदाकाल के लिए है, बन्धनों में रखा है।"
2 पतरस 2:4
"क्योंकि जब परमेश्वर ने उन स्वर्गदूतों को जिन्होंने पाप किया नहीं छोड़ा, पर नरक में भेज कर अन्धेरे कुण्डों में डाल दिया, ताकि न्याय के दिन तक बन्दी रहें।
7. दुष्ट मृतकों का न्याय
1) विषयः दुष्ट मृतक...
प्रकाशित वाक्य 20:12
फिर मैं ने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के साम्हने खड़े हुए देखा, और पुस्तकें खोली गई; और फिर एक और पुस्तक खोली गई; और फिर एक और पुस्तक खोली गई, अर्थात जीवन की पुस्तक; और जैसे उन पुस्तकों में लिखा हुआ था, उन के कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया।
वे जिन्होंने नया जन्म कभी नहीं पाया; वे जो प्रथम पुनरुत्थान में जीवित नहीं हुए या कलीसिया के उठाए जाने में सम्मिलित नहीं हुए।
2 ) समयः एक हजार वर्ष का काल समाप्त होने के बाद,
प्रकाशितवाक्य 20:5,
“और जब तक ये हजार वर्ष पूरे न हुए, तब तक शेष मरे हुए न जी उठे।"
3) स्थानः महान श्वेत सिंहासन,
प्रकाशितवाक्य 20:11
प्रकाशितवाक्य 20:11
"फिर मैंने एक बड़ा श्वेत सिंहासन और उसको जो उस पर बैठा हुआ है, देखा।"
4) आधारः उनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं या नहीं और उन व्यक्तियों के कार्य।
प्रकाशितवाक्य 20:12
“और पुस्तक खोली गई, अर्थात् जीवन की पुस्तक; और जैसे उन पुस्तकों में लिखा हुआ था, उनके कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया।"
5) परिणामः दुष्ट आग की झील में डाल दिए गए।
प्रकाशितवाक्य 20:15\
"और जिस किसी का नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ न मिला, वह आग की झील में डाला गया। "
सारांश
महान श्वेत सिंहासन का न्याय व्यक्तिगत और अन्तिम यह मुकदमा नहीं है जिसमें यह मालूम किया जाए कि व्यक्ति दोषी है या नहीं, यह भक्तिहीनों और दुष्टों पर सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्वर के निर्णय की घोषणा है। महान श्वेत सिंहासन और पृथ्वी की अदालत के न्याय में अन्तर:
1) एक जीवित व्यक्ति का; दूसरा पुनर्जीवित व्यक्ति का न्याय करता है।
2) एक में साक्षी होते हैं; दूसरे में न तो साक्षी होते हैं, न ही वकीलों या न्यायधीशों की पीठ होती है।
3) एक में प्रश्न पूछे जाते हैं; दूसरे में सवाल-जवाब नहीं होते (केवल लिखित सूचना होती है)।
4) एक में खण्डन होते हैं; दूसरे में न कोई कथन दे सकता है. न कानून की पुस्तकें होती हैं और न ही जिरह हो सकती है।
5) एक में मानवीय कानून लागू होते हैं; दूसरे में ईश्वरीय।
6) एक में शारीरिक मृत्यु दण्ड दिया जाता है; दूसरे में अनन्त-दण्ड दिया जाता है।
7) एक में घूस दी जा सकती है; दूसरे में पूर्ण न्याय और पूरे प्रमाण तथा ईमानदारी होती है।
8) एक में प्रमाण प्रस्तुत किया जा सकता है; दूसरे में वर्षों पहले रिकार्ड किए गए प्रमाण, और साक्षियां प्रस्तुत की जाती हैं, जब कि व्यक्ति जीवित था,
सम्भवतः फिल्मों, टेपरिकाडों और मशीनों द्वारा ये प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं, जो बन्दी के जीवन के विचारों को प्रत्यक्ष रूप में दृष्टिगोचर कर देते हैं।
पुनर्विचार के लिए प्रश्न
Pastor Bablu Kumar Ghaziabad

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