सेवकाई में विरोध का सामना

मसीह की सामर्थ्य में आत्मिक विरोध पर विजय

जो व्यक्ति प्रभु यीशु की सेवकाई करता है, उसे किसी न किसी रूप में विरोध का सामना करना पड़ सकता है। यह विरोध कभी लोगों की ओर से, कभी झूठे आरोपों के रूप में, कभी निराशा, भय या प्रलोभनों के रूप में सामने आता है। इसलिए सेवक को केवल बाहरी परिस्थितियों को नहीं, बल्कि आत्मिक रूप से भी जागरूक रहना आवश्यक है।

बाइबल हमें सिखाती है कि हर बात पर बिना जाँच-परख के विश्वास न करें। शैतान को "भाइयों पर दोष लगाने वाला" कहा गया है (प्रकाशितवाक्य 12:10)। इसलिए किसी भी आरोप, अफवाह या नकारात्मक बात को सत्य मानने से पहले उसे परमेश्वर के वचन और सत्य की कसौटी पर परखना चाहिए।

प्रभु यीशु मसीह इस संसार में इसलिए प्रकट हुए कि शैतान के कामों को नष्ट करें। इसलिए जब विरोध आए, तो हमारा पहला उत्तर क्रोध या प्रतिशोध नहीं, बल्कि प्रार्थना, विश्वास, सत्य और परमेश्वर पर निर्भरता होना चाहिए।


1. यीशु शैतान के कामों को नष्ट करने आए

1 यूहन्ना 3:8

"परमेश्वर का पुत्र इसलिये प्रगट हुआ, कि शैतान के कामों को नाश करे।"

यह पद हमें प्रभु यीशु के कार्य का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बताता है।

शैतान पाप, छल, झूठ और विनाश का कार्य करता है। लेकिन यीशु मसीह लोगों को पाप की दासता से छुड़ाने, सत्य प्रकट करने और उद्धार देने आए।

इसका अर्थ यह नहीं कि शैतान का अस्तित्व अभी समाप्त हो गया है, बल्कि यह कि क्रूस और पुनरुत्थान के द्वारा उसकी शक्ति पर निर्णायक विजय प्राप्त हो चुकी है। इसलिए विश्वासी भय में नहीं, बल्कि मसीह की विजय में जी सकता है।

व्यावहारिक शिक्षा:
जब विरोध आए, तो याद रखें कि आपकी आशा विरोध में नहीं, बल्कि उस प्रभु में है जिसने पहले ही विजय प्राप्त कर ली है।


2. परमेश्वर न्याय करने वाला है

भजन संहिता 149:9

"और उन को ठहराया हुआ दण्ड दें! उसके सब भक्तों की ऐसी ही प्रतिष्ठा होगी।"

यह पद परमेश्वर के न्याय की ओर संकेत करता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि विश्वासी स्वयं बदला ले, बल्कि यह कि परमेश्वर अन्ततः न्याय करने वाला है।

नए नियम में हमें सिखाया गया है कि हम प्रतिशोध अपने हाथ में न लें, बल्कि परमेश्वर के न्याय पर भरोसा रखें (रोमियों 12:19)।

जब हम परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं, तो हमारा मन कटुता और बदले की भावना से सुरक्षित रहता है।


3. अपने शत्रुओं के विषय में परमेश्वर से प्रार्थना करें

भजन संहिता 143:12

"और करूणा करके मेरे शत्रुओं को सत्यानाश कर... क्योंकि मैं तेरा दास हूं।"

दाऊद ने अपने संकट के समय परमेश्वर से सहायता माँगी।

आज नए नियम के प्रकाश में, प्रभु यीशु हमें अपने शत्रुओं के लिए भी प्रार्थना करने और उनसे प्रेम करने की शिक्षा देते हैं (मत्ती 5:44)।

इसलिए जब कोई सेवक विरोध का सामना करता है, तो उसे न्याय परमेश्वर पर छोड़ते हुए यह प्रार्थना करनी चाहिए कि परमेश्वर सत्य को प्रकट करे, बुराई को रोके और यदि संभव हो तो विरोध करने वालों के हृदय को भी बदल दे।


4. गलत विचारों और झूठी कल्पनाओं को अस्वीकार करें

2 कुरिन्थियों 10:5

"हम कल्पनाओं को... खण्डन करते हैं; और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं।"

आत्मिक युद्ध केवल बाहरी नहीं, बल्कि हमारे मन में भी होता है।

शैतान अक्सर—

  • भय,
  • संदेह,
  • निराशा,
  • झूठ,
  • आत्म-दोष,
  • और गलत कल्पनाओं

के द्वारा सेवकाई को कमजोर करने का प्रयास करता है।

पौलुस सिखाता है कि हर विचार को परमेश्वर के वचन की कसौटी पर परखें।

यदि कोई विचार मसीह के सत्य के विपरीत है, तो उसे स्वीकार न करें, बल्कि उसे अस्वीकार करके परमेश्वर के सत्य को ग्रहण करें।


