परमेश्वर एक सन्तुलित हस्ती है
प्रस्तावना
परमेश्वर पवित्र , प्रेमी , दयालु , विश्वासयोग्य है, तौभी वह न्यायी और धर्मी है। बहुत से लोगों का परमेश्वर के प्रति एकतरफा दृष्टिकोण होता है। कुछ लोग उसके प्रेम को आवश्यकता से अधिक महत्व देते हैं और यह भूल जाते हैं कि इसके साथ ही साथ वह न्यायी और पवित्र भी है। परमेश्वर का प्रेम एक पश्चाताप करने वाले पापी के पाप क्षमा करने और उस पर दया दिखाने की उसे अनुमति देता है।
परमेश्वर की पवित्रता और
न्याय की मांग यह है कि व्यवस्था के अनुसार पाप का पूर्ण दण्ड दिया जाए ।
रोमियों 6:23, "क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है । " निर्गमन 18:20 को भी देखिए।
यदि परमेश्वर मात्र एक मानव
प्राणी होता तो वह दोनों पक्षों के निरन्तर संघर्ष के कारण उत्पन्न परस्पर विरोधी
भावनाओं एवम् इच्छाओं के कारण पूर्णतः निराश हो गया होता । परन्तु परमेश्वर मानव
नहीं है और ये दो परस्पर विरोधी भावनाएँ एक - दूसरे के साथ पूर्ण सामंजस्य से
कार्य करती है । एक भावना दूसरी विरोधी भावना को सन्तुलित करती है।
यह तर्क देना कि नरक का होना असम्भव है ; क्योंकि एक प्रेमी , दयालु परमेश्वर एक असहाय मनुष्य को वहाँ सदा के लिए नहीं भेजेगा ; यह परमेश्वर के प्रति एक असन्तुलित दृष्टिकोण रखना है । नरक की भयंकरता को जानने और कलवरी के समय के अन्धकार को समझने के लिए पाप के विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध की भयंकरता और उस की पवित्रता पर मनन करें ( 2 कुरिन्थियों 5:11 )
परमेश्वर की पवित्रता मांग
करती है कि हम पवित्र बने । परमेश्वर की व्यवस्था ( नियम ) परमेश्वर के न्याय के
अनुरूप दोषी पापी पर अनन्त दण्ड का निर्णय देती है । हमारे युग की महानतम आशिषों
में से एक यह है कि परमेश्वर ने उद्धार का एक ऐसा मार्ग खोज निकाला है जिसने
परमेश्वर की पवित्रता और परमेश्वर के प्रेम दोनों ही को सन्तुष्ट किया है । इस
समाधान ने व्यवस्था को भी पूरा किया , तौभी मनुष्य को स्वतन्त्र
इच्छा दी कि वह उद्धार या विनाश ,
स्वर्ग या नरक जिसे चाहे
चुन ले ।
1. परमेश्वर पवित्र है
हम किसी ऐसे परमेश्वर की
कल्पना भी नहीं कर सकते जो पूर्णतः पवित्र न हो । पवित्र होने का अर्थ है प्रत्येक
गन्दगी से रहित होकर , शुद्ध होना । परमेश्वर पूर्णतः शुद्ध है ।
हबक्कूक 1:13 , " तेरी आँखें ऐसी शुद्ध हैं कि तू बुराई को देख ही
नहीं सकता । " पाप के कारण परमेश्वर ने क्रूस पर मरते हुए अपने ही पुत्र से
मुंह मोड़ लिया था । निर्गमन 15:11 , ' हे यहोवा ,
तेरे तुल्य कौन है ? पवित्रता के कारण महाप्रतापी । "
1 शमूएल 2 : 2, “ यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं , क्योंकि तुझको छोड़ और कोई
है ही नहीं । " यशायाह 6
: 3 , " सेनाओं का यहोवा पवित्र , पवित्र , पवित्र है । " 1 पतरस 1 : 15,16 , " पर जैसा तुम्हारा बुलाने
वाला पवित्र है , वैसे ही तुम भी अपने सारे चालचलन में पवित्र बनो , क्योंकि लिखा है ,
कि पवित्र बनो , क्योंकि मैं पवित्र हूँ ।
"परमेश्वर की पवित्रता ने
