यीशु मसीह के साथ विराजमान

(Enthroned with Jesus Christ)

जब कोई व्यक्ति प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करता है, तो उसके जीवन में केवल पापों की क्षमा ही नहीं होती, बल्कि उसकी आत्मिक पहचान भी बदल जाती है। वह परमेश्वर के परिवार का सदस्य बन जाता है, मसीह के साथ एकता में जुड़ जाता है और परमेश्वर के राज्य का उत्तराधिकारी कहलाता है।

बाइबल सिखाती है कि प्रभु यीशु अपने पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के बाद पिता परमेश्वर के दाहिने हाथ विराजमान हैं। वे सारी प्रधानताओं, अधिकारों, शक्तियों और प्रभुताओं से ऊपर हैं। उसी मसीह के साथ विश्वासियों को भी "स्वर्गीय स्थानों में बैठाया गया" है। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर ने हमें मसीह के साथ एक नया आत्मिक स्थान, नई पहचान और उसके राज्य में सहभागिता प्रदान की है।

यह कोई ऐसा सम्मान नहीं है जिससे हम घमण्ड करें, बल्कि यह एक महान सौभाग्य और उत्तरदायित्व है। हमें अपने जीवन, सेवकाई और प्रार्थना में उसी अधिकार का उपयोग करना है जो प्रभु ने अपनी इच्छा के अनुसार हमें दिया है।


1. मसीह के साथ स्वर्गीय स्थानों में बैठाए गए

इफिसियों 2:6

"और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।"

यह पद विश्वासी की नई आत्मिक स्थिति को प्रकट करता है।

"उसके साथ बैठाया" का अर्थ यह नहीं कि हम अभी स्वर्ग में शारीरिक रूप से बैठे हैं, बल्कि यह कि परमेश्वर हमें मसीह के साथ एकता में देखता है। हमें उसके परिवार में स्थान मिला है और हम उसकी कृपा, अनुग्रह और आत्मिक आशीषों के सहभागी बन गए हैं।

इस सत्य के कारण विश्वासी को भय, हीनभावना या निराशा में नहीं जीना चाहिए, क्योंकि उसकी पहचान अब केवल इस संसार से नहीं, बल्कि मसीह से जुड़ी हुई है।

व्यावहारिक शिक्षा:
अपने निर्णय, प्रार्थना और जीवन को इस पहचान के अनुसार जीएँ कि आप परमेश्वर की संतान हैं और मसीह के साथ जुड़े हुए हैं।


2. कलीसिया के द्वारा परमेश्वर की बुद्धि प्रकट होती है

इफिसियों 3:10

"ताकि अब कलीसिया के द्वारा, परमेश्वर का नाना प्रकार का ज्ञान, उन प्रधानों और अधिकारियों पर, जो स्वर्गीय स्थानों में हैं प्रगट किया जाए।"

परमेश्वर ने कलीसिया को संसार में अपना कार्य पूरा करने के लिए स्थापित किया है।

जब कलीसिया प्रेम, पवित्रता, एकता और सुसमाचार के अनुसार जीवन जीती है, तब वह परमेश्वर की बुद्धि और उसकी योजना को प्रकट करती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि कलीसिया अपनी शक्ति से आत्मिक शक्तियों पर शासन करती है, बल्कि यह कि परमेश्वर अपने उद्धार के कार्य और अपनी महिमा को कलीसिया के माध्यम से प्रकट करता है।

इसलिए प्रत्येक विश्वासी का जीवन परमेश्वर की महिमा का एक जीवित प्रमाण होना चाहिए।


3. जो तुम में है, वह संसार में रहने वाले से बड़ा है

1 यूहन्ना 4:4

"हे बालको, तुम परमेश्वर के हो... क्योंकि जो तुम में है, वह उस से जो संसार में है, बड़ा है।"

यह पद विश्वासी को साहस देता है।

पवित्र आत्मा, जो विश्वासियों में वास करता है, शैतान और उसकी सारी चालों से महान है।

इसका अर्थ यह नहीं कि हमें आत्मिक युद्ध को हल्के में लेना चाहिए, बल्कि यह कि हमें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।

हमारी विजय हमारी अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति और सामर्थ्य से है।

जब हम उसके वचन में बने रहते हैं और पवित्र आत्मा की अगुवाई में चलते हैं, तब हम विश्वास के साथ जीवन जी सकते हैं।


4. सारी सृष्टि मसीह के द्वारा और उसी के लिए है

कुलुस्सियों 1:16

"क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई... सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।"

यह पद प्रभु यीशु की सर्वोच्चता को प्रकट करता है।

स्वर्ग और पृथ्वी की हर वस्तु, दृश्य और अदृश्य शक्तियाँ, सिंहासन, प्रभुताएँ, प्रधानताएँ और अधिकार—सब उसी के द्वारा बनाए गए और उसी के अधीन हैं।

इसका अर्थ है कि प्रभु यीशु सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं।

जब हम यह समझते हैं, तब हमारी प्रार्थना और विश्वास दृढ़ हो जाते हैं, क्योंकि हम ऐसे प्रभु की सेवा करते हैं जो हर अधिकार से ऊपर है।


अपने आत्मिक अधिकार को कैसे समझें?