5. मसीह में हम भरपूर हैं

कुलुस्सियों 2:10

"और तुम उसी में भरपूर हो गए हो जो सारी प्रधानता और अधिकार का शिरोमणि है।"

विश्वासी की सामर्थ्य उसकी अपनी योग्यता से नहीं आती।

हमारी पहचान, सुरक्षा और अधिकार मसीह में हैं।

वह सभी प्रधानताओं और अधिकारों से ऊपर है।

इसलिए सेवकाई में विरोध आने पर हमें अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि मसीह की महानता को याद रखना चाहिए।

जब हम उसमें बने रहते हैं, तब हमें आत्मिक स्थिरता और साहस प्राप्त होता है।


6. हमारा संघर्ष मनुष्यों से नहीं, आत्मिक शक्तियों से है

इफिसियों 6:12

"क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं..."

यह पद आत्मिक युद्ध का सही दृष्टिकोण देता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर असहमति या हर व्यक्ति शैतान का उपकरण है।

बल्कि इसका अर्थ है कि बुराई की आत्मिक शक्तियाँ लोगों को भटका सकती हैं और परमेश्वर के कार्य का विरोध कर सकती हैं।

इसलिए हमारा संघर्ष लोगों से घृणा करना नहीं, बल्कि—

  • सत्य में बने रहना,
  • प्रेम से व्यवहार करना,
  • प्रार्थना करना,
  • और परमेश्वर के पूरे हथियार धारण करना है।

यही मसीही सेवकाई की पहचान है।


सेवकाई में विरोध का सामना कैसे करें?

  • हर बात को परमेश्वर के वचन के अनुसार परखें।
  • अफवाहों और झूठे आरोपों पर तुरंत विश्वास न करें।
  • विरोध के समय प्रार्थना में दृढ़ रहें।
  • मन में आने वाले भय और झूठे विचारों को परमेश्वर के वचन से अस्वीकार करें।
  • प्रतिशोध के बजाय परमेश्वर के न्याय पर भरोसा रखें।
  • प्रेम, नम्रता और सत्य के साथ सेवकाई करते रहें।
  • याद रखें कि आपकी सामर्थ्य मसीह में है, न कि आपकी अपनी क्षमता में।

निष्कर्ष

सेवकाई में विरोध असामान्य नहीं है। प्रभु यीशु और प्रेरितों ने भी विरोध का सामना किया। परन्तु बाइबल हमें सिखाती है कि हम विरोध के सामने भयभीत न हों, बल्कि मसीह में स्थिर रहें।

यीशु मसीह शैतान के कामों को नष्ट करने आए हैं। इसलिए हमें प्रार्थना, सत्य, विश्वास और परमेश्वर के वचन के द्वारा आत्मिक रूप से दृढ़ रहना चाहिए। हमारा उद्देश्य लोगों से युद्ध करना नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रेम और सत्य के साथ उसकी सेवकाई को आगे बढ़ाना है।

मुख्य सीख:

  • हर बात को जाँचें, हर आरोप पर तुरंत विश्वास न करें।
  • मसीह पहले ही शैतान पर निर्णायक विजय प्राप्त कर चुके हैं।
  • अपने विचारों को परमेश्वर के वचन के अधीन रखें।
  • विरोध के समय प्रार्थना और प्रेम में स्थिर रहें।
  • याद रखें—हमारी सामर्थ्य और विजय केवल प्रभु यीशु मसीह में है।

प्रार्थना


मसीही अगुवे या मित्र के लिए जिन पर आक्रमण हो रहा हो.

   हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ, कि यीशु शैतान के कामों का नाश करने के लिए आया। मैं ( अपने मित्र या पास्टर का नाम ) के साथ इस विरोध के समय खड़ा होता हूँ, तथा हर एक विरोध, दोष व झूठ को दूर होने का आदेश देता हूँ, मैं तेरे नाम से तेरा वचन उसके ऊपर घोषित करता हूँ, कि तू उसके शत्रुओं को काट डाले। मैं यह जान लेता हूँ कि यह मल्लयुद्ध लहू ओर मांस के विरूद्ध नहीं है, परन्तु दुष्टता की आत्मिक सेनाओं के विरोध में, और तेरे लहू के द्वारा मैं शैतान के हर एक गढ़ को बांध देता हूँ, इस परिस्थिति में मैं आपकी शांति और सम्मति की बात बोलता हूँ, मैं प्रार्थना करता हूँ कि तू उसके जीवन में भलाई की बातें करें तथा तेरा राज्य इस वर्तमान परीक्षा की खड़ी में भी आने पाए। मैं धन्यवाद देता हूँ कि तेरे कान धर्मी की दोहाई की ओर लगे रहते हैं, और कि तू इसके लिए सामर्थ्य के काम करें। ( इस प्रार्थना को यीशु मसीह के नाम से मांगते हैं, आमीन )