उसे पाप में गिरे हुए मनुष्य से अलग कर दिया है । इफिसियों 2:13. पर अब तो मसीह यीशु में तुम जो पहिले दूर थे, मसीह के लोहू के द्वारा निकट हो गए हो।" केवल यीशु के लहू के
द्वारा ही मनुष्य इस पवित्र परमेश्वर तक पहुंच सकता है।
परमेश्वर पवित्र है। परमेश्वर पाप से घृणा करता है । अवश्य है कि उसका
पवित्र क्रोध पाप को दण्ड दे । यही यशायाह 53 : 6 का अर्थ है ,
जबकि पिता ने अपने पुत्र को
त्याग दिया और कलवरी पर उसे दण्ड दिया । पापियों के प्रति परमेश्वर के प्रेम की
सराहना तब तक नहीं की जा सकती , जब तक कि हम उस प्रेम को पाप के प्रति परमेश्वर के धधकते हुए क्रोध
के प्रकाश में नहीं देखेंगे । परमेश्वर की पवित्रता ने मांग की कि पाप का समुचित
दण्ड दिया जाए । उद्धारकर्ता ने इस मांग को क्रूस पर स्वेच्छा से स्वीकार किया और
पिता को पूर्णतः सन्तुष्ट कर दिया।
2. परमेश्वर प्रेम है
1यूहन्ना 4 : 8 , " जो प्रेम नहीं रखता वह परमेश्वर को नहीं जानता क्योंकि परमेश्वर
प्रेम है । " यह मात्र एक '
क्रिया ' नहीं है जिसका अर्थ हो कि परमेश्वर प्रेम करता है परन्तु एक ' संज्ञा ' है क्योंकि परमेश्वर प्रेम है ।
यदि हृदय परिवर्तन के
द्वारा परमेश्वर मेरे हृदय में रहता है तो मुझे प्रेम करना ही होगा क्योंकि अब
मेरे अन्दर प्रेम निवास करता है । 1 यूहन्ना 4 : 7 , " हे प्रियो , हम आपस में प्रेम रखें ; क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है : और जो कोई प्रेम करता है , वह परमेश्वर से जन्मा है और परमेश्वर को जानता है । "
प्रेम क्या है ? जिस व्यक्ति से हम प्रेम करते हैं उसके कल्याण की इच्छा करने और उसके
कल्याण में आनन्द अनुभव करने को ही प्रेम कहते हैं । सच्चा प्रेम तो पापियों और
दुश्मनों से भी प्रेम करना है ( मत्ती 5:44 , 45 ) । परमेश्वर का प्रेम पुत्र के प्रति और विशेष रूप से सभी विश्वासियों
के प्रति प्रकट हुआ है । यूहन्ना 16:27 , " क्योंकि पिता तो आप ही तुमसे प्रीति रखता है , इसलिए कि तुमने मुझसे प्रीति रखी है , और यह भी प्रतीति की है कि
मैं पिता की ओर से निकल आया । "
परमेश्वर संसार से प्रेम
करता है ( यूहन्ना 3:16 ) , जिसके कारण उसने उद्धार की
एक योजना तैयार की जिससे मनुष्यों को विनाश और नरक के दण्ड से बचने का अवसर मिले ।
एक प्रेमी पिता के समान परमेश्वर मसीही की ताड़ना करने के द्वारा अपने प्रेम को
प्रकट करता है ( इब्रानियों 12
: 6 )।
Vishwasi Tv में आपका स्वागत है
Read More: ज्यादा बाइबल अध्ययन के लिए क्लिक करें:
3. परमेश्वर विश्वासयोग्य है
1कुरिन्थियों 1 : 9 , " परमेश्वर सच्चा ( विश्वासयोग्य ) है , जिसने तुमको अपने पुत्र
हमारे प्रभु यीशु मसीह की संगति में बुलाया व्यवस्थाविवरण 7 : 9 , " इसलिए जान रख कि तेरा परमेश्वर यहोवा ही परमेश्वर
है , विश्वासयोग्य ईश्वर है । "
विश्वासयोग्य शब्द का क्या
अर्थ है ? इसका अर्थ है ऐसा व्यक्ति जिस पर निश्चित होकर
विश्वास किया जा सके , जो भरोसेमन्द और विश्वसनीय हो। परमेश्वर
विश्वासयोग्य है क्योंकि वह सच्चा है और कभी नहीं बदलता । परमेश्वर की
विश्वासयोग्यता कितनी महान है ?