विश्वासी का आत्मिक अधिकार—

  • मसीह के साथ उसके संबंध पर आधारित है।
  • पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से कार्य करता है।
  • परमेश्वर के वचन के अधीन रहता है।
  • नम्रता और आज्ञाकारिता के साथ प्रयोग किया जाता है।
  • परमेश्वर की महिमा और लोगों की भलाई के लिए उपयोग किया जाता है।

सच्चा आत्मिक अधिकार कभी घमण्ड नहीं लाता, बल्कि सेवाभाव, प्रेम और जिम्मेदारी को बढ़ाता है।


मसीह के साथ विराजमान होने के व्यावहारिक परिणाम

यदि आप वास्तव में समझते हैं कि आप मसीह के साथ जुड़े हुए हैं, तो—

  • भय के बजाय विश्वास में चलेंगे।
  • पाप से समझौता नहीं करेंगे।
  • प्रार्थना में साहस के साथ परमेश्वर के पास आएँगे।
  • अपनी पहचान संसार से नहीं, मसीह से प्राप्त करेंगे।
  • सेवकाई में नम्रता और विश्वासयोग्यता से कार्य करेंगे।
  • हर परिस्थिति में याद रखेंगे कि अंतिम अधिकार प्रभु यीशु का है।

निष्कर्ष

प्रभु यीशु मसीह आज पिता परमेश्वर के दाहिने हाथ विराजमान हैं और सारी प्रधानताओं, अधिकारों और शक्तियों से ऊपर हैं। उद्धार के द्वारा परमेश्वर ने हमें भी मसीह के साथ एक नई आत्मिक स्थिति प्रदान की है। यह हमें घमण्ड करने के लिए नहीं, बल्कि विश्वास, नम्रता और उत्तरदायित्व के साथ जीवन जीने के लिए बुलाता है।

जब हम समझते हैं कि हमारी पहचान मसीह में है, तब हम भय से मुक्त होकर, विश्वास में दृढ़ होकर और परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन जीते हैं। हमारा आत्मिक अधिकार केवल उसी में है और उसी की इच्छा के अधीन है।

मुख्य सीख:

  • आपकी नई पहचान मसीह में है।
  • आप परमेश्वर के परिवार के सदस्य हैं।
  • आपकी आत्मिक सामर्थ्य आपकी नहीं, बल्कि मसीह की है।
  • जो आप में है, वह संसार में रहने वाले से बड़ा है।
  • अपने अधिकार का उपयोग सदैव नम्रता, आज्ञाकारिता और परमेश्वर की महिमा के लिए करें।


प्रार्थना


अपने पास्टर के लिए, आप मेरे पीछे-पीछे बोलिए,
   हे पिता, मैं धन्यवाद करता हूँ, कि तूने मुझे उठाया और मसीह के साथ स्वर्गीय स्थानों पर बैठाया। मैं इस पद की जिम्मेदारी और अधिकार स्वीकार करता हूँ, इस समय मैं अपने पास्टर के लिए प्रार्थना करता हूँ, तथा यीशु के नाम में उनके सम्पूर्ण जीवन व सेवकाई में विजय की घोषणा करता हूँ, अपने पद तेरी दाहिनी ओर से मैं.....................सेवकाई पर शक्तिशाली आशीषों की घोषणा करता हूँ। धन्य हो वह जब बाहर जाए तथा धन्य हो जब वह अन्दर आए उसकी सेवा स्वास्थ्य, परिवार एवं आर्थिक बातों में आशीष मिले, मैं उनके समस्त प्रबंध, उपाय में तेरी आशीष की घोषणा करता हूँ, तथा यह आदेश देता हूँ कि शैतान की सारी योजनाएं उसके खिलाफ रद्द हो जाएं तथा शैतान को भी तेरे नाम से बांध देता हूँ, हे प्रभु, तेरा आत्मा उसे तेरे प्रेम और ज्ञान से भर दे, मैं अपने पास्टर के जीवन में तेरी आशीर्षों के लिए आनंदित हूँ, तथा मेरी चर्च में तेरी आशीषों के लिए भी आनंदित हूँ, तूने मेरे पास्टर को अपनी करूणा तथा दया का मुकुट पहनाया है, प्रभु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ, क्योंकि तू सबके प्रतिभला है, तथा तेरी दया उसके सब कामों पर है ( भजन संहिता 145:6 )।  इस प्रार्थना को यीशु मसीह के नाम से मांगते हैं, आमीन )