वह आकाश की ऊंचाइयों तक
पहुंचती है । भजन ० 36 : 5 , “ हे यहोवा तेरी करुणा स्वर्ग
में है , तेरी सच्चाई आकाशमण्डल तक पहुंचती है । " वह
परमेश्वर के सारे कार्य विश्वासयोग्यता में होते हैं । भजन 33 : 4 , " क्योंकि यहोवा का वचन सीधा है ; और उसका सब काम सच्चाई से होता है । "
परमेश्वर की विश्वासयोग्यता
अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने और अपने द्वारा कहे गये प्रत्येक वचन को पूरा करने
में प्रकट होती है ; परमेश्वर कभी नहीं बदलता क्योंकि वह न तो झूठ
बोलता है न पश्चात्ताप करता है।
आवश्यकता के समय अपनी
सन्तान की रक्षा करने , सहायता करने तथा अगुवाई करने में परमेश्वर अपनी
प्रत्येक प्रतिज्ञा को पूरी करेगा । 2 तीमुथियुस 2:13 , " यदि हम अविश्वासी भी हो , तौभी वह विश्वासयोग्य बना रहता है , क्योंकि वह आप अपना इन्कार
नहीं कर सकता । "
1 कुरिन्थियों 10:13 , " तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े , जो मनुष्य के सहने से बाहर
है : और परमेश्वर तो सच्चा है : वह तुम्हें सामर्थ से बाहर परीक्षा में न पड़ने
देगा , वरन परीक्षा के साथ निकास भी करेगा ; कि तुम सह सको । "
4. परमेश्वर दयालु है
भजन० 103 : 8 , “ यहोवा दयालु और अनुग्रहकारी , विलम्ब कोप करने वाला और अति करुणामय है । " व्यवस्थाविवरण 4:31 , " क्योंकि तेरा परमेश्वर यहोवा दयालु ईश्वर है , वह तुम को न तो छोड़ेगा और न नष्ट करेगा । " पाप के दण्ड -
स्वरूप दुःख और मृत्यु देने के बजाय परमेश्वर दयालु है और हमें बहुत सी आशिष देता
है , वह उद्धार प्राप्त और भटके हुओं , दोनों को स्वास्थ्य , सुख - सुविधा और पृथ्वी पर
आनन्द प्रदान करता है।"
मती 5:45. वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है , और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है । " परमेश्वर
प्रभुसत्ता - सम्पत्र ( Sovereign ) है और अपनी करुणा दिखाने के
लिए जिसे चाहे , चुन सकता है । ( रोमियों 9 : 15,18 ) । परमेश्वर की करुणा असंख्य लोगों पर प्रकट हो
सकती है । निर्गमन 20 : 6 , ' और जो मुझसे प्रेम रखते और
मेरी आज्ञाओं को मानते हैं ,
उन हजारों पर करुणा किया
करता हूँ । "
परमेश्वर की करुणा कितनी
महान है ? भजन ० 103 : 11,17 " जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊँचा है , वैसे ही उसकी करुणा उसके
डरवैयों के ऊपर प्रबल है । परन्तु यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग युग प्रकट
होती रहती है । प्रभु उन लोगों पर अपनी करुणा दिखाता है जो उसमें विश्वास रखते हैं
। भजन 32:10 , " जो यहोवा पर भरोसा रखता है
वह करुणा से घिरा रहेगा। "
जब एक पश्चातापी पापी यीशु
के पास क्षमा पाने आता है तो वह अपनी अच्छाई का गुणगान नहीं करता परन्तु अपने आपको
प्रभु की करुणा पर छोड देता है । भजन 51 : 1 , " हे परमेश्वर अपनी करुणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर । "
5. परमेश्वर न्याय - प्रिय है
व्यवस्थाविवरण 32 : 4 , " उसकी सारी गति न्याय की है । वह सच्चा ईश्वर है , उसमें कुटिलता नहीं , वह धर्मी और सीधा है ।
" भजन ० 19 : 9 , " यहोवा के नियम सत्य और पूरी
रीति से धर्ममय है ।"
हमारा परमेश्वर न्याय -
प्रिय और धर्ममय है और वह प्रत्येक व्यक्ति का सच्चा न्याय करेगा । यशायाह 45:21 , " मुझे छोड़ कोई और दूसरा परमेश्वर नहीं है , धर्मी और उद्धारकर्ता ईश्वर मुझे छोड़ और कोई नहीं
परमेश्वर चूंकि न्यायी , धर्मी और पवित्र है , इसलिए अवश्य है कि वह
न्यायसंगत उचित और खरा व्यवहार करे । 1 शमूएल 23 , " क्योंकि यहोवा ज्ञानी ईश्वर है , और कामों का तौलने वाला है । "
उत्पत्ति 18:25 , " क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे ? " वह अवश्य ही करेगा । परमेश्वर का स्वभाव या चरित्र उससे सदा वही
कार्य करवाता है जो सदैव सही है । परमेश्वर न्यायी होने के कारण सभी बातों का
निर्णायक न्यायकर्ता होगा ( 1
राजा 8:32 ) ।
सारांश
परमेश्वर एक ही समय में
प्रेमी भी और पवित्रता की मांग करने वाला भी कैसे हो सकता है ? वह कैसे एक दोषी पापी के लिए एक ही समय में करुणामय और न्यायी दोनों
ही हो सकता है ? इसका उत्तर केवल कलवरी में प्राप्त हो सकता है।
कलवरी ही पाप के प्रति परमेश्वर का प्रचण्ड क्रोध और दोषी पापी के प्रति परमेश्वर
की अनन्त करुणा दोनों ही की अभिव्यक्ति थी। परमेश्वर प्रेम है परन्तु उस प्रकार का
भावनात्मक प्रेम नहीं जो पाप को अनदेखा कर दे।
परमेश्वर का प्रेम पवित्र
और न्यायी है । परमेश्वर को समझने के लिए और उसके व्यक्तित्व , चरित्र और स्वभाव को जानने पहचानने के लिए कलबरी का अध्ययन कीजिए ।
तब आप जानेंगे कि किस प्रकार परमेश्वर पाप से घृणा करते हुए पापी से प्रेम कर सकता
है । कलबरी व्यवस्था की सारी मांगों को पूरा कर परमेश्वर की पवित्रता और न्याय को
सन्तुष्ट करता है और एक पापी को वैधानिक रूप से स्वर्ग में प्रवेश करने का अवसर
प्रदान करता है ।
आइए इस महान परमेश्वर की
सच्ची उपासना में अपने मस्तक झुकाएँ जो कि एक सिद्ध हस्ती है ।
पुनर्विचार के लिए प्रश्न
1. परमेश्वर के पाँच नैतिक गुण बताइए ।
2. परमेश्वर इन परस्पर - विरोधी प्रतीत होने वाले
गुणों के कारण निराश क्यों नहीं होता ?
3. क्या यह तथ्य कि परमेश्वर प्रेम है , नरक के सिद्धान्त को समाप्त कर देता है ? क्यों ?
4. ' पवित्र ' शब्द का क्या अर्थ है ?
5 . 1पतरस 1 : 15,16 के अनुसार इस सिद्धान्त का व्यावहारिक उपयोग
क्या है ?
6. तीन विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों के विषय में
बताइए जिन पर परमेश्वर अपना प्रेम प्रदर्शित करता है ।
7. परमेश्वर की विश्वासयोग्यता कितनी महान है ?
8. परमेश्वर की करुणा अन्त में प्रत्येक व्यक्ति को
स्वर्ग क्यों नहीं पहुंचाएगी ?
9. जब हम कहते हैं कि परमेश्वर न्यायी तो इसका क्या
अर्थ है ?
10. हम परमेश्वर की करुणा और
न्याय का सन्तुलन किस स्थान पर पाते हैं ? स्पष्ट कीजिए ।
.jpg)
0 टिप्पणियाँ